: भड़ास ने सोच को दिए शब्द : बात उन दिनों की है, जब अखबार का प्रकाशन पहाड़ खोदने सरीखा होता था. अखबार बोले तो तलवार से तेज़. पैना. धारदार. एक ही वार में सामने वाले का काम तमाम. हालाँकि ये सच है कि अखबार निकलने के लिए जिगर चाहिए होता था. जिसके पास ऐसा जिगर होता वो न्यूज़ पेपर का पंजीयन करा अपने काम का श्रीगणेश कर देते. सेवा का ज़ज्बा दिखता था. विज्ञापन के लिए इतनी मारा-मारी उन दिनों नहीं होती थी. आज का ब्यूरो उस समय का प्रतिनिधि होता था.
मैंने उस समय के पत्रकारों की शैली को करीब से जाना तो लगा जैसे इससे मुश्किल काम दूसरा नहीं हो सकता. काम बहुत मेहनत का, हालांकि नीचे से लेकर उपर तक काम की गज़ब की इज्ज़त मिलती थी. कलेक्टर की बोलती बंद कर दो, इतना पॉवर. जो लिख दिया उसमे मानो भूचाल आ गया. किसी वजह से भूचाल न भी आये तो सामने वाले की पतलून तो गीली हो जाती थी. इसीलिए कहा जाता था- तलवार से ज्यादा अखबार में ताक़त होती है,
भड़ास को पढने के बाद तो जैसे मेरी आँखे खुल गयी. सोशल मीडिया का ये स्वरूप. वाह! इससे बेहतर शायद ही कुछ और हो. सब कुछ भड़ास में. सुख-दुःख, आवाजाही, साक्षात्कार, सभी ऑनलाइन. चाहे सुदूर गावं में पढ़ लो या फिर देश-विदेश के किसी भी कोने में भड़ास ओपन कर अपनी भड़ास को शांत कर लो. वो दिन याद आते हैं जब ट्रेडील के जरिये अखबार का प्रकाशन होता था. पत्रकार पूरा दिन न्यूज़ में खपा देता. आधी रात तक अपने मोटे कांच के चश्मे से बारीक़ अक्षर जमाता और तीसरे पहर में शुरू होता अखबार का प्रकाशन.
आज सब कुछ फ़ास्ट, सुपर फ़ास्ट का जमाना है, खबर अपलोड हुई नहीं कि प्रतिक्रिया चालू. आज हम सब की जुबान भड़ास के यशवंतजी की पहल का स्वागत करती है. लगता है जैसे भड़ास न होता तो किसके आगे अपना दुखड़े सुनाते? एक पत्रकार के जीवन का किस्सा बार-बार बयाँ करने से हंसने वालों की तादात भले बढती हो लेकिन लोगों को वास्तविकता का पता चलता है. जिस संसथान में काम करो वहां की कमियाँ कैसे दूर हो? ऐसे कैसे शोसण रुकेगा? इन सबका एक ही जवाब है- भड़ास.
यूं ही कट जायेगा सफ़र साथ चलने में…बस चलते रहिये,,,
शुभकामनायें
दिलीप सिकरवार





