एक बड़ी पुरानी कहावत है कि 'जब समय खराब हो तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट खाता है'। बचपन से सुनता आया हूँ, लेकिन मैं ठहरा मंद बुद्धि, बातें ज़रा देर से ही समझ में आती हैं। अच्छा, समझ में क्या आती है, बस कुछ-कुछ अंदाज लगा लेता हूँ। ठीक हो गया तो वाह-वाह नहीं तो थू-थू, अपने बाप का क्या जाता है? वैसे ये पुराने लोग भी बहुत फुरसती थे। कहावते बनाते ही रहते थे। बड़े शातिर भी थे। जो कहना है इशारों में कहते थे। तो इस कहावत का इशारा जो मैंने समझा वह ये था कि सत्ता जो है, सो ऊँट की तरह होती है।
पर पिछले दिनों सत्ता रूपी ऊँट पर बैठे व्यक्ति की जो हालत देखी, कहावत का मतलब तत्काल समझ में आ गया। ऐसे शाही ऊँट पर बैठे आदमी को गली मोहल्ले के आलतू फालतू कुते ऐसे- वैसे, यहाँ -वहाँ काटे तो बुरा तो लगेगा ही। ऊँट भी ऐसा कि कोई उसे जहर कहता है, कोई पावर। कोई लालच तो कोई कोयले की कोठरी। किसी की माँ इसे पा कर रात भर रोती है तो कोई माँ इसे पाने वाले के माथे पर टीका लगाती है। कोई इस ऊँट पर जबरदस्ती बैठा दिया जाता है तो कोई बैठने के लिए मरे जाये पर उसे बैठाने का आश्वासन देने को भी कोई तैयार नहीं होता।
वैसे तो कोई भेड़ चराने वाला गडरिया भी बता सकता है कि इस टेढ़े-मेढे ऊँट पर बैठना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन लोग मानते कहाँ हैं? गड़रिये से भी गए बीते है नामाकूल। इस पर बैठने के लिए क्या क्या जतन नहीं करते? अरबों खरबों खर्च कर देते हैं। जाने कैसे-कैसे लोगों के हाथ पैर जोड़ते हैं, और ना जाने कहाँ-कहाँ घूमते फिरते हैं। अच्छा! वैसे तो कुत्ते भी तो कितने बदल गए हैं आज-कल? उनमें भी कुत्तई तो जैसे बची ही नहीं। जिन पर भौंकना चाहिए या फिर जिन्हें काटना चाहिए उनके सामने ही दुम हिलाते हैं। मेरे शहर में जब भी चोरी होती है या कत्ल होता है, वहां कुत्ता लाया जाता है। जाने क्या क्या सुंघाते हैं उसे तब वह घर से बाहर आता है। सबके चहरे खिल जाते हैं कि बस, अब अपराधी पकड़ा ही गया। लेकिन वह नामुराद भी थोड़ा सा इधर उधर घूम कर मुख्य सड़क पर खड़ा हो जाता है। उसका ट्रेनर भी बड़ी मासूमियत से कह देता है कि "सर यहाँ से शायद वह गाड़ी या बस में बैठ कर भागा है"। अफसर भी मान लेता है। आज तक एक केस में भी अपराधी को नहीं पकड़ा इस कुत्ते ने। बहुत बदल गए हैं कुत्ते।
वैसे बदले भी क्यों नहीं? हाँ! ज़माना बदल सकता है, सरकारें बदल सकती हैं, आदमी बदल सकता है, ईमान बदल सकता है, गवाह बदल सकते हैं, जांच कमेटी बदल सकती है, यहाँ तक कि जांच रिपोर्ट तक बदल सकती है तो फिर बेचारे कुत्ते ने क्या बिगाड़ा है? वह क्यों नहीं बदले? ख़ैर! जिसने भी यह कहावत बनाई होगी थोड़ा सा उसके दर्द की कल्पना करके देखिए। ना जाने कहाँ- कहाँ और कैसे- कैसे काटा होगा उसे, तब जा कर बनी होगी यह कहावत। अलबत्ता हम तो यही दुआ करें कि ना हमें इस ऊँट पर बैठना पड़े और ना कुत्ता काटे।
लेखक दिलीप लोकरे इंदौर के निवासी हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्बर -9425082194 के जरिए किया जा सकता है.





