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सुख-दुख...

पहली ही स्टोरी से मैं लाइम लाइट में आ गया : शंभूनाथ शुक्‍ल

Shambhunath Shukla : १९७१ से १९७७ तक के साल मैंने इस तैयारी में लगाए कि अब मुझे क्या करना चाहिए। सभी विकल्प खुले थे। राजनीति में जाने के, पत्रकारिता में जाने के और साहित्य के क्षेत्र में जाने के भी। हर रविवार को कामतानाथ जी के यहां होने वाली रविवारीय बैठक में मैंने प्रलेस को भी खूब देख लिया था और दूसरे गुट के साहित्यकारों को भी। एक रास्ता ट्रेड यूनियनों में जाने का भी था। पर हर एक की सीमा थी और अपने वैचारिक बंधन थे। इसमें पत्रकारिता का क्षेत्र मुझे कुछ अपने हिसाब से करने के लिए उपयुक्त लगा इसलिए मैंने इसी क्षेत्र को चुना।

Shambhunath Shukla : १९७१ से १९७७ तक के साल मैंने इस तैयारी में लगाए कि अब मुझे क्या करना चाहिए। सभी विकल्प खुले थे। राजनीति में जाने के, पत्रकारिता में जाने के और साहित्य के क्षेत्र में जाने के भी। हर रविवार को कामतानाथ जी के यहां होने वाली रविवारीय बैठक में मैंने प्रलेस को भी खूब देख लिया था और दूसरे गुट के साहित्यकारों को भी। एक रास्ता ट्रेड यूनियनों में जाने का भी था। पर हर एक की सीमा थी और अपने वैचारिक बंधन थे। इसमें पत्रकारिता का क्षेत्र मुझे कुछ अपने हिसाब से करने के लिए उपयुक्त लगा इसलिए मैंने इसी क्षेत्र को चुना।

पहली स्टोरी की अर्जक संघ उत्तर प्रदेश का डीएमके। छपी भी तो आनंदबाजार पत्रिका अखबार समूह के हिंदी साप्ताहिक रविवार में। तब रविवार एक हफ्ते पहले अगले हफ्ते छपने वाली बड़ी स्टोरी को हाईलाइट करता था। और छपने के दो-तीन हफ्ते बाद तक उस पर प्रतिक्रियाएं छापता रहता था। मेरी स्टोरी को कवर स्टोरी बनाया गया। इस तरह पहली ही स्टोरी से मैं लाइम लाइट में आ गया। और जिस तरह मैं सोचता था उसी अंदाज में लिखा भी। यह वह दौर था जब ऊंची जातियों को पराभव शुरू हो चुका था। राजनीति, ताकत और पैसे के क्षेत्र से। गांवों में अब मध्यवर्ती जातियां तेजी से बढ़ रही थीं इसलिए उनके अंदर एक स्वाभिमान पैदा हो रहा था कि वे अब पिछड़ी नहीं बल्कि ऊँचे पायदान में आने वाली क्षत्रिय जातियां हैं।

कुर्मी अब कुर्मी नहीं कुर्मी क्षत्रिय बन रहे थे और अहीर यदुवंशी क्षत्रिय। लोधी तो अपने को राजपूत लिखते ही थे। ये अपने को क्षत्रिय कहलवाने के लिए अपना पौरोहित्य भी पैदा कर रही थीं। पर न तो स्वामी ब्रह्मानंद लोधियों को राजपूत बनवा पाए न कुर्मी व यादव अपने संबंध अन्य राजपूत जातियों से बना पाए। इसलिए साठ के दशक के अंतिम दिनों में संविद सरकारें बनने के बाद यूपी में रामस्वरूप वर्मा ने अपना समानांतर पौरोहित्य विकसित किया अर्जक संघ के नाम से। इस पौरोहित्य में ब्राह्मण और उनकी भाषा संस्कृत सिरे से गायब थे। उन्होंने इसमें दलितों को भी लिया लेकिन महज दिखावे के तौर पर। यहां दलित से ये जातियां रोटी बेटी का संबंध स्थापित नहीं करते थे बल्कि उनको ब्राह्मणों व ठाकुरों के खिलाफ उकसाया।

कुछ दिनों तक तो उनका यह क्रांतिकारी कदम समाज में उथल पुथल करता रहा लेकिन जैसे ही दलितों ने अपने अधिकार मांगे उनका यह आंदोलन धड़ाम से गिरा। और ब्राह्मण वर्चस्व वाली पार्टी कांग्रेस ने इसका लाभ उठाया। उसने ठाकुरों को किनारे कर एक बार फिर सत्ता पर कब्जा कर लिया। १९७६ तक यह दौर सफल रहा लेकिन १९७७ में इमरजेंसी की ज्यादतियों तथा अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों व सोच की मदद से फिर वहीं नवकुलक वादी मध्यवर्ती जातियां सत्ता में आ गईं। लेकिन ढाई साल बाद ही उनका सारा जोर खत्म हो गया और कांग्रेस ने खुद ही दक्षिणपंथी रास्ता अख्तयार कर लिया। अगर मंडल न आया होता तो शायद मध्यवर्ती जातियों में परस्पर एकता न आती और न ही वे पिछड़ों में शुमार हो पातीं। यह पिछड़ापन कुछ ज्यादा ही स्थायी हो गया।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभुनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

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