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अरबों रुपए खर्च कर ‘कामयाबी’ का ‘मनमोहनी’ राग बजा रही केंद्र सरकार

: अपनी ढपली-अपना राग! : यूपीए सरकार की दूसरी पारी के चार साल पूरे हो गए हैं। इस तरह से मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने सत्ता सिंहासन के 9 साल पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के कामकाज का एक ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी जारी किया है। अपनी ढपली-अपने राग वाले अंदाज में सरकार ने जमकर उपलब्धियां गिना दी हैं।

: अपनी ढपली-अपना राग! : यूपीए सरकार की दूसरी पारी के चार साल पूरे हो गए हैं। इस तरह से मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने सत्ता सिंहासन के 9 साल पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के कामकाज का एक ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी जारी किया है। अपनी ढपली-अपने राग वाले अंदाज में सरकार ने जमकर उपलब्धियां गिना दी हैं।

इस ‘कामयाबी’ का जमकर जश्न भी मनाया गया। कई दिनों से टीवी और प्रिंट मीडिया में सरकार अरबों रुपए के खर्च से अपनी कामयाबी के ढोल बजाते हुए विज्ञापन भी दे रही है। ताकि, आम आदमी का मानस कुछ तो बदले। क्योंकि, पिछले वर्षों में उसे महंगाई जैसे तीरों ने बहुत छलनी किया है। विपक्ष ने भी संसद से लेकर सड़क तक उसे यह बताने की कोशिश की है कि आजादी के बाद से अब तक कि यह सबसे भ्रष्ट और नकारा सरकार है। केंद्र सरकार के रणनीतिकार अब अपनी ढपली के ‘मनमोहनी’ राग से सबको मुग्ध कर लेने की जुगत में लग गए हैं।

22 मई 2009 से यूपीए सरकार की दूसरी पारी शुरू हुई थी। इस बार कांग्रेस को लोकसभा में 206 सीटें मिल गई थीं। ऐसे में, कांग्रेस नेतृत्व का आत्म विश्वास काफी मजबूत हो चला था। यूपीए सरकार की पहली पारी 2004 में शुरू हुई थी। इस दौरान उसे वाममोर्चा का बाहर से मजबूत समर्थन था। वामदलों के राजनीतिक दबाव के चलते मनमोहन सरकार के लिए जरूरी हो गया था कि वह आम आदमी की हित-चिंता में जुटी दिखे। आर्थिक सुधारों के सबसे बड़े पैरवीकार मनमोहन सिंह इस दौर में चाहते हुए भी अपने आर्थिक एजेंडे पर ज्यादा कुछ नहीं कर पाए थे। क्योंकि, सरकार पर वामदलों का जोरदार राजनीतिक अंकुश लगा हुआ था। लेकिन, अमेरिका के साथ परमाणु नीति के समझौते के मुद्दे पर राजनीतिक रार बढ़ गई थी। इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह अड़ गए थे। ऐसे में, वाम दलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया था।  

सरकार की पहली पारी में ‘मनरेगा’, सूचना अधिकार कानून व परमाणु समझौते पर सरकार के दृढ़ संकल्प के चलते 2009 में यूपीए की दूसरी पारी शुरू हो गई। लेकिन, अगले साल यानी 2010 से ही यूपीए सरकार के दौर में बड़े घोटालों का दौर शुरू हुआ। इसी साल दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजित हुए। जाहिर है इस आयोजन के लिए कई अरब रुपए का बजट बना था। खेल शुरू होने के पहले ही खुलासा होने लगा था कि चर्चित कांग्रेसी सांसद ‘सुरेश कलमाड़ी एंड कंपनी’ ने करोड़ों रुपए की हेराफेरी का खेल कर लिया है। राष्ट्रमंडल खेलों के बाद जब इस बडेÞ घोटाले की परतें खुलने लगीं, तो घोटाले की आंच से सरकार की छवि भी झुलसी। सालों तक यह मामला संसद से सड़क तक उछलता रहा।  

राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के पहले भी शर्म-अल-शेख के मामले में यूपीए सरकार की कूटनीति पर काफी भद्द पिटी थी। क्योंकि, पाकिस्तान के साथ जो साझा वक्तव्य जारी हुआ था, उसमें पाकिस्तान ने पहली बार बलूचिस्तान का मामला जोर-शोर से जुड़वा लिया था। राष्ट्रमंडल घोटाले के विवाद के बीच ही 2जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले का मामला उछल पड़ा था। दरअसल, ‘कैग’ की रिपोर्ट के हवाले से यह सामने आया कि संचार मंत्रालय में 1.76 लाख करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है। यह मामला सामने आते ही संसद से सड़क तक सनसनी फैल गई। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इसे आजादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला करार किया। इस मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने के मुद्दे पर सरकार और विपक्ष में महीनों तक  टकराव रहा था।

इस घोटाले के प्रमुख किरदार माने जाने वाले संचार मंत्री ए. राजा को इस्तीफा देना पड़ा। उनको महीनों तिहाड़ जेल में भी रहना पड़ा। जब इस घोटाले की परतें खुलने लगीं, तो जानकारी आई कि कैसे नियोजित ढंग से इस महाघोटाले की तैयारी की गई थी? द्रमुक सुप्रीमो एम. करुणानिधि की सांसद बेटी कनिमोझी को भी जेल जाना पड़ा। क्योंकि, यह खुलासा हुआ था कि इस घोटाले की रकम उन्हें भी एक टीवी कंपनी के जरिए पहुंचाई गई थी। इस मामले में कई कॉरपोरेट कंपनियों के आलाधिकारियों ने भी जेल की हवा खाई है। ये सभी मामले अदालतों में लंबित हैं। इस मामले में एक नया राजनीतिक पेंच यह है कि पूर्व संचार मंत्री ए. राजा यह खुलासा कर रहे हैं कि स्पेक्ट्रम मामले में उन्होंने सभी बड़े फैसले पी. चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जानकारी में ही किए थे। इसी वजह से भाजपा नेतृत्व स्पेक्ट्रम मामले में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग करता आया है।

2जी स्पेक्ट्रम मामले की गरमा-गर्मी के बीच ही कई और घोटालों के फेर में यूपीए सरकार फंसती रही। मुंबई के आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के घोटाले ने कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किलें काफी बढ़ा दी थीं। क्योंकि, इसमें महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम आ गया था। काफी फजीहत के बाद चव्हाण को इस्तीफा भी देना पड़ा। सेना में बहुचर्चित अगस्टा डील और हैलिकॉप्टर सौदे में दलाली को लेकर भी खूब बवाल चला। इन घोटालों की धमक के चलते संसद का कोई सत्र ठीक से नहीं चल पाया। रही सही कसर कोयला घोटाले ने पूरी कर दी। यह खुलासा भी ‘कैग’ की रिपोर्ट से हुआ। ‘कैग’ ने कहा कि 2006 से 2009 तक कोयला खनन के लाइसेंस मनमाने ढंग से दिए गए हैं। इससे सरकारी राजस्व को 1.86 लाख करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है। यानी, कोयला   घोटाले ने 2जी स्पेक्ट्रम के महाघोटाले को भी ‘बौना’ कर दिया।

इस मामले में सरकार के कई मंत्रियों की भूमिका पर सवाल उठे। खनन लाइसेंस दिलाने के लिए भाई-भतीजावाद का चक्कर चलाने पर केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय को अपनी गद्दी भी गंवानी पड़ी। जब इस आशय की खबरें आईं कि सरकार इस घोटाले की जांच में सीबीआई पर दबाव डाल रही है, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच अपनी निगरानी में शुरू करा दी थी। अदालत ने सीबीआई से कहा था कि वह इस मामले की जांच की स्टेट्स रिपोर्ट सीधे उसे सौंपे। लेकिन, मीडिया में खबर आई कि सरकार ने स्टेट्स रिपोर्ट में भी फेरबदल कराई थी। इसको लेकर सर्वोच्य न्यायालय ने सीबीआई और सरकार को जमकर फटकार लगाई। इसी मामले में अदालत ने टिप्पणी की थी कि सीबीआई की स्थिति पिंजरे में बंद उस ‘तोते’ जैसी है, जो कि अपने मालिकों की ही बोली बोलता है। अदालत के कड़े रवैए के चलते कानून मंत्री अश्विनी कुमार को भी इस्तीफा देना पड़ा।

पिछले दिनों ही बहुचर्चित रेल रिश्वतकांड में रेलमंत्री पवन बंसल को इस्तीफा देना पड़ा है। लेकिन, यह इस्तीफा काफी राजनीतिक किरकिरी के बाद हुआ। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी देश की विकास दर 5.5 प्रतिशत तक आ टिकी है। विपक्ष, सरकार पर ‘नीतिगत अपंगता’ का आरोप लगाता आया है। खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस ने पिछले साल सितंबर में यूपीए से नाता तोड़ लिया था। इस साल मार्च में डीएमके ने भी श्रीलंका में तमिलों के मुद्दे पर यूपीए से समर्थन वापस ले लिया। अब मनमोहन सरकार लोकसभा में अल्पमत में है। वह सपा और बसपा के बाहरी समर्थन पर टिकी है। लेकिन, ये दोनों दल सरकार को कई मुद्दों पर आंख दिखाते रहते हैं। इन दलों के क्षत्रप यूपीए के ‘जश्न’ में भी शामिल नहीं हुए। इन तमाम ‘अमंगल’ संकेतों के बावजूद कांग्रेस के रणनीतिकार अपनी ढपली के राग में मगन हैं। क्या पता यूपीए का ‘मनमोहनी राग’ जाने-अनजाने यूपीए-3 का भी रास्ता खोल दे? क्योंकि, देश जिस तरह के राजनीतिक खुमार में है, उसमें किसी भी संभावना (?) को एकदम दरकिनार तो नहीं किया जा सकता है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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