Ghanshyam Srivastava : सन् २००० में जब मैंने हिन्दुस्तान अखबार, रांची में ज्वायन किया था, तब हमें कंपनी की ओर से वर्किंग आवर में तीन बार चाय मिलती थी। कैंटीन वाला थाली में चाय की कप सजा कर लाता था। उनमें पांच फीसदी फीकी चाय, बाकी मीठी चाय होती थी। २०११ आते-आते यह अनुपात ६०-४० का हो गया। मतलब १०० प्याली में से साठ मीठी, चालीस फीकी। मैंने देखा किस तेजी से डायबेटिक अखबारनवीसों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही गया। आदमी उतने ही लेकिन फीकी प्यालियों की संख्या बढ़ती गयी।
कमोबेश अन्य कई संस्थानों के मित्र भी इन आंकड़ों की तसदीक करते हैं। क्या कामकाजी लोगों की जीवनशैली में आये बदलावों की वजह से चुपचाप पांव पसारती इस सुरसा के बारे में कम से कम हमारे मीडिया के मित्र सोचते हैं। मेरी चिंता इस बात को लेकर ज्यादा है कि हमारे प्रोफेशन में मुफ्त की पार्टी और दारू की बोतलों का स्कोप कुछ ज्यादा ही है और हमारे मीडिया के बंधु इन मुफ्त की पार्टियों को अपना अधिकार भी समझते हैं। बताइए, मेरी चिंता वाजिब है कि नहीं?
पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.





