पिछले दिनों रेल मंत्री पवन बंसल अपने भांजे की वजह से मुसीबत में फंस गये। चुनाव सर पर है इसलिए इस्तीफा भी देना पड़ गया। भांजे ने मामा जी के रसूक का फायदा उठाकर प्रमोशन दिलवाने के लिए रिश्वत ले बैठे और और फंसे बेचारे मामा जी। अब ये और बात है कि आखों ही आखों में ईशारे हुए या नहीं ये तो खुदा ही जानता होगा या खुद मामा जी। लेकिन ये पहली बार तो नहीं है कि किसी मंत्री का रिश्तेदार उसके रसूक का फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा किया हो। भाई भतीजा वाद तो राजनीति की ह़की़कत है अगर यहां लिस्ट गिनवाऊ तो फेहरिस्त काफी लम्बी हो जायेगी।
राजनीति के अखाड़े में तो बिना नियम के दाव पेंच संभव है, लेकिन ये बुखार आज सिर्फ राजनीतिक गलियारे तक ही सीमित नहीं हैं, अगर आज किसी का कोई परिचित किसी भी फायदे की जगह पर है तो उसका फायदा उठाने वाले तमाम लोग मिल जायेंगे। भाई भतीजा तो फिर भी भारतीय संस्कृति में काफी करीबी रिश्तेदार होते हैं, लोग तो ऐसे भी हैं, जो रसूक वालों की मात्र गली से गुजर जायें तो रिश्तेदारी जोड़ लेते हैं और फिर किसी मजबूर या उल्लू को ढूंढ़ने की फिराक में लग जाते हैं, जाने कितनों की रोजी रोटी तो सिर्फ लोगों को टोपी पहना कर चल रही है। पहले लोग एक दूसरे की मदद करने के ईरादे से पहचान का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब लोगों को ठगने के इरादे से अपनी पहेचान का फायदा उठाते हैं। जब बात करोंड़ों अरबों रुपये के धोखाधड़ी की आती है तब लोगों की आंखें खुलती हैं।
बात केवल राजनीति गलियारें की नहीं है बल्कि समाज में लाइजनिंग नाम से ये बीमारी काफी विख्यात है जिसे हिन्दी में दलाली कहते हैं और से शब्द नहीं बल्कि ये धंधा समाज में काफी जोर शोर से फल फूल रहा है। आज मामूली से मामूली काम भी किसी ऑफिस में बिना किसी परिचय के नहीं हो सकता और हर जगह हर पोस्ट के लिए कमीशन तय है। फलां ऑफिस में, फलां व्यक्ति से किसी का सम्बन्ध हो तो उसकी तो पौ बार हैं, फिर मंत्री जी का भांजा तो मंत्री जी का भांजा ही है। आज समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपना काम करवाने के लिए अरबों खरबों गलत तरीके से देने को तैयार है, और ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मात्र १० रु पर भी अपना ईमान बेचने को तैयार हैं। ये सच है कि आज इससे हर आदमी परेशान है और हर आदमी इसमें लिप्त है। भ्रष्टचार पर चर्चा आज चारों तरफ हैं मगर इसकी जड़े कहां छुपी हैं और इसके लिए जिम्मेदार कौन है इसपर किसी का ध्यान नहीं है या यूं कहें कि ध्यान देना नही चाहता।
ज्यादा से ज्यादा लोग टीवी पर बैठकर इस पर चर्चा कर लेते हैं जैसे स्कूलों में डिबेट होते हैं। आखिर ये भ्रष्टाचार करता कौन है, मंत्री करता है, अधिकारी करता है, क्लर्क करता है, चपरासी करता है, न मंत्री आसमान से टपक कर आता है न कोई अधिकारी, न कोई क्लर्क और न चपरासी, सब इसी समाज का एक हिस्सा हैं और सभी समाजिक प्राणी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज उन्हें मौका मिला है तो वो कर रहे हैं, कल हमें मिलेगा तो हम करेंगे। हर आदमी आज पैसा कमाने के आसन तरीके को जान गया है, जिसे वो झट से आजमाने में देरी नहीं करता। भ्रष्टाचार की शाखें इतनी फैल चुकी हैं कि इसे जड़ से खत्म करना एक सपना सा लगता है। इसका बेहतर उदाहरण अन्ना हजारे के आंदोलन के परिणाम को देख कर समझ सकते हैं, जितने जोशो-खरोश के साथ ये आंदोलन शुरू हुआ उतने ही शान्ति के साथ ठड़ा भी पड़ गया। कारण एक ही था आंदोलन चालाने वाले और आंदोलन में भीड़ का हिस्सा बनने वाले सभी इसी समाज का हिस्सा थे (समाज में कुछ अपवाद हो सकते हैं मगर वो अपवाद ही हैं)।
आज अन्ना को दर किनारे करके राजनीति के गलियारों में घुसने की मंशा सबकी सामने आ ही गई। राजनीतिक गलियारा छूत की बीमारी की तरह है और ये बात आज नहीं बल्कि आजा़दी के बाद ही साबित हो चुकी हैं जिसने आ़जादी की लड़ाई में योगदान देने वाले दो दिग्गजों को आमने सामने खड़ा कर दिया जिसका नतीजा आज सबके सामने हैं। वैसे मै यहां किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष की बात करना ही नहीं चाहती। क्योंकि कोई खेमा ऐसा नहीं है जो भ्रष्टचार के जंजाल में फंसा न हो या उसे उसका स्वाद स्वादिस्ट न लगा हो। किसी एक मंत्री, एक पार्टी या एक वर्ग को दोषी मान कर इसका निदान संभव नहीं है। ये वो विषाणु हैं जो स्वयं के दिमाग में पल रहा है, खुद को ही इसका इलाज करना होगा वर्ना हर दिन विजय सिंगला जैसे लोग पैदा हो रहे हैं और होते रहेंगे। हर इंसान आज अपनी दुकान चला रहा है, जिसकी दुकान जैसे चल जाये जिसके हाथ जब हुकूम का इक्का लग जाये, तब ही शै।
लेखिका श्वेता शर्मा इलाहाबाद में पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.





