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अगर आप मुसलमान हैं तो दैनिक जागरण में संपादक नहीं बन सकते!

: ( कानाफूसी ) : दैनिक जागरण सांप्रदायिक अखबार है, यह तो सबको पता है लेकिन नई सूचना यह है कि यहां मुसलमानों को संपादक बनाए जाने पर अघोषित प्रतिबंध है. यही कारण है कि जिंदगी व करियर का लंबा समय दैनिक जागरण को होम करने वाले कई मुस्लिम पत्रकारों ने दैनिक जागरण से इस्तीफा देना उचित समझा है.

: ( कानाफूसी ) : दैनिक जागरण सांप्रदायिक अखबार है, यह तो सबको पता है लेकिन नई सूचना यह है कि यहां मुसलमानों को संपादक बनाए जाने पर अघोषित प्रतिबंध है. यही कारण है कि जिंदगी व करियर का लंबा समय दैनिक जागरण को होम करने वाले कई मुस्लिम पत्रकारों ने दैनिक जागरण से इस्तीफा देना उचित समझा है.

ताजा मामला दैनिक जागरण, लखनऊ के नदीम का है. बीस वर्षों से पूरी प्रतिबद्धता और निष्ठा के साथ दैनिक जागरण के साथ काम कर रहे नदीम को दरकिनार कर दूसरे लोगों को संपादक बनाकर लाया जाता रहा या फिर दैनिक जागरण, लखनऊ के अन्य लोगों को संपादक बनाकर दूसरी यूनिट्स में भेजा जाता रहा. पर नदीम को कभी संपादक बनाने लायक नहीं समझा गया. इस कारण भारी और बुझे मन से उन्होंने दैनिक जागरण छोड़ने का फैसला ले लिया. उन्होंने नवभारत टाइम्स, लखनऊ के साथ नई पारी शुरू की है.

दूसरा ताजा मामला दैनिक जागरण, मेरठ के रियाज हाशमी का है. रियाज हाशमी ने दैनिक जागरण, मेरठ के साथ जुड़कर कई दशक तक दैनिक जागरण की सेवा की. सहारनपुर के ब्यूरो प्रमुख के रूप में जागरण का जमकर प्रसार बढ़वाया. हर मोर्चे पर रियाज दैनिक जागरण के लिए संकटमोचक साबित हुए. लेकिन दैनिक जागरण ने उन्हें कंभी संपादक बनाने लायक नहीं समझा. उन्हें हमेशा लो प्रोफाइल में रखा गया और उनसे कम अनुभव के लोगों को संपादक बनाया जाता रहा, प्रमोट किया जाता रहा. आखिरकार जब रियाज को लगा कि उनके दिन दैनिक जागरण में कभी सर्वश्रेष्ठ नहीं होंगे तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया और मेरठ से प्रकाशित हुए नए अखबार नेशनल दुनिया से जुड़ गए.

ये दो उदाहरण तो बिलकुल ताजा ताजा हैं. कई अन्य पुराने उदाहरण भी हैं. दैनिक जागरण, मेरठ में कार्यरत एक पत्रकार पाशा ने अल्पसंख्यक आयोग में शिकायत की कि उन्हें मुस्लिम होने के कारण जागरण प्रबंधन परेशान करता है और नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर कर रहा है. बाद में अल्पसंख्यक आयोग के हस्तक्षेप पर पाशा कुछ दिन नौकरी कर पाए लेकिन उन्हें बाद में इस्तीफा देकर जाना पड़ा.

असल में दैनिक जागरण में मालिक हमेशा से ब्राह्मणों को प्रमोट करते रहे हैं. यहा मजबूत ब्राह्मण लाबी हैं. अल्पसंख्यक और दलित-पिछड़े न के बराबर हैं. चाहें विष्णु त्रिपाठी हों या प्रशांत मिश्र या रामेश्वर पांडेय या दिलीव अवस्थी या शशांक शेखर त्रिपाठी… ज्यादातर वरिष्ठ लोग ब्राह्मण हैं और सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं हैं बल्कि अवचेतन में ब्राह्मणवादी हैं. इस कारण ये लोग मुस्लिम लोगों को प्रमोट नहीं करते. दैनिक जागरण प्रबंधन भी मुस्लिमों को न प्रमोट करने का पक्षधर रहा है. दैनिक जागरण के दो तिहाई से ज्यादा संपादक ब्राह्ण हैं. चाहें तो आप गिनती कर करा लें.

दैनिक जागरण के कई निदेशक तो खुलेआम मुस्लिम विरोधी बातें आफिसों में करते रहे हैं. देश का संविधान भले ही सबको बराबरी और न्याय की बात करता हो लेकिन दैनिक जागरण जैसा नंबर वन अखबार अपने आंतरिक संरचना और सोच में न सिर्फ संविधान विरोधी है बल्कि मानवविरोधी भी. वह मनुष्य मनुष्य के बीच फर्क करता है. देखना है कि दैनिक जागरण की इस सामंती मानसिकता से लड़ने और इसे बदलने कोई आगे आता है या फिर मनमानी का जागरण कीर्तन यूं ही चलता रहेगा..

दैनिक जागरण के मुस्लिम विरोधी रुख के बारे में अगर आपके पास भी कोई सूचना, तथ्य, जानकारी, प्रमाण हो तो भड़ास के पास भेजें. भड़ास का पता [email protected] है.

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