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खुले आसमान में चलती है साइकिल वाले गुरु जी की क्‍लास

लग जाती है, गुरु जी की कक्षा कभी भी, कही भी, मकसद सिर्फ शिक्षा। गरीबों को निःशुल्क शिक्षा देने वाले साइकिल शिक्षक का एक ही संदेश है, शिक्षा में क्रान्ति लाना। फर्रूखाबाद के एक गांव से करीब 18 वर्ष पहले राजधानी आए आदित्य का केवल एक ही मकसद रहा है कि गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले और उनके मन से अंग्रेजी का डर खत्म हो। झुग्गी -झोपड़ियों के बच्चे संकोचवश स्कूल जाने से कतराते हैं ,उन बच्चों के घर तक आदित्य की ‘‘पाठशाला’’ पहुंची।

लग जाती है, गुरु जी की कक्षा कभी भी, कही भी, मकसद सिर्फ शिक्षा। गरीबों को निःशुल्क शिक्षा देने वाले साइकिल शिक्षक का एक ही संदेश है, शिक्षा में क्रान्ति लाना। फर्रूखाबाद के एक गांव से करीब 18 वर्ष पहले राजधानी आए आदित्य का केवल एक ही मकसद रहा है कि गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले और उनके मन से अंग्रेजी का डर खत्म हो। झुग्गी -झोपड़ियों के बच्चे संकोचवश स्कूल जाने से कतराते हैं ,उन बच्चों के घर तक आदित्य की ‘‘पाठशाला’’ पहुंची।

शुरू में आदित्य ने अपने खर्चे निकालने के लिए कुछ टयूशन लिए। लेकिन उन्हें लगा वह इस में फंसकर गरीब बच्चों की पूरी मदद नहीं कर पा रहे, तो नौकरी छोड़कर खुद को सिर्फ इस मुहिम के लिए समर्पित कर दिया और इस मुहिम को लोगों की खूब सराहना भी मिली। आदित्य की इस नेक मुहिम से प्रभावित होकर कुछ युवा भी साथ जुडकर काम करना चाहते हैं, लेकिन आदित्य की माली हालत देखकर वे इससे जुड़ने से कतराने लगे हैं क्योकि गुरु जी, खाने को मोहताज, शहर में किराये के मकान में रह पाना संभव नहीं हो पा रहा है। जबकि छात्रों को स्कूलों तक लाने के लिए केन्द्र और प्रदेश सरकारें अरबों रुपये खर्च कर रही है। वही दूसरी तरफ बच्चों तक खुद चलकर पहुँचने वाली ‘‘पाठशाला’’ का अस्तित्व खतरे में है।

समाज निर्माण जज्बे के मिसाल बन चुके आदित्य बिल्कुल ही साधनहीन है। इसलिए निर्धन असहाय बच्चों के लिए कापी/किताबें भी नहीं खरीद पाते है। ट्यूशन पढ़ाने वाले आदित्य को जो भी पैसा मिलता है उसे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर ही खर्च करते हैं। कभी-कभी मलिन बस्तियों के निर्बल बच्चों को एकत्रित करने के लिए इनकों खाने-पीने के सामान को खरीदकर बच्चों को बांटना पड़ता है। वे कहते हैं कि, सरकार या समाज के लोग भले ही उनकी मदद के लिए आगे आएं या न आएं लेकिन मरते दम तक गरीब बच्चों को शिक्षित करते रहेंगे। और गरीब बच्चों को आगे बढ़ाने के अपने सपने को, मैं ऐसे नहीं टूटने दूंगा। गरीबी में ही सही, मेरा संघर्ष जारी है और आगे भी जारी रहेगा। हाँ, यह जरूर है कि लोगों का सहयोग मिल गया तो यह कारवां दूर तक जायेगा। ये कहते हैं कि शिक्षा का अधिकार। और राष्ट्रीय शिक्षा तब तक सफल नहीं हो सकती, जब तक बेरोजगारी-निरक्षरता को दूर नहीं किया जाता। विचारणीय है जो लोग झोपडपट्टी में रहते हैं और कूड़ा बीनने का कार्य- करते हैं वे अपने बच्चों को पढ़ने कैसे भेजें? आदित्य इसी मुददे को उठाने में लगे हुए हैं और इन्हें विश्वास है कि वे एक दिन इसे पूरा करेंगे।

बेशक भारत जैसे देश में साक्षरता दर बढ़ाने के लिए बहुत मेहनत किए जाने की जरूरत है। क्योंकि जब तक देश में एक भी व्यक्ति निरक्षर है, तब तक न तो आजादी के कुछ मायने रहते हैं और न ही खुशहाली के, भले ही विकास की दर कितनी भी हो। निरक्षरता के चलते ये सब बेमानी हो जाती है। क्योंकि निरक्षर व्यक्ति का हक कोई और ही मार लेता है। आज ‘‘राइट-टू-एजूकेशन, जैसे कानूनों को धरातल पर उतारे जाने की बड़ी शिद्दत के साथ महसूस की जानी चाहिए। आदित्य का वाकया भी दिलचस्प है, ट्यूशन के दौरान गुरु जी को इस बात का एहसास हुआ कि हिन्दी मीडियम के बच्चे जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वो अपने आपको इंग्लिश बोलने वालों के बीच हीन पाते हैं। गुरु जी ने बताया कि एक दिन को टयूशन पढ़ाकर निकल रहे थे, तभी एक झोपड़ी में रहने वाले बच्चे को, एक लड़के ने अंग्रेजी में डपट कर सड़कछाप, बोला। बस उसके बाद से उनके मन में आया कि वो अब इन सड़क छाप बच्चों को ही अंग्रेजी ज्ञान देंगे। उन्होंने बताया कि उनके पास कक्षा चलाने के लिए कोई जगह नहीं थी। साइकिल से वो चलते थे। इस लिए अपनी साइकिल पर ही कक्षा लगाने का निणर्य लिया। आदित्य गरीब, निराश्रित, बेघर, मलिन बस्तियों के बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं। उनका उद्देश्‍य उन गरीब लोगो को ‘‘मुफ्त’’ शिक्षा देना है जो आर्थिक तंगी के कारण शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं।

आज के दौर में बिना कम्प्यूटर और इंग्लिश सीखे आगे बढ़ना और अच्छी नौकरी मिलना असंभव सा हो गया है अगर समाज में खड़ा होना है तो अंग्रेजी शिक्षा कपड़ों की तरह ही अनिवार्य उपकरण हो चुकी है। आदित्य कहते हैं कि जब मैंने अंग्रेजी ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने की सोची तो सबसे पहले मेरे दिमाग में सडक पर रहने वाले ये लोग ही थे। फिर मैं भी आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं था। इसलिए मैंने साइकिल की मदद से सड़क पर ही कक्षाएं लगाने की शुरुआत कर दी। वो निर्धन बच्चों को ज्ञान देकर उन्हें कुछ काबिल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। बल्कि वे चाहते हैं कि निर्धन, असहाय बच्चों को निःशुल्क कम्प्यूटर भी सीखने को मिले। लेकिन उनके पास इतना धन नहीं है कि वे कम्प्यूटर का खर्च वहन कर सके। आदित्य की माने तो हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है, शिक्षा में अमीर-गरीब का भेद खत्म होना चाहिए। अमीर घर के बच्चे बड़े निजी स्कूलों में पढते हैं। तो एक गरीब घर के बच्चे के लिए स्कूली शिक्षा पाना भी टेढी खीर साबित होता है। विकास के रास्ते पर एक साथ आगे बढ़ने के लिए इस अमीर शिक्षा और गरीब शिक्षा के भेद को मिटाने की जरूरत है। क्योंकि शिक्षा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है।

आदित्य से दो टूक

– नौकरी क्यों नहीं की?

— कई जगह इंटरव्यू दिये। बात नहीं बनी और ग्रामीण परिवेश के साथ कुछ अन्य दिक्कतें कारण बनीं।

– टयूशन क्यों शुरू किए?

— मकान का किराया और रोजमर्रा की जरूरत के लिए पैसे तो चाहिए।

– शादी क्यों नहीं की?

— गरीबी आड़े आ गयी। और अपने लक्ष्य से डगमगाना नहीं चाहता था।

– आपकी शैक्षिक योग्यता?

— बी.एस.सी.बाँयोलाँजी।

– रूटीन?

— सुबह अपने खर्च के लिए टयूशन, पूरे दिन निःशुल्क साइकिल क्लास।

– किस बात का मलाल?

— आई.ए.एस. का सपना संजोया था।

– काम तो बहुत कठिन है?

— लगन, हो तो कठिन काम भी आसान लगने लगता है।

– क्लासेस सड़क पर ही क्यों?

— गरीब और पिछड़े बच्चों को स्कूल की राह दिखाना है मकसद।

– सड़क किनारे ऐसा भीड़ वाला काम करने में काफी अड़चन आती होगी?

– इस बात का तर्जुबा हो गया है कि उन्हें अपनी क्लास किस समय और कहाँ लगानी चाहिए।

– कैमरा अपने साथ क्यों रखते हैं?

— तमाम जरूरी चीजों को रिकार्ड कर, उनका पढ़ाई में इस्तेमाल करते हैं।

– अंग्रेजी पढ़ाने का तरीका?

— बेसिक ग्रामर से शुरुआत करके उच्चारण पर विशेष ध्यान। मैंने ग्रामर पर 24 किताबें भी लिखी हैं। इनकी मदद से ही पढ़ाता हूँ।

– आपका लक्ष्य क्या है?

— जन-जन को शिक्षित करना, न अंगूठा लगाओ, न अनपढ़ कहलाओ।

– सपना क्या है?

— निराश्रित, बेघर, सड़कछाप, असहाय बच्चों के लिए एवं पिछडी जातियों की शिक्षा हेतु झोपडपट्टी, मलिन बस्तियों में हमारी साइकिल पहुंचे।

– अपडेट कैसे रहते हैं?

— अंग्रेजी में अपने स्तर से नवीनतम जानकारी और ट्रेड पर नजर रखना फिर अखबार तो है ही।

– भविष्य के बारे में?

— यही काम आगे बढ़ाना है। बस यही मेरी जीत और जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई है।

– क्या आप महान हैं?

— यह मेरा नशा है, मगर समाज और राष्ट्र के हित में है तो ठीक ही है।

– जीवन में सच क्या है?

— मौत तो होनी ही है।

– झूठ क्या है?

— मैं अमर हूँ। हमेशा मुझे यही रहना है।

– जीवन का अर्थ?

— संसार में जियो, संसार आप में न जीने लगे।  

निराश्रित, बेघर, असहाय बच्चों का गुरु है ये साइकिल वाला : ज्ञात हो, स्कूल न जा सकने वाले बच्चों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, आदित्य कुमार। जनपद फर्रूखाबाद के मूल निवासी पिछले 18 सालों से लखनऊ के निशातगंज में रहते हैं, इनके पिता श्री भूपनरायन पेशे से मजदूरी करते थे। आदित्य एक अत्यन्त ही पिछड़े अविकसित गाँव सलेमपुर के एक झोपड़ी में जन्म होने के उपरान्त भी समाज के समस्त जाति, धर्म, के निर्धन बच्चों को जीवन भर मुफ्त पढ़ाने का भागीरथी संकल्प लिये निःस्वार्थ भाव से मलिन बस्तियों में जाकर शिक्षित करने में लगे हुए हैं। इस शिक्षक ने आज हमारे बाजारवादी भावना से ग्रसित समाज के सामने जो मिसाल कायम कर रखी है उसे शायद ही कोई भुला सके। आदित्य बच्चों के बीच- अंग्रेजी टीचर, गरीबों के शिक्षक, साइकिल वाले गुरु जी, के नाम से जाने जाते है। क्योंकि उनकी ‘‘पाठशाला’’ साइकिल के जरिए चलती है।

बकौल आदित्य मैंने जब होश सम्भाला, तभी से काम करके पढ़ाई करता था, दिन में मजदूरी करता और रात में पढ़ता था, 1995 में मैंने कानपुर विश्वविद्यालय से बायोलोजी में बी.एस.सी. किया। मैं आई.ए.एस. आफिसर बनना चाहता था। लेकिन गरीबी ने मेरे उस सपने पर ग्रहण लगा दिया। फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और उन बच्चों को पढ़ाने लगा, जिन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वह कभी पढ़ पायेंगे। आदित्य बताते हैं कि मैंने अपना बचपन उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रूखाबाद, एक बस्ती सलेमपुर में गुजारा है। जहाँ मेरे बाबू जी तपती जमीन पर नंगे पांव मजदूरी का काम करते थे, कभी काम मिलता कभी नही, माँ थी- कि बाबू का हाथ बंटाने की कोशिश में जुटी रहती थी। इतने पर भी दो जून की रोटी का ही जुगाड़ हो पाता था। ऐसे में उनसे पढ़ाई या फीस की उम्मीद, मैं भला कैसे करता, तब मैंने सोचा था कुछ ऐसा करूंगा कि कोई बच्चा इन हालातों के चलते अनपढ़ न रह जाये। आदित्य ने यह करने से पहले भी खासी मेहनत मजदूरी की है।

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