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अदम गोंडवी को पहली बार गंवई मेले के कवि सम्मेलन में देखा था

: अदम की फिक्र करो, ताकि सरोकार ज़िंदा रहें : रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी। मटमैली धोती में लिपटा इकहरा बदन। उनकी हड्डियों में ज्यादा ज़ोर शायद न होगा, पर जब उनकी ग़ज़लें बोलती हैं तो हुकूमतें सिहर जाती हैं। अदम गोंडवी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि हिंदी ग़ज़लों की दुनिया में दुष्यंत कुमार के बाद वे ही शीर्षस्थ रचनाकार हैं, लेकिन मेरी, यानी इन पंक्तियों के लेखक की अदम जी से पहचान साहित्य से कहीं ज्यादा, घर के बुजुर्ग के साथ खानदान के सबसे छोटे लड़के जैसी है।

: अदम की फिक्र करो, ताकि सरोकार ज़िंदा रहें : रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी। मटमैली धोती में लिपटा इकहरा बदन। उनकी हड्डियों में ज्यादा ज़ोर शायद न होगा, पर जब उनकी ग़ज़लें बोलती हैं तो हुकूमतें सिहर जाती हैं। अदम गोंडवी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि हिंदी ग़ज़लों की दुनिया में दुष्यंत कुमार के बाद वे ही शीर्षस्थ रचनाकार हैं, लेकिन मेरी, यानी इन पंक्तियों के लेखक की अदम जी से पहचान साहित्य से कहीं ज्यादा, घर के बुजुर्ग के साथ खानदान के सबसे छोटे लड़के जैसी है।

अदम जी को सबसे पहली बार गोंडा के ही एक गंवई मेले के मौके पर हुए कवि सम्मेलन में देखा था। ठेठ गंवई ज़बान में सत्ता के ख़िलाफ़ आग उगलते हुए अदम अपने व्यक्तित्व में ज्यादा प्रभावित नहीं करते, लेकिन उनकी बातें, कहन, अंदाज़ और बेशक… कंटेंट, यानी शायरी का बयान जैसे तेजाब बनकर आलसी और यथायस्थितिवादी दिमाग में उतर गए थे। वो दिन था और अब का लम्हा, अदम को भुलाना संभव नहीं हो पाया है।

महबूब की तारीफ़ में लिखी जाने वाली परंपरागत ग़ज़ल से अलग, जिसे भी ग़ज़ल के क्रांतिकारी रुख से मोहब्बत है, वो अदम की अहमियत से कभी आंखें न चुराएगा… फिर भी अफ़सोस, आज उन्हीं अदम का स्वास्थ्य बुरी तरह ख़राब है और उनका पुरसाहाल कोई नहीं है। कम से कम सरकारी अमला तो बिल्कुल नहीं।

गोंडा के एक प्राइवेट अस्पताल में अदम गोंडवी लिवर की बीमारी के शिकार होकर अरसे तक उपचाररत रहे। बाद में हालत और बिगड़ी, फिर उन्हें लखनऊ के संजय गांधी परास्नातक आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में दाखिल कराया गया। किसी का बीमार होना और इलाज कराना सामान्य-सी घटना है, लेकिन जिस तरह अदम को सरकारी तंत्र और बुर्जुआपने की हद तक एकाग्र और एकांगी हो गए बुद्धिजीवी वर्ग की उपेक्षा झेलनी पड़ी, वो सामान्य बात नहीं है।

हिंदी पट्टी ने अपनी पीढ़ी के सबसे अहम शायर के स्वास्थ्य की, उनके रहन-सहन की, विद्रोह की चिंता नहीं की। यह क्या मूल्यहीनता और मूल्यों के प्रति सामान्य, औसत सरोकारों के क्षरण की स्थिति नहीं है? पिछले दिनों मैंने कहीं पढ़ा कि मेरे हमज़िला कवि अदम गोंडवी की मदद के लिए एक सियासी पार्टी तो आगे आ गई, कुछ पाठकों-श्रोताओं ने हमदर्दी जता दी, गोंडा के डीएम ने भी खर्च उठाने का वादा किया, लेकिन लेखकों-साहित्यकारों और साहित्य की सेवा का दम भरने वाली अकादमियों की तरफ से महज जुबानी जमा-खर्च किया गया। एक अकादमी के अगुआ ने कहा कि अदम की ओर से लिखित आवेदन आए तो उन्हें कुछ हज़ार रुपए की राशि मुहैया कराई जा सकती है। सवाल फिर वही है, साहित्य का भला करने की बातें सिर्फ बातें हैं क्या? क्या एक शायर दम तोड़ दे, तब उसकी याद में मजलिसें बुलाने भर को अकादमियों ने अपना कर्तव्य मान लिया है?

संवेदनहीनता की हद तो तब हो गई, जब पता चला कि अदम जी को ब्लीडिंग हो रही थी और पीजीआई के डॉक्टर उनके साथ अस्पृश्य जैसा व्यवहार कर रहे थे। क्या आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को, मैं चमारों की गली में ले चलूंगा आपको जैसी खरी-खरी लिखने-कहने वाले साहित्यकार के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए था?

पिछले दिनों फेसबुक पर जब अदम जी की ख़राब हालत का बयान मैंने किया तो दिल्ली के ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव से लेकर कवि कुमार विश्वास तक ने चिंता जताई। साहित्य प्रेमी रौशन मिश्रा ने नकद सहायता देने की बात कही। पत्रकार महावीर जायसवाल और नीरज मिश्रा ने भी आगे आने का दम दिखाया, लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि सरकारी अमले को अदम के स्वास्थ्य की चिंता बिल्कुल नहीं रही।
निराला हों या नागार्जुन, मंटो हों या फिर श्रीलाल शुक्ल… हिंदी पट्टी ने अपने साहित्य प्रेमियों की परवाह कभी नहीं की। अब क्या अदम की बारी है? हिंदी ग़ज़ल को अदम ने चेहरा दिया है और उसके चरित्र की पहचान की है। सामंतवादियों से उन्होंने सीधा लोहा लिया और हरदम निरंकुशता के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहे। हमारे दौर के कबीर अदम गोंडवी ही थे, जो लिख सकते थे — काजू भुनी प्लेट में, ह्विस्की गिलास में, उतरा है रामराज्य विधायक निवास में।

आजकल बहुत-से लिखने-पढ़ने वालों की निगाह राइटिंग टेबल से कहीं ज्यादा सम्मान समारोहों और जुगाड़पट्टी पर लगी रहती है। ऐसे कठिन समय में, जब उद्देश्य रचनाधर्मिता से अधिक सेटिंग-गेटिंग की तरफ तरलीकृत हो गए हैं, अदम गोंडवी ने न अपनी मिट्टी छोड़ी, न ही अपना अंदाज़।

वे कवि सम्मेलनों के पॉपुलर कल्चर में फिट नहीं होते, क्योंकि उन्हें चुटकुलेबाजी करना नहीं आता। वे बेलौस तरीके से, सीधे-सीधे अपनी बात कहते हैं। उनके पास वाकजाल नहीं हैं, क्योंकि अभिधा की मार वे पहचानते हैं। अदम कहते हैं, तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है तो सरकारें अवाक् रह जाती हैं। उनका सवाल होता है, वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं, वे अभागे आस्‍था विश्‍वास लेकर क्‍या करें तो दलित चिंतन की दुहाई देने वालों का खोखलापन सामने आ जाता है। वे अबोले रह जाते हैं। धूमिल की तरह ही अदम का भी रुख स्पष्ट है… सौ मैं सत्तर आदमी जिस देश में नासाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है?

अदम की अच्छाई कहें या बुराई–वे सीधे हैं, सपाट हैं और यही बात इस जड़ व्यवस्था को स्वीकार नहीं। उन्हें प्लास्टिक फेस बनाने का, बनावटी पीआर करने का हुनर नहीं आता, ये अंदाज़ उन्हें तथाकथित प्रसिद्धि नहीं दिला सकता, लेकिन कुछ तो बात है कि उनकी धरती की सतह पर सरीखी किताब की मांग लगातार बनी है और टेलीविजन चैनलों के दर्जनों रिपोर्टर्स की पीटूसी उनकी कविताओं से ही लैस रहती है।

खैर, लोकरंजन हो जहां शम्‍बूक-वध की आड़ में, उस व्‍यवस्‍था का घृणित इतिहास लेकर क्‍या करें का उदघोष करने वाले अदम गोंडवी की फ़िक्र करनी महज इसलिए भी ज़रूरी नहीं है कि वे हिंदी ग़ज़ल के बड़े शायर हैं। उनकी हाल-ख़बर इसलिए भी लेनी ज़रूरी है, ताकि हमारे मूल्य, सरोकार और संवेदनशीलता ज़िंदा रहे। हमें वो वक्त लाना होगा, जब चर्चित कवि अनिल जनविजय पीड़ा के साथ यह कहने को मजबूर न हों — अदम की कोई फिक्र क्यों करेगा। उनसे कौन-सी ठकुरसुहाती होगी। वे कौन-से सम्मान जुटा पाएंगे। वे तो जनता के कवि हैं। बस जनता की बात करेंगे।

लेखक चण्डीदत्त शुक्ल दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका अहा ज़िन्दगी के फीचर संपादक हैं.

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