बस्तर (छत्तीसगढ़) की जीरम घाटी में हुए भयानक नक्सली हमले के बाद एक बार फिर हुंकार भरी जा रही है कि अब हिंसक नक्सलियों का सफाया कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार के आला हुक्मरान तरह-तरह के लोक लुभावन संकल्प जताते दिखाई पड़ रहे हैं। केंद्रीय सुरक्षा बलों ने बस्तर में हमलावरों की तलाश में एक सघन ‘सर्च आपरेशन’ भी शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एक बार फिर भरोसा दे रहे हैं कि अब सरकार नक्सल समस्या के निपटारे के लिए नए सिरे से निर्णायक पहल शुरू करेगी। ताकि, आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भी विकास की रोशनी जमकर फैल सके।
सरकारी कारिंदों ने नक्सली प्रभाव वाले इलाकों में विकास की गंगा बहाने के लिए एक बार फिर बढ़-चढ़कर लफ्फाजी करने की होड़ लगा दी है। यह भी कहा जा रहा है कि हिंसक नक्सलियों को निपटाने के लिए केंद्र से ज्यादा ‘फौज-फाटा’ लगाया जाएगा। क्योंकि, इन लोगों ने राजनीतिक काफिलों पर घातक हमले शुरू कर दिए हैं। इन्हें बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
याद कीजिए, अप्रैल 2010 में छत्तीसगढ़ के ही दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के एक कैंप में हमला बोला था। इसमें एक साथ 76 जवानों की मौत हो गई थी। इनके आधुनिक हथियार भी नक्सली लूट ले गए थे। इस हमले ने राजसत्ता को सीधे-सीधे एक बड़ी चुनौती दे दी थी। इस दौर में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने संकल्प जताया था कि सुरक्षा बल अब निर्णायक अभियान को पूरा करके ही दम लेंगे। गृह मंत्रालय के आलाधिकारियों ने जानकारी दी थी कि नक्सल विरोधी कारगर अभियान के लिए छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आंध्र, महाराष्ट्र, झारखंड व मध्य प्रदेश में एकीकृत आपरेशन शुरू किया जाएगा। ताकि, नक्सली दल राज्यों की सीमा की बदली के बावजूद सुरक्षित बच नहीं पाएं।
लेकिन, सरकार का कोई जिम्मेदार शख्स यह सफाई देने को तैयार नहीं है कि आखिर इस तरह के सरकारी संकल्प हर बार आधे-अधूरे क्यों रह जाते हैं? दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ पर बड़ा हमला ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ के खिलाफ दबाव बनाने के लिए ही किया था। इस नक्सल विरोधी कारगर आपरेशन की वजह से कई राज्यों में नक्सली बड़े दबाव में आते जा रहे थे। पश्चिम बंगाल और विदर्भ के इलाके में कई जगह ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ की चपेट में कुछ निर्दोष आदिवासी भी आ गए थे। इसके बाद इस आपरेशन को लेकर कई विवाद शुरू हुए। खास तौर पर तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ के खिलाफ केंद्र पर दबाव बनाया था।
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर इलाके में नक्सलियों की पकड़ काफी मजबूत रही है। लेकिन, चिदंबरम की पहल पर इस क्षेत्र में ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ जोर-शोर से शुरू हुआ था। इसके दबाव में नक्सलियों ने अपनी हिंसक गतिविधियां बढ़ा दी थीं। इस दौर में ममता बनर्जी का रुख नक्सलियों के प्रति कुछ नरम था, ऐसे में उन्होंने यूपीए सरकार पर दबाव बढ़ाया था। यह दबाव इसलिए भी कारगर हुआ था, क्योंकि इस अवधि में तृणमूल कांग्रेस यूपीए सरकार का अहम हिस्सा थी। माना जा रहा है कांग्रेस नेतृत्व ने राजनीतिक समीकरणों का लिहाज करके ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ की रफ्तार धीमी कराई थी।
वामदलों के कई सदस्यों ने संसद में यह सवाल लगातार उठाया है कि सरकार नक्सल समस्या का हल महज सैन्य बलों के जरिए कैसे ढूंढ़ रही है? जबकि, हकीकत यही है कि देश के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में ही नक्सलवाद का ज्यादा प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में, जरूरी है कि सरकारी तंत्र, यह पता करे कि आखिर स्थानीय वंचित वर्ग नक्सलवाद के प्रति आकर्षित क्यों होता है? केंद्र सरकार ने इन इलाकों के विकास के लिए तमाम योजनाएं बनाईं, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं हो पाया। क्योंकि, कई राज्यों में केंद्र और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल के बजाए खींचतान की ही स्थिति बनी रही।
अब केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रभारी सुशील कुमार शिंदे हैं। वे पिछले दिनों यह दावा कर रहे थे कि केंद्रीय नक्सल विरोधी अभियानों के चलते तेजी से स्थिति में सुधार आ रहा है। नक्सल प्रभाव वाले इलाकों में कमी आ रही है। इसके लिए वे अपने मंत्रालय की कार्यकुशलता को शाबासी देते नजर आ रहे थे। लेकिन, मंत्री जी जब यह ‘सुहावनी’ तस्वीर पेश कर रहे थे, तो वे कई जमीनी सच्चाईयों को छिपाने की कोशिश जरूर कर रहे थे। वे मीडिया को यह साफ-साफ नहीं बता पाए कि ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे अभियानों का फलित क्या रहा है? क्या यह सच्चाई नहीं है कि पिछले सालों में राजनीतिक दबावों के चलते इन अभियानों की रफ्तार थामी गई है?
केंद्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने पिछले दिनों यह स्वीकार किया था कि कई राज्यों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी से आदिवासी कल्याण की परियोजनाएं ठीक से लागू नहीं हो पाईं। यदि नक्सली इलाकों में स्थानीय प्रशासन का पक्का संकल्प होता, तो कुछ बाधाओं के बावजूद विकास परियोजनाएं ठीक से लागू हो पातीं। छत्तीसगढ़, ओडिशा व झारखंड में तमाम सरकारी दबावों के बावजूद नक्सली आतंक बढ़ा है। इसकी वजह से सड़क, अस्पताल व बिजली जैसी तमाम परियोजनाएं आदिवासी गांवों तक नहीं पहुंच पाई हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह तो खुलकर आरोप लगा चुके हैं कि उनके यहां राजनीतिक कारणों से केंद्र ने पूरा सहयोग नहीं किया। जबकि, दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी यह कहने में नहीं चूकते कि आदिवासी इलाके के विकास के लिए जो पैसा दिल्ली से आता है, उसे रमन सिंह सरकार दूसरे मदों में लगा देती है। इसकी वजह से ही राज्य में नक्सलवाद की समस्या विकट हो चली है।
25 मई को जीरम घाटी में जो नक्सली हमला हुआ, उसमें कांग्रेस के 16 लोग मारे गए हैं। इनमें प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और चर्चित कांग्रेसी महेंद्र कर्मा भी थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं बुजुर्ग नेता विद्या चरण शुक्ला इस हमले में गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इस हमले में 30 लोगों की मौत हुई है। दरअसल, सुकमा से कांग्रेस की ‘परिवर्तन रैली’ का काफिला जगदलपुर की तरफ लौट रहा था। घात लगाकर बैठे नक्सलियों के एक बड़े समूह ने कारों के काफिले पर हमला बोल दिया था। इसको लेकर अब भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों की जंग शुरू हो गई है। इसी साल राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं। सो, चुनावी सियासत का यह एक नया मुद्दा मिल गया है।
कांग्रेस नेतृत्व अपने नेताओं की ‘कुर्बानी’ के जरिए अपना वोट बैंक बढ़ाने की जुगाड़ में है। पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी खुलकर कह रहे हैं कि इस हमले के पीछे कहीं न कहीं सरकार के लोगों की भी साजिश रही है। कांग्रेस की इस सियासत पर भाजपा नेतृत्व ‘हाय-हाय’ करने लगा है। मुख्यमंत्री रमन सिंह, कांग्रेस के तमाम आरोपों से झल्लाकर कह रहे हैं कि कम से कम लाशों के ऊपर तो सियासत न की जाए। एक तरफ वोट बैंक की रणनीति के दांव-पेंच हैं, तो दूसरी तरफ दोनों
सरकारें फिर से नक्सलियों के सफाए के लिए कई आपरेशन चलवाने के संकल्प जता रही हैं। लेकिन, राज व्यवस्था के संचालक नक्सली समस्या की मूल जड़ की तलाश में नहीं जाना चाहते। सभी इस हकीकत को जानते हैं कि नक्सलवाद कोई सामान्य कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है। जब तक आदिवासी और वंचित वर्गों के खिलाफ नाइंसाफी का भाव रहेगा, तब तक नक्सलवाद की जड़ें पनपती रहेंगी। इसे आप गोली-बारूद की ताकत से थाम नहीं सकते। यदि ऐसा हो पाता, तो देश के करीब 200 जिलों में नक्सलवाद के हिंसक डैने इतने नहीं फैल गए होते!
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





