छत्तीसगढ़ के दरभा इलाके में नक्सलियों ने बड़ा हमला बोलकर जता दिया है कि सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद उनके हौसले बुलंद बने हुए हैं। इस बार जिस तरह से सशस्त्र नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले को निशाना बनाया, इससे उनकी रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाई पड़ा है।
अभी तक वे चुन-चुनकर लोगों पर अपना निशाना साधते थे। लेकिन, अब उन्होंने राजनीतिक रैलियों में सीधे-सीधे धावा बोलने की रणनीति अपना ली है। इसके जरिए वे मुख्य राजनीतिक दलों को भी सीधे-सीधे चुनौती देने लगे हैं। हमले के बाद उन्होंने बस्तर क्षेत्र में स्थानीय जनता को खबरदार किया है कि वह भाजपा की विकास यात्राओं और कांग्रेस की परिवर्तन रैलियों में हिस्सा न ले। वरना, वे मौत के जोखिम से गुजरेंगे। पहली बार माओवादियों ने राजनीतिक गतिविधियों के खिलाफ खुला हल्ला बोला है। इसके बाद केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार की राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
इस ठौर में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकार अपनी ज्यादा ऊर्जा नक्सलियों से निपटने के बजाए, अपने वोट बैंक को मजबूत करने में लगा रहे हैं। हालांकि, दोनों दलों की तरफ से औपचारिक बयानबाजी यही हुई कि सुकमा जिले में हुए नक्सली हमले के मामले में दलीय राजनीति न की जाए। उल्लेखनीय है कि 25 मई को सुकमा से रैली करने के बाद कांग्रेस का काफिला जगदलपुर के लिए वापस लौट रहा था। शाम को करीब 4 बजे जगदलपुर से करीब 40 किमी पहले दरभा क्षेत्र के जीरम घाटी में नक्सलियों ने औचक हमला बोला था। उन्होंने सड़क में विस्फोटक लगाकर आगे वाले वाहन को उड़ा दिया था। विस्फोट इतना भयानक था कि इसकी चपेट में आने वाली कार के परखच्चे उड़ गए थे। इसमें बैठे सभी छह लोग मारे गए। विस्फोट के स्थल पर करीब 6 फुट का गहरा गड्ढा बन गया।
लैंड माइंस के इस विस्फोट के बाद जब 50-60 कारों वाला काफिला थमा, तो पास की पहाड़ियों में घात लगाए बैठे नक्सलियों ने फायरिंग झोंक दी थी। इन लोगों को खास तौर पर कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और वरिष्ठ कांग्रेसी महेंद्र कर्मा की तलाश थी। ये लोग चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे थे कि पटेल और कर्मा कहां हैं? जब कई लोगों की फायरिंग से जान चली गई, तो कर्मा ने खुद हाथ उठाकर समर्पण कर दिया था। नंदकुमार पटेल को उनके बेटे सहित हमलावरों ने अगवा कर लिया था। करीब 400 मीटर जंगल में अंदर ले जाकर इनकी हत्या कर दी गई। महेंद्र कर्मा, बहुचर्चित ‘सलवा जुडूम’ अभियान के जनक समझे जाते हैं। 2005 में यह अभियान शुरू किया गया था। इसके जरिए आदिवासी गांवों को हथियार दिलाकर इन्हें नक्सलियों से मुकाबले के लिए तैयार किया गया। इस चक्कर में आदिवासियों के 500 से ज्यादा गांव खाली करा लिए गए थे। गांव वालों को कैंपों में रख दिया गया था। ‘सलवा जुडूम’ का आशय ‘पीस मार्च’ से है। लेकिन, यह योजना शुरू से ही विवादों में रही है।
मानवाधिकार संगठनों ने यह सवाल उठाया कि सरकार की मिलीभगत से आदिवासी युवाओं को ‘सलवा जुडूम’ के नाम पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है। इससे खीझकर नक्सलियों ने कई बार ‘सलवा जुडूम’ के खिलाफ बड़े अभियान चलाए। बाद में, इस अभियान को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई थी। अदालत ने इस अभियान को गैर-कानूनी करार कर दिया था। अदालत के इस फरमान के बाद भी महेंद्र कर्मा जैसे लोग इस अभियान की पैरवी करते रहे। क्योंकि, राज्य की रमन सिंह सरकार का भी इसे समर्थन रहा है। कांग्रेस के नेता भी अंदर ही अंदर इस अभियान को हवा देते रहे हैं। नक्सली रणनीतिकार मानते रहे हैं कि इस अभियान के जरिए भाजपा और कांग्रेस वाले आदिवासियों में ही फूट डालने की राजनीति कर रहे हैं। जबकि, नक्सली तो मुख्य तौर पर आदिवासियों के बुनियादी हकों की ही लड़ाई लड़ रहे हैं।
नक्सलियों के तमाम दबाव के बावजूद महेंद्र कर्मा ने अपना अभियान जारी रखा। ऐसे में, उन पर कई बार जानलेवा हमले हो चुके थे। लेकिन, पहले वे किसी न किसी तरह बच जाते रहे। लेकिन, दरभा घाटी में नक्सलियों ने उनसे बदला ले ही लिया। हमलावरों का गुस्सा इतना था कि उन्होंने कर्मा के शव को गोलियों से छलनी कर दिया था। नंद कुमार पटेल काफी प्रभावशाली नेता रहे हैं। माओवादियों की तमाम धमकियों के बाद भी वे परिवर्तन यात्राओं का राजनीतिक अभियान जोर-शोर से चला रहे थे। कांग्रेसी अजित जोगी की सरकार में पटेल गृह राज्य मंत्री थे। इस दौर में राज्य सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाए थे। इसमें तमाम नक्सली ‘मुठभेड़ों’ में मारे गए थे। नक्सली रणनीतिकार इस अभियान के लिए पटेल को ज्यादा जिम्मेदार मानते रहे हैं। ऐसे में, वे लंबे समय से पटेल पर निशाना लगाए थे।
जीरम घाटी के हमले में 30 लोग मारे गए हैं। जबकि, दो दर्जन से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ला (84) भी हमले की चपेट में आ गए थे। वे गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में जीवन-मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। इस हादसे में कांग्रेस के राज्य स्तर के नेतृत्व को खासा नुकसान हुआ है। क्योंकि, नंद कुमार पटेल कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जाते रहे हैं। इसके बाद दावेदारी आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा की रही है। लेकिन, दोनों हमले में मारे गए। कई सक्रिय कार्यकर्ता भी मार दिए गए हैं। इससे पार्टी के लोगों में बड़ी दहशत पैदा हो गई है। अहम सवाल है कि इस भयानक हमले के बाद पार्टी के कार्यकर्ता कैसे दूर-दराज के इलाकों में प्रचार अभियान के लिए निकल पाने की हिम्मत करेंगे? हमले के बाद नक्सली कमांडरों ने ऐलान किया है कि वे आगे भी भाजपा और कांग्रेस दोनों के राजनीतिक अभियानों को रोकने के लिए हमले करेंगे। उल्लेखनीय है कि इसी साल राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं।
नक्सलियों के (दंडकारण्य जोनल कमेटी) एक कमांडर ने मीडिया को लिखित सूचना देकर जानकारी दी है कि जीरम घाटी के हमले में उनके खास निशाने पर नंद कुमार पटेल और महेंद्र कर्मा ही थे। नक्सलियों की तरफ से स्थानीय लोगों को कांग्रेस और भाजपा की रैलियों में हिस्सेदारी न लेने के लिए खबरदार किया गया है। कहा गया है कि भाजपा वाले विकास यात्रा के नाम पर ‘विनाश यात्राएं’ निकाल रहे हैं। क्योंकि, रमन सिंह सरकार के दौर में आदिवासियों के बुनियादी हक सबसे ज्यादा छीने गए हैं। नक्सली नेताओं ने नक्सल विरोधी सुरक्षा बलों के अभियान तुरंत रोकने की भी मांग की है।
नक्सलियों के इन तेवरों के बाद केंद्र सरकार की भी चुनौती बढ़ गई है। हमले के बाद सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री भी छत्तीसगढ़ का दौरा कर चुके हैं।
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने रायपुर में राजनीतिक संकल्प जताया है कि राज्य में उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो महज दो सालों के अंदर ही हिंसक नक्सलवादियों को पूरी तौर पर काबू में कर लिया जाएगा। इसी के साथ आदिवासी इलाकों के विकास के लिए खास परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। नक्सली हमले के बाद राज्य में तीन दिन का राजकीय शोक भी रखा गया। लेकिन, कांग्रेस और भाजपा के लोगों ने इस शोककाल में भी दलीय राजनीति का ‘कीचड़’ एक-दूसरे पर फेंकना शुरू कर दिया था। वरिष्ठ कांग्रेसी एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने कह दिया है कि यदि रमन सिंह सरकार ने अपनी रैलियों की ही तरह कांग्रेस की रैली में सुरक्षा प्रबंध कराए होते, तो इतना बड़ा हमला नहीं हो सकता था। जबकि भाजपा के नेता, राज्य में बढ़ रही नक्सली हिंसा के लिए कांगेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नीतियों को कोस रहे हैं।
अब यह बहस शुरू हुई है कि क्या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को काबू में लाने के लिए सैन्य विकल्प की जरूरत है? पहले भी इस मुद्दे पर लंबा वाद-विवाद हो चुका है। इस पचड़े को समझकर केंद्र सरकार ने कह दिया है कि फिलहाल, नक्सलियों के खिलाफ सैन्य विकल्प का कोई प्रस्ताव उसके पास विचाराधीन नहीं है। 22 मई को ही यूपीए सरकार ने चार साल का अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद एक ‘रिपोर्ट कार्ड’ जारी किया था। इसमें भी दावा किया गया कि केंद्र सरकार के नक्सल विरोधी अभियानों के चलते स्थिति में काफी सुधार हुआ है। इसकी वजह से 2009 के मुकाबले नक्सल ताकत लगातार कमजोर पड़ी है।
गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, 2009 में 2258 नक्सली हमले हुए थे। जबकि, 2012 में इनकी संख्या घटकर महज 1412 रह गई। केंद्रीय गृह सचिव आर के सिंह दावा कर चुके हैं कि नक्सल अभियान में यह सफलता ‘आॅपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे अभियानों के चलते मिली है। वे गिनाते हैं कि बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश व झारखंड में नक्सलियों की हालत काफी कमजोर हुई है। यह जरूर है कि ओडिशा और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की ताकत ज्यादा कमजोर नहीं पड़ी। वे दोनों राज्यों में ज्यादा आक्रामक भी हो गए हैं। कांग्रेस के नेता इस असफलता की जिम्मेदारी इन राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों पर डाल रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह खुलकर कह चुके हैं कि जिन राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें हैं, वहीं पर नक्सली आंदोलन ज्यादा फल-फूल रहा है। ऐसे में, कई सवाल जरूर उठ रहे हैं, जिनका जवाब देश को मिलना चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के पूर्व निदेशक वेद मरवाह कहते हैं कि सरकारी आंकड़े अपनी जगह हैं, यह तो बहस का विषय है कि इनमें कितनी वास्तविकता है? लेकिन, जमीनी सच्चाई तो यही है कि नौ राज्यों के 173 जिलों में नक्सलियों का प्रभाव बना हुआ है। कई इलाकों में इनकी समानांतर सरकारें चल रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्थिति चिंताजनक है। नक्सली आंदोलन अब तीसरे चरण में पहुंच गया है। पहले ये लोग बड़े भू-पतियों और धनवानों की हत्या करते थे। दूसरे दौर में, ये सुरक्षा बलों पर निशाना साधते थे। लेकिन, अब तीसरे दौर में ये लोग राजनीतिक दलों के अभियानों पर सीधा हमला बोलने लगे हैं। यह बेहद खतरनाक स्थिति है। इसको कमतर नहीं आंकना चाहिए। खास तौर पर ओडिशा, छत्तीसगढ़ व झारखंड के जंगलों में ये लोग गोरिल्ला युद्ध के जरिए सुरक्षा बलों को भी बड़ी चुनौती दे रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि इनके खिलाफ कारगर रणनीति बनाई जाए। यदि वोट बैंक की राजनीति इसी तरह से हावी रही, तो शायद ही कारगर रणनीति बन पाए?
6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) के ताड़मेटला में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर बड़ा हमला बोला था। इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। दरअसल, नक्सलवादियों ने यह बड़ा हमला ‘आॅपरेशन ग्रीन हंट’ के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया था। सीआरपीएफ के कैंप पर हमले के बाद छत्तीसगढ़ में ‘ग्रीन हंट आपरेशन’ थाम लिया गया था। जो कि दोबारा कभी भी सक्रिय रूप से शुरू नहीं हो पाया। माना जा रहा है कि इस लचर सरकारी रणनीति से नक्सलियों का हौसला और बढ़ा है। इसके पहले नक्सलियों ने सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का दिन-दहाड़े अपहरण कर लिया था। जब सरकार ने नक्सलियों की कई मांगे मान ली थीं, तभी अगवा कलेक्टर मुक्त हो पाए थे।
गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, छत्तीसगढ़ के जंगलों में करीब 10 हजार सशस्त्र नक्सली सक्रिय हैं। ये लोग पड़ोस के आंध्र और ओडिशा में आवाजाही करते रहते हैं। कई मौकों पर तीनों राज्यों के नक्सली कमांडर साझा रणनीति बना लेते हैं। दावा किया जा रहा है कि दरभा क्षेत्र में हुए नक्सली हमले में आंध्र क्षेत्र के एक नक्सली कमांडर की खास भूमिका रही है। लंबे समय से नक्सलियों के ‘लाल गलियारे’ की चर्चा रही है। दरअसल, नक्सलवादी आंदोलन पश्चिम बंगाल से बढ़कर बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश तक अपने पैर पसारते गया है। इसी क्षेत्र को ‘लाल गलियारे’ का नाम दिया गया।
नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाकों में भी सामाजिक काम करने वाले स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि नक्सली आंदोलन कोई सामान्य कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है। यदि सरकार वंचित वर्गों और आदिवासी इलाकों में इंसाफ दे और लोगों के बुनियादी हक दे, तो नक्सलियों का सामाजिक आधार अपने आप कमजोर हो जाएगा। लेकिन, सरकार दूर-दराज के इलाकों में विकास के काम नहीं करती। केवल, सरकारी घोषणाएं होती रहती हैं। ऐसे में, केवल गोली-बारूद के जरिए इस
समस्या का निराकरण नहीं हो सकता। कई इलाकों में नक्सलियों के नाम पर गरीब आदिवासियों को सताया जाता है। इससे भी समस्या जटिल हुई है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, गरीब आदिवासियों के उत्थान पर ज्यादा ऊर्जा लगाए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। इसी की वजह से यह समस्या लगातार जटिल होती जा रही है। दरभा क्षेत्र में हुए हमले से सरकार को सबक सीखने की जरूरत है। केवल, गोली का मुकाबला गोली से करने की रणनीति नहीं चलेगी।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





