Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

भड़ास को पढने के बाद तो जैसे मेरी आँखे खुल गयी

: भड़ास ने सोच को दिए शब्द : बात उन दिनों की है, जब अखबार का प्रकाशन पहाड़ खोदने सरीखा होता था. अखबार बोले तो तलवार से तेज़. पैना. धारदार.  एक ही वार में सामने वाले का काम तमाम. हालाँकि ये सच है कि अखबार निकलने के लिए जिगर चाहिए होता था. जिसके पास ऐसा जिगर होता वो न्यूज़ पेपर का पंजीयन करा अपने काम का श्रीगणेश कर देते. सेवा का ज़ज्बा दिखता था. विज्ञापन के लिए इतनी मारा-मारी उन दिनों नहीं होती थी. आज का ब्यूरो उस समय का प्रतिनिधि होता था.

: भड़ास ने सोच को दिए शब्द : बात उन दिनों की है, जब अखबार का प्रकाशन पहाड़ खोदने सरीखा होता था. अखबार बोले तो तलवार से तेज़. पैना. धारदार.  एक ही वार में सामने वाले का काम तमाम. हालाँकि ये सच है कि अखबार निकलने के लिए जिगर चाहिए होता था. जिसके पास ऐसा जिगर होता वो न्यूज़ पेपर का पंजीयन करा अपने काम का श्रीगणेश कर देते. सेवा का ज़ज्बा दिखता था. विज्ञापन के लिए इतनी मारा-मारी उन दिनों नहीं होती थी. आज का ब्यूरो उस समय का प्रतिनिधि होता था.

मैंने उस समय के पत्रकारों की शैली को करीब से जाना तो लगा जैसे इससे मुश्किल काम दूसरा नहीं हो सकता. काम बहुत मेहनत का, हालांकि नीचे से लेकर उपर तक काम की गज़ब की इज्ज़त मिलती थी. कलेक्टर की बोलती बंद कर दो, इतना पॉवर. जो लिख दिया उसमे मानो भूचाल आ गया. किसी वजह से भूचाल न भी आये तो सामने वाले की पतलून तो गीली हो जाती थी. इसीलिए कहा जाता था- तलवार से ज्यादा अखबार में ताक़त होती है,

भड़ास को पढने के बाद तो जैसे मेरी आँखे खुल गयी. सोशल मीडिया का ये स्वरूप. वाह! इससे बेहतर शायद ही कुछ और हो. सब कुछ भड़ास में. सुख-दुःख, आवाजाही, साक्षात्कार, सभी ऑनलाइन. चाहे सुदूर गावं में पढ़ लो या फिर देश-विदेश के किसी भी कोने में भड़ास ओपन  कर अपनी भड़ास को शांत कर लो. वो दिन याद आते हैं जब ट्रेडील के जरिये अखबार का प्रकाशन होता था. पत्रकार पूरा दिन न्यूज़ में खपा देता. आधी रात तक अपने मोटे कांच के चश्मे से बारीक़ अक्षर जमाता और तीसरे पहर में शुरू होता अखबार का प्रकाशन.

आज सब कुछ फ़ास्ट, सुपर फ़ास्ट का जमाना है, खबर अपलोड हुई नहीं कि प्रतिक्रिया चालू. आज हम सब की जुबान भड़ास के यशवंतजी की पहल का स्वागत करती है. लगता है जैसे भड़ास न होता तो किसके आगे अपना दुखड़े सुनाते? एक पत्रकार के जीवन का किस्सा बार-बार बयाँ करने से हंसने वालों की तादात भले बढती हो लेकिन लोगों को वास्तविकता का पता चलता है. जिस संसथान में काम करो वहां की कमियाँ कैसे दूर हो? ऐसे कैसे शोसण रुकेगा? इन सबका एक ही जवाब है- भड़ास.

यूं ही कट जायेगा सफ़र साथ चलने में…बस चलते रहिये,,,

शुभकामनायें

दिलीप सिकरवार

[email protected]


tag- b4m 5thbday

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...