रेखा। पूरा नाम भानुरेखा गणेशन। राज्यसभा सांसद। चुनाव जीतकर नहीं, पर अपने कृतित्व के बल पर मनोनीत सांसद। रूपहले परदे की लक दक जिंदगी की चकाचौंध और ग्लैमर के बहुत चमकदार शिखर पर विराजमान। इसी वजह से रेखा हजारों लोगों के हिलते हाथों के अक्स की असल हकदार है। पहले हमारी फिल्में रेखा से चलती थीं। रूपहले परदे का रूप उनसे खिलता था। पर अब संसद उनसे सजती है।
भले ही रेखा अब संसद में हैं, जो देश की जनता के लिए हुआ करती है। लेकिन पूरे जीवन भर रेखा ने सिर्फ और सिर्फ सिनेमा के लिए काम किया है। उस सिनेमा के लिए, जिसकी असलियत यह है कि वहां होनेवाली हर हलचल लोगों के दिलों पर असर करती है और सिनेमावाले दिलों पर राज करते हैं। राजनीति और फिल्मों की हालत थोड़ी थोड़ी एक जैसी है। दोनों में काम करनेवालों को लोग अकसर अपने दिलों में बिठाते हैं। पर एक मामले में राजनीति और फिल्म के बीच में बहुत ज्यादा फर्क है। अगर किसी अभिनेता की फिल्म फ्लॉप हो जाए, तो भी लोग उसको अपने दिल में जगह दिए रहते हैं। लेकिन कोई राजनेता अगर फ्लॉप हो जाए, तो लोग उसे दिल से निकाल कर दलदल में फेंक देते हैं। पवन बंसल की हालत हम और आप देख ही रहे हैं!

धत्त तेरे की। बात तो अपन बेहद खूबसूरत रेखा की कर रहे थे, और पता नहीं कलमुंहे पवन बंसल कहां से बीच में टपक गए। तो, रेखा इस बार संसद के सत्र के अवसान से एक दिन पहले पार्लियामेंट आई थी। हमारे माननीय पीएम सरदार श्री मनमोहन सिंह साहब रोज संसद आते हैं, पर न खबर बनती है न उनको कोई नहीं देखता है। घूरकर तो खैर उनमें क्या पा लेंगे। पर, रेखा उस दिन जब संसद में आ, तो देश भर में खबर भी बनी और सांसद भी उन्हें जमकर देखने लगे और घूर भी रहे थे। हमारे संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला उन्हें लेकर आ रहे थे, तो नजारा देखने लायक था। क्या बुजुर्ग, क्या नौजवान, सारे के सारे सांसद और मंत्री भी रेखा को देखे ही जा रहे थे, घूर रहे थे और उनकी एक झलक पर मुग्ध और मुदित भी हो रहे थे। वह संसद है, जहां हाल ही में महिलाओं को घूरने के खिलाफ कानून पर बहस हो रही थी। पर, कानून बनानेवाले ही घूर रहे थे। रेखा को देखनेवाले सांसदों के मन में क्या भाव रहे होंगे, इसकी कल्पना आप कर सकते हैं। पर, यह रेखा का जलवा है। वह रेखा, जो शोहरत, सफलता, सौंदर्य और कामयाबी के शिखर पर हैं, और कुछ दिन बाद पूरे 60 साल की होने वाली हैं, पर जलवा अब भी जोरदार है। भरोसा नहीं हो, तो सांसद महोदया के सामने खड़े होकर बाकी सांसदों की तरह अपने दिल की धड़कन नाप कर देख लीजिए।
बेहद दिलकश, जवां और खूबसूरत रेखा अब ऊम्रदराज और अकेली हैं। यह एक ऐसा सच है, जो चकाचौंध से भरी उनकी जिंदगी के मुकाबले बहुत कड़वा है। सच्चाई यह कि रेखा की जिंदगी में प्यार तो कई बार और कई शक्लों में आया, लेकिन जिस स्थाई सहारे और स्नेह की उन्हें स्थायी तलाश रही वह स्थायी रूप से गायब ही रहा। अब जिंदगी के साठ साल पार के मुकाम पर संसद उनकी साथी है। रेखा राज्यसभा में हैं। पर, अपना मानना है कि जब भी संसद में जाती होगी, तो लोकसभा की उस कुर्सी को भरपूर निहारने की उनकी ललक जरूर जोर मारती होगी, जिस पर राजीव गांधी के जमाने में उनके दोस्त अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से चुनकर आने के बाद बैठा करते थे। आकांक्षाओं की अतृप्त लालसा किसी से भी इतना तो करवाने का हक रखती ही है। वैसे, संसद के इस सफर में रेखा के पास पांच साल अभी बाकी हैं। उस कुर्सी को
वह तलाश ही लेंगी। पर सवाल सिर्फ पांच साल का नहीं है। रेखा का जलवा आनेवाले कई साल और जिंदा रहेगा। क्योंकि अपन नहीं जानते कि दुनिया में अब तक तो कोई दूसरी रेखा नहीं जन्मी, जो रेखा की रेखा के सामने अपनी रेखा खींचकर रेखा की रेखा को छोटा साबित कर सके। आप जानते हो तो बताना!
लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.





