उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में अदालत के रूख से हड़कम्प मचा हुआ है। न्यायपालिका और उसके आदेशों को हल्के में लेने वाले और बार-बार कोर्ट की अवमानना करने वाले अधिकारियों को अदालत ने जब उनकी हैसियत (सजा) बताई तो इन लोगों के पास मॉफी मांग कर जान बचाने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा। प्रदेश की नौकरशाही के रवैये से अदालतों की नाराजगी की गाज इतनी गहरी थी कि सूबे के सबसे बड़े अधिकारी (मुख्य सचिव जावेद उस्मानी) तक नहीं बच पाये। अन्य अधिकारियों में भी अनेक सचिव स्तर के नौकरशाह थे।
किसी को अवमानना का नोटिस थमाया गया तो किसी को अवमानना में हिरासत में ले लिया गया। कई आला अफसरों के खिलाफ गैरजमानती गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया गया। जिन अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है, उन्हें कस्टडी में अदालत में पेश करने के निर्देश दिये गये हैं। अदालत के आदेशों की लगातार अवहेलना करने वाले नौकरशाहों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें यह दिन भी देखना पड़ सकते हैं। निश्चित ही इसके लिये जितने जिम्मेदार प्रदेश के नौकरशाही है उतनी ही गुनहागार सूबे पर काबिज रहने वाली सरकारे हैं।
अदालत के रूख में यह गर्मी कुछ दिनों के भीतर ही दिखाई पड़ी। मात्र दस-पन्द्रह दिनों में नौकरशाहों के खिलाफ अदालतों ने कड़े तेवर अख्तियार कर लिये। हमेशा लापरवाह अधिकारियों को डांट-फटकार कर शांत हो जाने वाली अदालतों के सख्त तेवरों ने उन नौकरशाहों के भी कान खड़े कर दिये हैं, जिनके ऊपर आज भले ही अदालत की गाज नहीं गिरी हो लेकिन तलवार उनके ऊपर भी लटक रही है। बीते दिनों उच्च न्यायालयों के आदेशों को मानने में देरी करने अथवा हीलावाली का परिचय देने वाले आला अधिकारियों को जिस तरह उच्च न्यायालय की अलग-अलग पीठों में दिन भर हिरासत में रखा, वह केवल इन अधिकारियों की ही नहीं बल्कि सरकार की भी फजीहत का मामला नजर आता है।
लखनऊ में उच्च न्यायालय की अलग-अलग पीठों ने प्रमुख सचिव गृह प्रमुख सचिव स्टांप व निबंधन अपर आयुक्त प्रशासन, फैजाबाद के साथ साथ कई अधिकारियों को हिरासत में लिया, वहीं इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रमुख सचिव विधि एवं न्याय को कोर्ट में हाजिर होकर यह बताने को कहा कि राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट कार्यवाही में सहयोग क्यों नहीं किया जा रहा है। ये दोनों मामले एक दिन ही सामने आए। अभी लोग संभल भी नहीं पाये थे कि 08 मई 13 को उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने पूर्व पुलिस महानिदेशक अतुल कुमार, प्रमुख सचिव परिवहन बीएस भुल्लर, डीआईजी रेंज नवनीत सिकेरा, आईजी कारागार, जिलाधिकारी लखनऊ अनुराग गुप्ता सहित अन्य के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। वारंट जारी करते हुए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के विद्वान न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने कड़ा एतराज जताते हुए यहां तक कहा कि अधिकारी अदालत में आदेश को समय सीमा में नहीं मानते और जब अवमानना का मामला बनता है तो वह अदालत में हाजिर नहीं होते हैं।
उच्च न्यायालय ने सख्ती शुरू की तो यह सिलसिला 09 मई को भी जारी रहा। इस दिन उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति डा. सतीश चन्द्रा ने मुख्य सचिव जावेद उस्मानी के खिलाफ समेकित बाल विकास योजना से संबंधित नियमावली अदालत के आदेश के बाद भी निश्चित समय सीमा के भीतर नहीं बन पाने के कारण अवमानना नोटिस जारी कर दिया। इसी दिन उच्च न्यायालय, लखनऊ की एक अन्य पीठ ने विभिन्न विभागों के प्रमुख सचिवों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। प्रमुख सचिवों में रवीन्द्र सिंह, अवनीश कुमार अवस्थी भी शामिल थे। पीठ ने इसके अलावा निदेशक पंचायती राज सौरभ बाबू, सचिव माध्यमिक शिक्षा जितेन्द्र कुमार, यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन के प्रबंध निदेशक सुभाष चन्द्र शर्मा, नार्थ मेंटनेंस टेलीफोन के महाप्रबंधक एके टंडन, लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर इन चीफ यूके सिंह, बीएसए लखीमपुर को भी अवमानना मामले में तलब कर लिया। पीठ ने दो टूक कहा कि सरकारी अधिकारी इस बात का बहाना नहीं बना सकते हैं कि वह विभाग में थोड़े समय ही तैनात रहें।
बहरहाल, अदालत के सख्त रवैये के बाद सवाल यह उठता है कि क्या भविष्य में ऐसे अधिकारी आम जनता की समस्याओं के समाधन के प्रति संवेनशीलता और सक्रियता दिखायेंगे। उत्तर प्रदेश की सेहत के लिये यह अच्छे संकेत हैं कि नौकरशाहों के टाल-मटोल से नाराज उच्च न्यायालय ने कई अफसरों को कड़ी फटकार लगा दी, उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत की सख्ती से आम जनता का भी थोड़ा-बहुत भला देखने में आयेगा क्योंकि आम जनता के पास तो ऐसे कोई उपाय नहीं कि वह शिकायत न सुनने वाले अधिकारियों के खिलाफ कुछ कर सके। आम जनता ज्यादा से ज्यादा अपने जनप्रतिनिधियों के पास ही सुस्त ओर लापरवाह अधिकारियों के रवैये का रोना रोती रहती हैं, लेकिन इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि खुद विधायक मंत्री और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी कई बार नौकरशाही और बड़े अधिकारियों के अड़ियल रवैये से त्रस्त हो जाते हैं, जो हालात दिखाई दे रहें हैं उससे तो यही लगता है कि उत्तर प्रदेश की नौकशाही ‘कैंसर’ जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है। उसे कई सरकारें आई और चली गईं लेकिन कोई सुधार नहीं पाया। नौकरशाहों की हठधर्मी से तंग आकर एक बार पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता रहे कल्याण सिंह ने तो यहां तक कह दिया था कि नौकरशाही बेलगाम घोड़े की तरह होती है, जिसकी ‘रानों’ में ताकत होती है वे ही इसे काबू में रखने की महारथ हासिल कर सकता है। नौकरशाही को कंट्रोल में रखने में कल्याण को महारथ हासिल थी, पहली बार जब वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो नौकरशाहों को उन्होंने अपने हिसाब से नचाया, लेकिन बाद में उनकी भी पकड़ ढीली होती गई। बसपा सुप्रीमो मायावती भी जब सत्तारूढ़ होती हैं तो ब्यूरोक्रेसी को अपने हिसाब से चलाती हैं। उनके सामने नौकरशाह कांपते हैं। माया नौकरशाहों को सार्वजनिक मंचों, बैठकों और अन्य सरकारी आयोजनों के समय उनकी नाकामी के लिये डांटती-फटकारती रहती थीं।
खैर, उच्च न्यायालय को जिस तरह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ रहा है उससे राज्य के नौकरशाहों के लापरवाही भरे रवैये की पुष्टि होती है। यह बात भी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि जिन मामलों के चलते उच्च न्यायालय इलाहाबाद और उसकी खंडपीठ लखनऊ के विद्वान न्यायाधीशों ने अधिकारियों को फटकार लगाई उनमें से ज्यादातर न्यायिक विषय ही नहीं थे। ये मामले अदालतों के समक्ष इसीलिए पहुंचे थे क्योंकि अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन करने के बजाय हीलाहवाली कर रहे थे। अथवा इससे बेपरवाह थे कि उनके विभागों से संबंधित कुछ मामले अदालतों में हैं। कुछ मामलों में एकल पीठ के निर्णय के खिलाफ नौकरशाह बड़ी पीठ के पास जा रहे हैं, जैसा
की प्रमुख सचिव गृह आर एम श्रीवास्तव के साथ हुआ दोहरी पीठ ने श्रीवास्तव को तकनीकी आधार पर अवमानना मामले से राहत दे दी। अदालत की सख्ती का रंग नौकरशाहों पर खूब दिख रहा है। यही वजह थी सूबे के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी 09 मई 13 को सभी बैठकें रद्द कर इलाहाबाद पहुंच गये और वहां इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से उन्होंने मुलाकात की।
लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.





