एक कलाकार के लिए जरूरी नहीं है कि वह कहीं से सीखा ही हो बल्कि कुछ लोगों में गाड गिफ्टेड चीजें भी होती हैं, जो समय के साथ-साथ उसके अन्दर आती चली जाती हैं। ऐसे ही एक कलाकार है गुलरेज, जिन्होंने अपनी कला के जरिए लोगों को लोहा मानने पर मजबूर कर डाला है। लोग बड़े बड़े आइटम तो कहीं भी बना डालते हैं, लेकिन कोई बड़ी चीज जिसकी लम्बाई कई मीटर हो उसे गुलरेज ने मिली मीटर में बना डाला है। ऐसे कई आईटम हैं जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर डालती है।
गुलरेज के पास मौजूदा वक्त में तोप, साईकिल, बस, स्कूटर, मगरमच्छ, कमप्यूटर, हाथी, नन्दी बैल आदि ऐसे माडल है, जिसे उन्हों ने इंजेक्शन की छोटी शीशी में कैद कर डाला है। गुलरेज का कहना है कि मेरी अभिलाषा पूरी होगी, एक दिन जनपद ही नहीं पूरे देश का नाम रोशन करूंगा। मेरा कोई उस्ताद नहीं ऊपर वाले की कृपा मेरे साथ है। लगन व परिश्रम के बल पर अपनी कला का लोहा एक ना एक दिन लोगों को मनवा के रहूंगा, जिसके लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

गुलरेज कहते हैं अभाव मुझे लक्ष्य तक पहुंचने में रोक नहीं सकता। जी हां, यह हम नहीं कहते बल्कि जनपद का एक ऐसा कलाकार कह रहा है जो बिना किसी तालीम के आज अपनी कला, वो भी ऐसी कला, जिसे बनाने के लिए हथियार कहीं बाजार में उपलब्ध नहीं होगा बल्कि वो औजार भी कलाकार ने अपनी जरूरत के अनुसार बनाया है। और आज उसकी मदद से छोटी छोटी शीशियों में ऐसी कलाकारी भर दिया है कि उसे लोग देखने के बाद सोचने पर मजबूर हो जाते हैं।

गुलरेज गाजीपुर जनपद के नुरूद्दीनपुरा मुहल्ले के रहने वाले हैं और इनका शौक बचपन में स्कूल में पढ़ते समय मास्टर साहब के द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली चाक और खडि़या से शुरू हुई, जिसे गुरुजी छोटी होने पर फेंक दिया करते थे, उसे उठा गुलरेज उस पर अपनी कलाकारी आरम्भ कर दिया करते थे। बचपन का वह नटखटपन आज उस गुलरेज की शौक में शुमार होकर उसकी पहचान बन गई है। इनकी जो भी कला कृतियां हैं वो 1.5 मिलीमीटर से लेकर 2 मिलीमीटर तक की है। गुलरेज के अनुसार उनकी आंखों के सामने विश्व की कोई भी धरोहर रख दिया जाय उसके बाद वो उसे हुबहु थर्माकोल या फिर जिस पर चाह उस पर उसे उकेर सकता है। महाभारत काल में एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य को छिप छिप कर देख के धनुष विद्या सीख लिया था, लेकिन गुलरेज बिना किसी गुरु के एकलव्य से दो कदम आगे बढ़ गए हैं।
गाजीपुर से अनिल कुमार की रिपोर्ट.





