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साल दर साल कम हो रही सेंसर के कैची की ‘धार’

: बोल्ड व आपत्तिजनक सीन व संवादों पर अब पहले जैसा नहीं रहा एतराज : दिल्ली बलात्कार मामले के बाद ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दरअसल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड दिन प्रतिदिन फिल्मों के दृश्यों पर कैची चलाने के मामले में उदार होता जा रहा है। पिछले पांच सालों के दौरान सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्मों के दृश्यों पर कैची चलाने में कमी आई है। इस बात का खुलासा सूचना अधिकार कानून (आरटीआई) से मिली जानकारी से हुआ है।

: बोल्ड व आपत्तिजनक सीन व संवादों पर अब पहले जैसा नहीं रहा एतराज : दिल्ली बलात्कार मामले के बाद ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दरअसल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड दिन प्रतिदिन फिल्मों के दृश्यों पर कैची चलाने के मामले में उदार होता जा रहा है। पिछले पांच सालों के दौरान सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्मों के दृश्यों पर कैची चलाने में कमी आई है। इस बात का खुलासा सूचना अधिकार कानून (आरटीआई) से मिली जानकारी से हुआ है।

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार साल दर साल सेंसर बोर्ड की परीक्षण समिति की ओर से की जाने वाली काट-छांट में कमी आ रही है। साल 2008 में सेंसर बोर्ड पास आई 1325 फिल्मों में से कुल 521 दृश्यों को काटने की सिफारिश की थी। जबकि 2009 में 1288 फिल्मों के 529 दृश्यों व संवादों पर कैची चलाई गई। 2010 में फिल्म सेंसर बोर्ड ने कुल 1274 फिल्मों का परीक्षण किया, जिसमें 432 दृश्यों को काटने को कहा गया। साल 2011 में सेंसर बोर्ड ने 1255 फिल्मों का परीक्षण कर इनके 444 दृश्यों व संवादों पर कैंची चलाई। जबकि 2012 में सेंसर बोर्ड द्वारा देखी गई 880 फिल्मों में केवल 330 दृश्य व संवाद काटे गए। 2008 में हर 100 फिल्मों पर 152 दृश्य-संवाद काटे गए, जो 2012 में घट कर 21 हो गया। इस जानकारी को हासिल करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता बिहार धुर्वे कहते हैं कि इन आंकड़ों को तो देख कर यहीं लगता है कि सेंसर बोर्ड फिल्म निर्माताओं के दबाव में काम करता है।

सेंसर बोर्ड के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कई बार ऐसा होता है कि सेंसर बोर्ड की एक्जामिन कमेटी जिस फिल्म को 'ए' प्रमाणपत्र देती हैं, उसे बाद में रिवाईजिंग कमेटी के सदस्य 'यूए' (अभिभावकों के साथ बच्चों के देखने लायक फिल्म) प्रमाण पत्र जारी कर देती है। खासकर सेंसर बोर्ड के फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े सदस्यों को बोल्ड दृश्यों पर आपत्ति नहीं होती। हाल ही में आई फिल्म 'एक थी डायन को 'यूए' प्रमाण पत्र जारी किया गया है। जबकि आमतौर पर भूतप्रेत वाली फिल्मों को 'ए' प्रमाणपत्र ही जारी किया जाता है।

सूत्रों के अनुसार सेंसर बोर्ड की एक्जामिन कमेटी ने इस फिल्म को 'ए' प्रमाण पत्र ही दिया था। पर फिल्म की निर्माता एकता कपूर ने सेंसर बोर्ड की एक्जामिन कमेटी के फैसले को नहीं माना और फिल्म को बोर्ड की रिवाईजिंग कमेटी में ले गई, जहां इस फिल्म को 'यूए' प्रमाणपत्र मिल गया। बता दें कि 'ए' प्रमाणपत्र वाली फिल्में टेलिविजन पर नहीं दिखाई जा सकती। जबकि 'यूए' प्रमाणपत्र वाली फिल्मों को बगैर किसी अतिरिक्त काटछांट के टेलिविजन पर प्रसारित किया जा सकता है।

सेंसर बोर्ड के पूर्व अधिकारी नाराज : फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को लेकर आम आदमी तो नाराजगी जताता ही रहता है। पर अभी कुछ महीनों पहले तक सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी (मुंबई) रहे जीतेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी नाराजगी फेसबुक के माध्यम से जाहिर की है। हाल ही में रिलिज हुई फिल्म 'शूटआऊट एट वडाला' के कई दृश्यों व संवादों को न काटने पर श्री सिंह ने आश्चर्य जताया है। फिलहाल प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे सिंह ने फेसबुक पर टिप्पणी की है, ''अब समय आ गया है कि सेंसर बोर्ड के उस अधिकारी के खिलाफ गिरफ्तारी जैसे सख्त कदम उठाए जाए, जिसनें 'शूटआऊट एट वडाला' में ऐसे दृश्यों को पास किया है।''

सेंसर बोर्ड के पूर्व सदस्य ब्रजमोहन शर्मा कहते हैं कि सेंसर बोर्ड अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रहा है। टीवी पर ऐसी फिल्मों के प्रसारण की इजाजत दी जा रही है जिसे परिवार के साथ देखा नहीं जा सकता। सेंसर बोर्ड जब किसी फिल्म को 'यूए' प्रमाण पत्र दे देता है तो वह फिल्म थियेटर के साथ-साथ बगैर किसी काटछांट के टीवी पर भी आ जाती है। इस लिए सेंसर बोर्ड को किसी फिल्म को 'यूए' प्रमाण पत्र देते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि ये फिल्म आज नहीं तो कल टीवी पर दिखाई जाएंगी और टीवी की पहुंच घर-घर तक है।

मुंबई के वरिष्‍ठ पत्रकार विजय सिंह की रिपोर्ट.

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