बीते दिनों एक पत्रकार बंधु (जैसा कि वे स्वयंघोषित रूप से खुद को कहते फिरते हैं) को लाइम लाइट में आने का शौक चर्राया। बड़ी-बड़ी फेंकने में माहिर इस पत्रकार का कुल जमा खाका ये है कि भले ही बस से जाएं, पर दिखाएंगे यूं कि मर्सिडीज से उतर कर आए हैं, जो उनके इंतजार में मय ड्राइवर कहीं खड़ी हो। एक शब्द का इस्तेमाल बार-बार करते हैं ‘वैकल्पिक मीडिया’। और यूं दर्शाते हैं मानों वे ही वैकल्पिक मीडिया के भावी कर्णधार हों (भले ही वैकल्पिक मीडिया का सिर-पैर तक न मालूम हो)।
पहले जनाब ने मैगजीन निकाली। दावा किया कि ये मैगजीन इंडिया टुडे और आउटलुक जैसी पत्रिकाओं की बत्ती गुल कर देगी। ‘तहलका’ का तो जनाब ने नाम तक नहीं लिया। कुछ समय बाद फिर ये कहते हुए मीडिया पोर्टल शुरु कर दिया कि प्रिंट मीडिया का जमाना लद गया। मीडिया पोर्टल शुरु करते ही जनाब ने ऊंची तनख्वाह और फ्री की पॉवर के सब्जबाग दिखाकर चार-पांच रंगरूट पत्रकार हायर किए और हाथों में स्टिकर लगे फुंतरू रूपी माइक थमाकर सड़कों पर छोड़ दिया। रंगरूट खुश कि पहली ही बार एक बड़े संस्थान के साथ (भले ही भीतर कु-हाल हो।) काम करने का मौका मिला है।
जब कुछ लोगों को पत्रकार बंधु के मुखारबिंद से इस मीडिया पोर्टल के शुरु होने की खबर लगी तो वे फेसबुक आदि छोड़कर इस पोर्टल को ढूंढने में जुट गए। पोर्टल में चलती सिर-पैर विहीन खबरें देखकर कुछ ने तो माथा पीट लिया, कुछ इस उम्मीद में रहे कि अभी तो शुरुआत है। सेटअप बनाने में कुछ दिन लगेंगे। तब स्टैंडर्ड बढ़ जाएगा। जब पत्रकार बंधु जानकारों को फोन कर-करके पूछने लगे कि पोर्टल कैसा लगा तो अपना पिंड छुड़ाने के लिए कुछ ने झूठी-मूठी तारीफ भी कर दी। फिर क्या था, जनाब फूलकर कुप्पा हो गए और यूं दिखाने लगे मानों उत्तराखंड में असली बाटा मार्का पत्रकार वे ही हों और बाकी सब भजिया छील-छीलकर पत्रकार के नाम पर कलंक लगाए हुए हैं।
खैर! खबर इस फर्जी पोर्टल और पत्रकार के गुणगान से संबंधित नहीं है। खबर ये है कि जनाब ने जोश में आकर प्रदेश के भ्रष्टतम और कुख्यात नौकरशाह पर हाथ डाल दिया। चवन्नी छाप फुंतरू लिए सचिवालय में घुस गए और नौकरशाह से सवाल-जवाब करने लगे। भाजपा और कांग्रेस दोनों के मुंहलगे नौकरशाह के कानों में न जूं पहले कभी रेंगी, न ही अब रेंगी। पत्रकार बंधु पूछते रहे और नौकरशाह कानों को खुजाते रहे। अंत में अपने अर्दलियों से कहकर पत्रकार को कार्यालय से धकिया दिया।
पत्रकार बंधु ने घोषणा की कि वे जब तक इस नौकरशाह को बाहर का रास्ता नहीं दिखा देते, तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे। पहले तय किया गया कि मुख्यमंत्री कार्यालय के सामने अनशन किया जाएगा, लेकिन बाद में पत्रकार बंधु को याद आया कि उस दिन तो घर पर जरूरी काम है। सो अनशन पोस्टपौंड कर दिया गया। जब चेले-चपाटों ने पूछा कि अनशन का क्या हुआ तो बोले कि अब तो जंतर-मंतर पर ही अनशन होगा, ताकि भूखे पेट की आवाज दस जनपथ तक सुनाई दे।
खैर! अनशन का इंतजार करते-करते शुभचिंतक दुबला गए, लेकिन अनशन शुरु न हुआ। हां! तुक्के से निकाय चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद नौकरशाह को सरकार ने तबादले के नाम पर और अधिक मलाईदार ओहदा दे दिया। अब पत्रकार बंधु कहते फिर रहे हैं कि उनका संघर्ष रंग लाया। उन्हीं की वजह से भ्रष्ट नौकरशाह की विदाई हुई है। सो अनशन का कोई मतलब नहीं रह जाता। कहानी खत्म। लेकिन कहने वालों का क्या है। कह रहे हैं कि नौकरशाह ने पत्रकार की औकात के अनुसार रोटी फेंक दी है। अब पत्रकार मजे से रोटी गटककर वैकल्पिक मीडिया की ताकत बताते नजर आ रहे हैं। लेकिन जनाब अब भी यह नहीं बता पा रहे कि इतनी फूं-फां के बाद भी अनशन क्यों नहीं शुरु हुआ और आखिर ये वैकल्पिक मीडिया है क्या बला!
लेखक मनु मनस्वी उत्तराखंड की पत्रकारिता में सक्रिय हैं.






