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जनाब, यहां पुलिस से पहले पत्रकारों से सेटिंग करनी पड़ती है

किसी भी गैरकानूनी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले कौन सा कार्य करना पड़ता है? पुलिस सेटिंग। लेकिन जनाब अनपरा में पुलिस सेटिंग से पहले पत्रकार सेटिंग करना पड़ता है। पिछले दिनों रेनुकूट सोनभद्र की खबर पढ़ी कि कैसे वहां के पत्रकारों ने अपनी कलम गिरवी रख दी। अनपरा का हाल तो वहां से कई गुना ज्यादे गंभीर है। यहां तो बाकायदा पत्रकार-पुलिस-नेता गठजोड़ बना हुआ है। पत्रकार और नेता ज्यादातर थाने पर बैठकी करते ही मिल जायेंगे।

किसी भी गैरकानूनी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले कौन सा कार्य करना पड़ता है? पुलिस सेटिंग। लेकिन जनाब अनपरा में पुलिस सेटिंग से पहले पत्रकार सेटिंग करना पड़ता है। पिछले दिनों रेनुकूट सोनभद्र की खबर पढ़ी कि कैसे वहां के पत्रकारों ने अपनी कलम गिरवी रख दी। अनपरा का हाल तो वहां से कई गुना ज्यादे गंभीर है। यहां तो बाकायदा पत्रकार-पुलिस-नेता गठजोड़ बना हुआ है। पत्रकार और नेता ज्यादातर थाने पर बैठकी करते ही मिल जायेंगे।

मैं कुछ घटनाओं का जिक्र करना चाहुंगा जो खुद-ब-खुद यहां की तस्वीर पेश कर देंगी। यहां के जन प्रतिनिधि करोड़ों रुपयों का कार्य कराते हैं, बेहद घटिया गुणवत्ता की, कागज पर कुछ और मौके पर कुछ और, कुछ तो बस कागज पर। जन सूचना अधिकार के तहत उक्त के सम्बन्ध में सूचना प्राप्त कर पुष्‍ट भी कर लीजिए। इतने के बाद भी यहां के पत्रकार उक्त खबर को नहीं कवर करते। कहते हैं एफआईआर करिये, अदालत जाइये, शासन के पास शिकायत कीजिए, उसके बाद यदि कोई बड़ी काईवाई होती है तब हम छापेंगे। यदि आपने पत्रकार को इस सम्बन्ध में कोई सूबूती दस्तावेज सौंपा है तो कुछ ही देर में वह दस्तावेज उसी जनप्रतिनिधि के पास पहुंच जायेगी, जिसके खिलाफ आपने शिकायत किया है और वह पत्रकार जनपतिनिधि की गुड बुक में और उपर चढ़ जायेगा।

कोयला चोरी के लिए भी अनपरा ने काफी नाम कमाया है। कुछ वर्ष पूर्व यहां सीबीआई का छापा भी पड़ा। कई धरे गये, कई पुलिसकर्मी इधर-उधर हुए। वर्तमान में पुलिस की छोडिये पत्रकारों का भी महीना बंध हुआ है। यही कारण है कि एक प्रमुख अखबर को छोड़ दीजिए तो अन्य अखबार कोयला चोरी से सम्बन्ध्ति कोई खबर नहीं लिखते। एक बार चोरी के दो ट्रैक्टर कोयला ग्रामीणों ने पकड़ लिया। मौके पर कुछ पत्रकार आये, कुछ ने असमर्थता जताई, जो आये फोटो खिंचा, चले गये। ट्रैक्टर थाने में गया। अगली सुबह न तो थाने में ट्रैक्टर था, और न ही किसी अखबार में उससे सम्बंधित खबर।

चोरियां आयेदिन होती रहती है, एक अखबार को छोड़ दें तो कोई अखबार खबर नहीं लिखता अलबत्ता पत्रकार उस दिन थाने पर चाय-नमकीन का मजा लेते आसानी से नजर आ जाते हैं। यहां के अखबार और पत्रकारों का हाल कुछ इस तरह बयां किया जा सकता हैः-

कई महीनों बाद जब मैं बैंक गया तो तो मैनेजर साहब ने बड़े अनमने ढंग से स्वागत करते हुए पूछा बड़े दिनों बाद आना हुआ। मैंने जवाब दिया पत्रकारों के पास इतना पैसा कहां हैं जो रोज-रोज बैंक आ सकें। उन्होंने कहा जनाब यहां के तो सब पत्रकार करोड़पति हैं। एक आप ही बचे हैं। कुछ करते क्यों नही।

आपके जनप्रतिनिधियों ने लाखों-करोड़ों की लागत से जिस सड़क, पुलिया, तालाब इत्यादि का निर्माण कराया था वह कुछ दिनों में ही खस्ताहाल हो गया। होता भी क्यों नहीं, घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल जो किया गया था, इसीलिए खस्ताहाल हो गया और इसको बनवाने वाले लोग मालामाल हो गये। कुछ स्थानीय सजग लोगों ने इसके खिलापफ उच्चाधिकारियों, मुख्यमंत्री इत्यादि तक काफी लिखा-पढ़ी किया किन्तु हुआ कुछ नहीं। ऐसे में हार कर मीडिया के पास गये इस उम्मीद से की मीडिया में मामला उछलेगा तो कुछ होगा। लेकिन मीडिया ने तो खबर छापने को कौन कहे, उसी भ्रष्‍ट जनप्रतिनिधियों के यहां शाम को पहुंच कर ठण्ड में गरमा-गरम चाय की चुस्कियां लेते मिले।

अगले दिन उस भ्रष्‍ट जनप्रतिनिधि की खबर छपी, लेकिन उसके घटिया निर्माण कार्य की नहीं बल्कि उसके द्वारा किये गये खेल-कूद प्रतियोगिता के उद्घाटन की, किसी नये योजना के शुभारंभ की इत्यादि। मीडिया खुद को आम आदमी की आवाज कहती है किन्तु वह आम आदमी के हितों पर डाका डालने वालों के समर्थन में खबरें दबाकर आखिर कौन से आम आदमी की आवाज बन रही है? एक समय था जब मीडिया के जरिये बड़े-छोटे घोटालों, भ्रष्टाचारों इत्यादि का पर्दाफास होता था किन्तु आज ये घोटालों, भ्रष्टाचारों की खबरें विज्ञापन के बदले में दबाने में लगी है। एकाध खबरें अगर आ भी जाती हैं तो उसके पीछे भी विज्ञापन का खेल ही चलता है। दबाने वाले ने विज्ञापन नहीं दिया तो उठाने वाले ने दे दिया और खबर छप गयी।

गणतंत्रा दिवस, स्वतंत्राता दिवस, होली, दीपावली इत्यादि अवसरों पर देखें, अखबार में खबरें प्रकशित होने की तो औपचारिकता निभाई जाती है और सभी पन्नों पर केवल विज्ञापन ही दिखाई पड़ते हैं। और ये विज्ञापन किसके होते हैं? आपके उन्हीं जनप्रतिनिधियों के, सरकारी कर्मचारियों के, पुलिस वालों के जिनका उद्देश्य ही भ्रष्‍टाचार करना, पद का गैरकानूनी इस्तेमाल करना रह गया है। ऐसे लोगों से मीडिया साल भर में लाखों का विज्ञापन लेकर बदले में उनके खिलाफ आने वाली खबरों पर आंखें मूंदे रहती है।

कुछ विज्ञापन खुले होते हैं जैसे एक लाख के विज्ञापन में 70 हजार अखबार मालिक का और 30 हजार उस पत्रकार का जिसने विज्ञापन हासिल किया और अनेकों विज्ञापन पत्रकार टैक्स के नाम पर लिये जाते हैं, प्रभावितों को खबरों का, पत्रकार का भय दिखाकर। आप अपने क्षेत्र में छपने वाले समाचार पत्रों, पत्रिकाओं पर गौर करें तो पायेंगे कि अनेक समाचार पत्र, पत्रिकायें केवल तभी छपती हैं जब विज्ञापनों का महीना रहता है, जैसे नव वर्ष, गणतंत्रता दिवस, स्वतंत्रता दिवस इत्यादि। ऐसे समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है। इनके पत्रकार साल भर चोरों, बेईमानों, भ्रष्चारियों इत्यादि के कारनामों को पूरी लगन के साथ ढूंढते हैं और मौका आने पर भय दिखाकर वसूलते हैं।

मीडिया को उद्देश्य तो भ्रष्चारियों के कारनामों को उजागर कर समाज को जगाने का है लेकिन कितने अपफसोस की बात है कि यह स्वयं ही उसी भ्रष्‍टाचार का एक अभिन्न अंग बन कर रह गया है, जो दिनों दिन और मजबूत होता जा रहा है। आम जनता इन्हें सबक सिखा सकती है। ऐसे अखबारों, पत्रिकाओं को पढ़ना व खरीदना बन्द कीजिए और असर देखिये। जब इनका प्रसार गिरेगा तब इनकी अकल ठिकाने आयेगी।

लेखक अनूप द्विवेदी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क ई मेल [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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