Virendra Yadav : ये मार्क्सवाद भी क्या अजीब शै है! अब देखिये कि मनसे (शिवसेना का नया अवतार) का एक कारकून कहता है कि मैं मार्क्सवादी हूँ क्योंकि कवितायेँ लिखता हूँ… डीपीटी (एनसीपी) कहते हैं कि मैं तो प्रचंड के सम्मान में भोज ही देता हूँ तो तो मार्क्सवादी हूँ ही. अशोक वाजपेयी प्रचंड को गुलदस्ता भेंट करते हैं इसलिए वे तो हुए ही. सलवाजुडूम कीर्ति के विश्वरंजन मार्क्सवादी न होते तो फैज़ पर आयोजन ही क्यों करवाते!
'सत्ता' संपादक के तो पिता ही मार्क्सवादी रहे हैं फिर उनके मार्क्सवादी होने में क्या शक ?…पकिस्तान के तो सारे फ़ौजी अफसर मार्क्सवादी हैं क्योंकि वे फैज़ के तराने 'हम देखेंगें' को झूम के सुनते है… लेकिन विनायक सेन कहते हैं कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ… अरुंधती राय भी खुद को मार्क्सवादी नहीं कहतीं. सीमा आजाद, सोनी सोरी, शीतल साठे, सुधीर धावले सहित हजारों दलित व आदिवासी कहते हैं कि न तो हम मार्क्सवादी हैं न माओवादी फिर भी वे देशद्रोही करार कर जेल भेज दिए जाते हैं…. या, रब यह कैसा दौर है कि जो खुद को मार्क्सवादी कहलाने को बेताब हैं वे 'तख़्त' पर और जो इनसे इनकार कर रहे हैं उनके लिए 'तख्ता'.
जाने-माने समालोचक और साहित्यकार वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.





