Shambhunath Shukla : बात १९९७ की है रांची से दिल्ली लौट रहा था। फ्लाइट में असगर अली इंजीनियर साहब मिल गए। दुआ सलाम के बाद बातचीत होने लगी। विषय सांप्रदायिक सौहार्द का था पता नहीं कैसे बात रहीम पर आ गई। मैंने उनको एक रहीम का दोहा सुनाया-
अच्युत चरण तरंगिनी शिव सिर मालति माल।
हरि न पठायौ सुरसरी कीज्यो इंदव भाल।।
मान्यता है कि अगर कोई गंगा स्नान करे तो या तो वह विष्णुलोक जाएगा अथवा शिवलोक। यहां अब्दुर्रहीम खानखाना कहते हैं कि लेकिन मां गंगे तुम मुझे विष्णु लोक मत भेजना क्योंकि तुम विष्णु के चरण पखारती हो। लेकिन तुम शिव की सिर की शोभा हो इसलिए मुझे शिवलोक भेजना।
एक मुसलिम द्वारा लिखे गए इस दोहे की कल्पना किसी कट्टर सनातनी ने भी नहीं की। असगर अली साहब एकदम से भावुक हो उठे बोले- आप यह कविता मुझे भेजना मैं अपनी पत्रिका में छापूंगा। मुझे हिंदी कम आती है इसलिए इसका अनुवाद भी कर देना। असगर अली इंजीनियर साहब बोरा मुसलमान थे और उन्होंने अपने धर्मगुरू के खिलाफ खूब लड़ाई लड़ी थी। उस समय अकेले सारिका संपादक कमलेश्वर ने उनका जी जान से साथ दिया था। असगर अली सांप्रदायिक सदभाव को मन से मानते थे। ऐसी महान विभूति के निधन पर हार्दिक श्रृद्धांजलि।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.
नहीं रहे असगर अली इंजीनियर





