पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के प्रमुख नवाज शरीफ तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभालने जा रहे हैं। सत्ता में नवाज की वापसी से भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्तों की उम्मीद बढ़ चली है। चुनावी अभियान के दौर में वे लगातार यह कहते रहे हैं कि भारत से बेहतर रिश्ता बनाना, उनका एक प्रमुख राजनीतिक एजेंडा रहेगा। उन्होंने यह इच्छा भी जताई है कि वे चाहेंगे कि सेना में चुनी हुई सरकार का अंकुश बढ़े। ताकि, वह बार-बार लोकतांत्रिक सरकार का गला घोंटने की स्थिति में न रहे।
शरीफ की वापसी को लेकर भारत सरकार ने भी सकारात्मक उम्मीद जताई है। लंबी राजनीतिक जद्दोजहद के बाद भले शरीफ को बड़ी सफलता मिल गई हो, लेकिन उनकी असली चुनौतियों की अग्नि-परीक्षा तो सत्ता में आने के बाद शुरू होगी। क्योंकि, पाकिस्तान कई बड़ी आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे कट्टरवादी एवं खूंखार तालिबानियों को कैसे काबू में लाएंगे? क्योंकि, तालिबान के प्रति उनका रुख लगातार नरम रहा है। हालांकि, वे यही कहते आए हैं कि सत्ता में आने के बाद वे तालिबान से एक सम्मान जनक समझौता कर लेंगे। ताकि, देश में शांति की बहाली हो जाए।
11 मई को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के चुनाव हुए थे। तालिबान सहित कई और कट्टर जमातों की धमकियों के बावजूद यहां लोगों ने खुलकर अपने मत का प्रयोग किया। मतदान के दिन भी पूरे देश में जमकर हिंसा हुई। इसमें दो दर्जन से ज्यादा लोग मारे भी गए। 2008 के चुनाव में जहां केवल 43 प्रतिशत मतदान हो पाया था। जबकि, इस बार यह आंकड़ा 60 फीसदी तक पहुंच गया। यहां के 66 सालों के इतिहास में पहली ऐसा हुआ कि एक चुनी हुई सरकार को पांच साल तक अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका मिला। पाकिस्तान के मतदाताओं को पहली बार यह नसीब हुआ है कि वह सत्तारूढ़ दल को वोट के जरिए बदल दे और अपनी पसंद की दूसरी सरकार चुन ले। इस मायने में यह चुनाव यहां के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि 66 सालों में आधे से अधिक समय यहां सेना का शासन ही रहा है। सेना के जनरल लगातार यहां चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंक देते रहे हैं। पहली बार सीधे लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हो रहा है। पड़ोसी देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की इस मजबूती के संकेत से भारत को भी नई उम्मीदें बननी लगी हैं।
1999 में नवाज शरीफ की चुनी हुई सरकार को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपना शिकार बना लिया था। मुशर्रफ ने उनकी सरकार को बर्खास्त करके शरीफ को गिरफ्तार करा लिया था। उन पर ऐसी आपराधिक धाराएं लगाई गई थीं कि उन्हें अदालत से फांसी की सजा भी मिल जाती। फांसी की बजाए अदालत ने एक मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना भी दी थी। 1999 में ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पहल से शरीफ की जान बच पाई थी। क्लिंटन ने जनरल मुशर्रफ से बात करके एक बीच का रास्ता निकलवा दिया था। इसके तहत नवाज को सपरिवार सऊदी अरब में निर्वासित कर दिया गया था। उन पर घोटालों के कई बडेÞ मामले भी लाद दिए गए थे।
अमेरिका और सऊदी अरब की खास कृपा के चलते 2007 में नवाज शरीफ पाकिस्तान लौट पाए थे। 2008 के चुनाव में इनकी पार्टी ने हिस्सा भी लिया था। लेकिन, ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई थी। क्योंकि, 2007 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की चर्चित नेता बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी। इससे पीपीपी के प्रति देशभर में सहानुभूति की लहर पैदा हो गई थी। पीपीपी की कमान बेनजीर के बाद उनके पति आसिफ अली जरदारी के पास आ गई थी। हालांकि, देशभर में सहानुभूति का खास लाभ लेने के लिए जरदारी ने अपने बेटे बिलावल भुट्टो को पार्टी का चेयरमैन बना दिया था। लेकिन, इस दौर में बिलावल देश के बाहर अपनी पढ़ाई करने में व्यस्त थे। चुनाव में भारी सफलता मिलने के बाद जरदारी राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचे। अभी भी वे इस पद पर बरकरार हैं।
हालांकि, कुछ महीने बाद ही वहां राष्ट्रपति पद का भी चुनाव होना है। लेकिन, नेशनल असेंबली और सूबाई असेंबलियों के चुनाव में पीपीपी का प्रदर्शन काफी खराब रहा है। चार प्रांतीय विधानसभाओं में उसे केवल सिंध में ही बहुमत मिल पाया है। ऐसे में तय माना जा रहा है कि जरदारी किसी भी तरह से राष्ट्रपति चुनाव की रेस में टिक नहीं पाएंगे। वैसे तो पाकिस्तान में पीपीपी ही सबसे पुरानी पार्टी है। सैद्धांतिक रूप से इसकी छवि एक प्रगृतिशील पार्टी की रही है। लेकिन, नेता के रूप में जरदारी हमेशा से विवादित रहे हैं। बेनजीर भुट्टो की सरकार के दौर में उन्हें ‘मिस्टर 10 परसेंट’ भी कहा जाता था। क्योंकि, उन पर आरोप लगते थे कि वे बड़े सरकारी सौदों में मोटा कमीशन लेने की जुगाड़ कर लेते हैं। पति की इस छवि की कई बार बड़ी राजनीतिक कीमत तेज-तर्रार नेता बेनजीर को देनी पड़ी थी।
बेनजीर के मुकाबले नवाज शरीफ की राजनीतिक छवि निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले नेता की रही है। यूं भी शरीफ का जन्म एक बड़े कारोबारी घराने में ही हुआ था। पंजाब में स्टील का उनका बड़ा कारोबार रहा है। लेकिन, जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के दौर में बड़े उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की नीति बनी थी। इसी के तहत शरीफ घराने की स्टील फैक्ट्रियां भी सरकार के कब्जे में आ गई थीं। स्टील उद्योग में अपना दबदबा फिर से कायम करने के लक्ष्य से ही शरीफ ने राजनीति की दुनिया में कदम रखा था। जनरल जिया उल हक की सत्ता के दौर में भुट्टो को फांसी की सजा हो गई थी। इसके बाद जिया उल हक की खास कृपा पर 1985 में शरीफ पाकिस्तान के सबसे बडेÞ राज्य पंजाब के मुख्यमंत्री बन बैठे थे। इसके पहले 1981 में वे पंजाब के राज्यपाल के सलाहकार मंडल में शामिल कर लिए गए थे। इससे लालबत्ती वाला उनका राजनीतिक करियर शुरू हो गया था।
जनरल जिया की मौत के बाद 1988 में बेनजीर भुट्टो चुनाव जीतकर सत्ता में आ गई थीं। इस वक्त तक शरीफ पाकिस्तान में राजनीति के बड़े खिलाड़ी बन गए थे। बेनजीर के शासन के दौर में शरीफ विपक्ष के प्रमुख नेता के रूप में उभरे थे। पहली बार 1990 में वे देश के प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे थे। लेकिन, जुलाई 1993 तक वे सत्ता में रह पाए। दूसरी बार वे फरवरी 1997 में प्रधानमंत्री बने और अक्टूबर 1999 तक सत्ता में रहे। इसी वर्ष कारगिल को लेकर भारत-पाक का युद्ध शरीफ के कार्यकाल में ही हुआ था। जबकि, कारगिल प्रकरण के कुछ महीने पहले ही शरीफ ने दोनों देशों के रिश्ते ठीक करने के लिए ऐतिहासिक पहल की शुरुआत की थी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर भी पहुंचे थे। दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने के कई ऐतिहासिक समझौते भी हुए थे। लेकिन, इसके कुछ महीने बाद ही घुसपैठियों के भेष में पाक के सैनिकों ने कारगिल की पहाड़ियों में नापाक कारनामा कर डाला था।
इसके चलते दोनों देशों के बीच कई दिनों तक युद्ध भी हुआ था। जब भारत ने आक्रामक रुख अपनाया, तो शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति की शरण में जाकर बीच-बचाव की गुहार लगाई थी। इसके बाद ही युद्ध विराम हो पाया था। लेकिन, इस प्रकरण के बाद जनरल मुशर्रफ ने शरीफ सरकार को बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद तो उन्हें जान बचाने के लिए सऊदी अरब में आठ साल कर निर्वासित जीवन जीना पड़ा। यह अलग बात है कि शरीफ लगातार यही सफाई देते रहे हैं कि कारगिल प्रकरण में उन्हें जनरल मुशर्रफ ने एकदम अंधेरे में रखा था। उन्हें भनक ही नहीं लग पाई थी कि सेना यहां क्या गुल खिला रही है? राजनीतिक विश्लेषक, शरीफ की इस सफाई को एक हद तक सही भी मानते हैं। उनका मानना है कि यदि जनरल परवेज ने कारगिल का तमाशा नहीं किया होता, तो वाजपेयी और शरीफ की ऐतिहासिक पहल से दोनों देशों के रिश्ते बहुत अच्छे हो गए होते।
विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने उम्मीद जाहिर की है कि चुनाव अभियान के दौरान शरीफ दोनों देशों के रिश्तों को लेकर जो संकल्प जताते रहे हैं, यदि सत्ता में आने के बाद भी उनकी नीति-रीति ऐसी ही रही, तो बहुत अच्छा रहेगा। जिस दौर में चुनाव के नतीजे आ रहे थे, नवाज की पार्टी को निर्णायक बढ़त मिलने लगी थी, उसी समय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बधाई संदेश भेज दिया था। इससे शरीफ खासे गदगद भी हुए। उन्होंने प्रधानमंत्री से कह दिया कि यदि वे उनके शपथ समारोह में शिरकत करें, तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा। मनमोहन सिंह ने शरीफ को भारत आने का न्यौता दे दिया है। जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है।
25, दिसंबर 1949 में नवाज का जन्म लाहौर में हुआ था। उन्होंने लाहौर यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि ली। बाद में, कानून की डिग्री भी ली। 1976 में वे मुस्लिम लीग में सक्रिय हुए थे। कहा तो यही जाता है कि तत्कालीन भुट्टो सरकार के कब्जे में गए पारिवारिक स्टील व्यापार को फिर से पाने का मकसद ही, उन्हें राजनीति में घसीट लाया था। 1980 में पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल गुलाम जिलानी खान की खास कृपा से वे लाहौर में युवा नेता के तौर पर चर्चित हो गए थे। अगले साल ही उन्हें पंजाब सरकार के सलाहकार बोर्ड में शामिल कर लिया गया था। शरीफ के परिवार की पहचान एक बडेÞ औद्योगिक घराने के रूप में भी है। उनकी शुमार देश के चंद अमीरों में भी होती है। 1990 में जब वे पहले बार प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर की राष्ट्रीयकरण की नीति को पलटने का काम किया। कई बड़े उद्योगों का निजीकरण कर दिया गया। इसके चलते इस दौर में 115 सरकारी उद्योगों का निजीकरण किया गया था। इसमें तमाम बड़े घोटालों के आरोप भी उन पर लगे थे।
नेशनल असेंबली की 272 सीटों में से 126 सीटें नवाज की पार्टी को हासिल हो चुकी हैं। ऐसे में, उसे साधारण बहुमत के लिए 11 सीटों की कमी है। शरीफ की पार्टी के प्रवक्ताओं ने तो यही दावा किया है कि वे लोग निर्दलीय उम्मीदवारों की मदद से सरकार बना लेंगे। हालांकि, कयास यह भी चल रहे हैं कि नवाज कुछ छोटी पार्टियों को साथ लेकर गठबंधन की सरकार बना सकते हैं। ताकि, सरकार की मजबूती ज्यादा हो जाए। इस चुनाव में पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई), पीपीपी को पछाड़ते हुए दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। खैबर तख्तून ख्वाह प्रांत में भी इमरान की पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। पीपीपी का प्रभाव सिंध तक ही सीमित रह गया है। जबकि, पंजाब प्रांत में नवाज शरीफ की पार्टी बड़े बहुमत से चुनाव जीती है। यहां 2008 से ही नवाज के भाई शाहबाज शरीफ सत्ता में रहे हैं। इस बार भी चुनाव में जीत होने की वजह से वे दूसरी पारी भी खेलने के लिए तैयार हो गए हैं।
63 वर्षीय नवाज शरीफ के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। पिछले वर्षों में हिंसक तालिबानियों का प्रभाव लगातार बढ़ा है। इसके साथ ही और कई कट्टर जमातों ने भी अपनी ताकत बढ़ा ली है। तालिबान तो पश्चिमोत्तर के कई हिस्सों में अपनी सामानांतर सरकार तक चलाते हैं। अगले साल पड़ोसी देश अफगानिस्तान से पश्चिम देशों की सेनाएं वापस लौट जाएंगी। ऐसे में, बड़ा खतरा पाकिस्तान के लिए खड़ा होने वाला है। क्योंकि, वहां की तालिबानी ताकतें पाक सरकार के लिए ज्यादा आतंकी मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। शायद, इसी खतरे को देखते हुए शरीफ कह रहे हैं कि वे तालिबानियों से कोई समझौता कर लेंगे। ताकि, मारकाट की स्थिति न रहे। अब देखने वाली बात यह है कि तालिबानियों के प्रति नरम रुख अपनाने वाले शरीफ कैसे एक साथ चरमपंथियों को साधकर भारत से बेहतरीन रिश्ते बनाने की उम्मीद कर सकते हैं? क्योंकि, चरमपंथी ताकतें शरीफ सरकार को शायद ही इजाजत दें कि भारत से दोस्ती के रिश्ते किए जाएं।
ये लोग कश्मीर के मामले में भी पाकिस्तान सरकार को नरम रुख अपनाने की इजाजत शायद ही दें?
पिछले चार सालों में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति काफी खराब हुई है। सकल घरेलू उत्पादन दर में भारी गिरावट दर्ज हुई है। पंजाब प्रांत के कुछ शहरी क्षेत्रों को छोड़कर पूरे देश में बिजली की भारी किल्लत है। 24 घंटे में महज चार से छह घंटे बिजली की आपूर्ति हो पा रही है। चुनावी अभियान के दौर में ड्रोन हमले आदि मुद्दों पर नवाज, अमेरिकी नीति के खिलाफ जमकर बोलते रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद वे अमेरिकी विरोध की नीति पर कायम रह पाएंगे? यदि सेना के खौफ से उन्होंने अमेरिका के प्रति एकदम यू-टर्न लिया तो, कट्टर जमातें शरीफ सरकार के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती हैं। एक खास बात यह है कि पहले भी दो बार प्रधानमंत्री रहने के बाद भी शरीफ की राजनीतिक
छवि पंजाब के नेता के तौर पर ही रही है। अब उनके लिए बड़ी चुनौती यह भी है कि वे अपनी छवि पूरे देश के सर्वमान्य नेता के रूप में बनाएं। यदि इसमें वे कामयाब नहीं हुए, तो बलूचिस्तान और फख्तून जैसे प्रांतों में विद्रोह की आग बढ़ने का खतरा माना जा रहा है। यूं तो भारत में शरीफ की सरकार से काफी उम्मीदें पाली जा रही है। लेकिन, प्रधानमंत्री के तौर पर वे रिश्तों में कितनी ‘शराफत’ दिखा पाते हैं, इसका टेस्ट होना तो बाकी है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





