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पाकिस्तान पहुंचे डा. वेद प्रताप वैदिक बता रहे- यहां भारत के लिए है उत्साह

पिछले पांच दिनों में, जब से मैं लाहौर पहुंचा हूं, पाकिस्तान के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं से मेरी भेंट हो चुकी हैं. भावीप्रधानमंत्री मियां नवाज़ शरीफ और प्रांतों के मुख्यमंत्रियों से भी मिल चुका हूं. राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने मुझे कराची बुलाया और उन्होंने 'ज़रदारी हाउस' में मुझे स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन करवाया. उन्होंने अपने हाथ से मुझे सिंधी टोपी पहनाई और मोइन जोदड़ो का चादर उढ़ाया.

पिछले पांच दिनों में, जब से मैं लाहौर पहुंचा हूं, पाकिस्तान के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं से मेरी भेंट हो चुकी हैं. भावीप्रधानमंत्री मियां नवाज़ शरीफ और प्रांतों के मुख्यमंत्रियों से भी मिल चुका हूं. राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने मुझे कराची बुलाया और उन्होंने 'ज़रदारी हाउस' में मुझे स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन करवाया. उन्होंने अपने हाथ से मुझे सिंधी टोपी पहनाई और मोइन जोदड़ो का चादर उढ़ाया.

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी शुजात,  इमरान खान,  मुख्यमंत्री नज़्म सेठी, राज्यपाल मख्दूम तथा अनेक कश्मीरी पख्तून,  बलूच और सिंधी नेताओं से भी बात हुई. लाहौर के चेम्बर ऑफ कामर्स और जीमखाना क्लब में दर्जनों उद्योगपतियों और बुद्धिजीवियों से लंबे-लंबे संवाद भी हुए. पाकिस्तान के कई प्रसिद्ध टीवी और रेडियो के एंकर मुझे लगभग रोज़ इन्टरव्यू कर रहे हैं. कई पुराने विदेश मंत्रियों जैसे सरताज़ अजीज और खुर्शीद कसूरी आदि से व्यक्तिगत बातचीत हो रही है. बड़े संपादकों, प्रोफेसरों और फौज के सेवा-निवृत्त अफसरों से भी खुलकर बात हो रही है. 18 से 20 घंटे रोजाना की व्यस्तता के बावजूद थकावट महसूस नहीं हो रही है.

ऐसा क्यों हो रहा है? इसका रहस्य क्या है? शायद यह है कि पिछले 30 वर्षों से मैं लगातार पाकिस्तान आ रहा हूं लेकिन इस बार यहां भारत से संबंध-सुधार की जितनी आशा जगी है,  शायद पहले कभी नहीं जगी.मुझे अभी तक एक भी आदमी,  लाहौर या कराची में ऐसा नहीं मिला,  जिसका रवैया निषेधात्मक हो. हर तबके के लोग यही चाहते हैं कि मियां नवाज़ शरीफ के नेतृत्व में भारत और पाकिस्तान के सबंध ऐसे हो जाएं,   जैसे फ्रांस और जर्मनी के हैं. कल रात लाहौर के सबसे लोकप्रिय रेडियो चैनल एफ.एम. 95 (पंजाब रंग) ने मुझे लगभग एक घंटे इंटरव्यू किया. इस चैनल को लगभग 7-8 करोड़ लोग रोज सुनते हैं.बिजली-संकट के कारण टीवी चैनलों से ज्यादा श्रोता रेडियो चैनलों को मिल जाते हैं. कल इंटरव्यू के दौरान श्रोताओं ने इतनी बड़ी संख्या में कंप्यूटर और फोन पर मुझसे बात करनी चाही कि एंकर इफ्तिखारमलिक को उनसे माफी मांगनी पड़ी. एक श्रोता ने कहा कि मैं 'डॉक्टर साहब वैदिक' के लिए अल्लाह ताला से दुआ करने के लिए विशेष नमाज पढ़ूंगा.

मैंने अपनी सभी भेंट-वार्ताओं में पाकिस्तानी पत्र्कार-बंधुओं से कहा कि ''हॉ,   भारत बड़ा भाई है. हम यह मानते है. लेकिन वह 'दादा' नहीं है,  'भाई' है. वह 'बिग ब्रदर' नहीं है,  'एल्डर ब्रदर' है. अगर आप अपने बड़े भाई का सम्मान करेंगे तो वह आप पर अपना प्यार लुटाने में जरा भी कोताही नहीं करेगा.'' दो वरिष्ठ पत्रकारों ने,  जो भारत के प्रति कठोर रवैए के लिए जाने जाते हैं,  टीवी इंटरव्यू में मुझसे कश्मीर और सियाचिन के बारे में ज़रा तीखे सवाल पूछे. उन्होंने कहा कि आप कश्मीर को कब आजाद करेंगे? संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव के मुताबिक उसे आत्म-निर्णय का अधिकार कब देंगे? मैंने उन्हें कहा कि आत्म-निर्णय का अधिकार और द्विराष्ट्रवाद (टू नेशन थ्योरी),  दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं,  क्योंकि आत्म-निर्णय के तहत कश्मीरी लोग भारत में भी मिल सकते हैं या बिल्कुल आजाद भी हो सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो जिन्ना साहब का सिद्धांत तो गल जाएगा,  क्योंकि उसके मुताबिक कश्मीर को सिर्फ पाकिस्तान में ही मिलना चाहिए. कश्मीर मुस्लिम इलाका है,  इसलिए उसे इस्लामी पाकिस्तान में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. मैंने एक बार प्रधानमंत्री बेनज़री भुट्टो से पूछा था कि ''आप अपने कश्मीर में पहले आत्म-निर्णय क्यों नहीं करवा लेंती? शर्मा-शर्मी में शायद फिर हमारे नेता भी तैयार हो जाएं.'' वे हंस पड़ीं लेकिन दूसरे दिन 'न्यूयार्क टाइम्स' में उन्होंने इसी सवाल का जवाब देते हुए साफ कहा कि ''हम, पाकिस्तानी सरकार, कश्मीर को तीसरा विकल्प नहीं दे सकते याने आजाद होने का हक नहीं दे सकते.''

वैसे जितने भी नेताओं से बात हुई सब ने यह बात दोहराई कि वे कश्मीर को डंडे के जोर से नहीं ले सकते. कश्मीर पर सबसे ज्यादा सख्त रवैया रखनेवाले बुजुर्ग पत्र्कार 'नवा-ए-वक्त' के मालिक मजीद नि़जामी साहब ने भी कहा कि 'यह मसला बातचीत से हल किया जाए.'उन्होंने कहा कि जब तक आप कश्मीर को आजाद नहीं करते,  मैं भारत में कदम भी नहीं रखना चाहता लेकिन पाकिस्तान के कई पूर्व प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों तथा पाकिस्तानी कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री का रवैया बहुत रचनात्मक और व्यावहारिक था.

मुझे महसूस यह हुआ कि इस वक्त पाकिस्तान में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर है कि भारत के साथ आर्थिक संबंध घनिष्ट हों. एक दूसरे के लिए उनके बाज़ार खुले. एक-दूसरे के देशों में पूंजी लगाएं. कारखाने खोलें.आवाजाही बढ़े. वीज़ा आसानी से मिलें. मुझे लगता है कि मियां नवाज़ शरीफ 'सर्वाधिक अनुगृहीत राष्ट्र' का दर्जा भारत के लिए जल्दी ही घोषित कर देंगे,  हालांकि कृषि-लॉबी अपने लिए पहले बहुत-सी रियायतें चाहती हैं.

पाकिस्तान के लगभग हर नेता ने मुझसे पूछा कि क्या भारत की सरकार इतनी सक्षम है कि वह कुछ नई पहल कर सके. उनका मानना है कि भारत में चुनाव कभी भी हो सकते हैं. इसके अलावा बड़े-बड़े घोटालों ने सरकार की छवि चौपट कर दी है. कुछ नेताओं ने पूछा कि हम थोड़ा इंतजार करें तो कैसा रहे? मेरा जवाब था कि हमारी सरकार अभी एक साल से भी ज्यादा चलेगी. उसके गिरने के आसार बहुत कमहैं. इसके अलावा जहां तक पाकिस्तान का सवाल है,  उससे बात करने में वह पूर्ण सक्षम है. यदि भारत सरकार पाकिस्तान से संबंध सुधारने की कोई उचित पहल करेगी तो भारत के लगभग सभी दल उसका समर्थन करेंगे.

इस वक्त मियां नवाज़ शरीफ के सामने नई-नई समस्याएं,  खड़ी हो रही हैं. उन्होंने इधर तालिबान से शांति-वार्ता की पेशकश की और उधर अमेरिकी फौज ने 'ड्रोन' हमला कर दिया. उसमें तालिबान का बड़ा नेता वलीउल्लाह मारा गया. बात होती,  उसके पहले ही टूट गई. सउदी अरब से हजारों पाकिस्तानी बेरोजगार होकर लौट रहे हैं. बलूचिस्तान में अभी तक मुख्यमंत्री के नाम ही तय नहीं हो पा रहा है. बिजली का संकट गर्मी के कारण और भंयकर हो गया है. लेकिन स्वयं मियां नवाज़ औरपाकिस्तान की आम जनता को भरोसा है कि नई सरकार जैसे ही अगले सप्ताह अपना काम शुरु करेगी,  हालात में सुधार होगा. मुझे सबसे संतोषजनक बात यह लगी कि सभी पाकिस्तानी दलों के नेताओं ने मुझे भरोसा दिलाया कि आंतरिक मामलों में चाहें हमें मियां नवाज़ का विरोध करना पड़े लेकिन भारत से संबंध-सुधार के लिए वे जो भी पहल करेंगे, उसका हम खुलकर समर्थन करेंगे. मियां नवाज़ शरीफ और उनके भाई मियां शाहबाज़ शरीफ को मैंने भारत के कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के अध्यक्षों के शुभकामना संदेश दिए और उनकी विजय पर भारत की आम खुशी जाहिर की तो उन्होंने भी कहा कि पाकिस्तान में भी भारत के लिए पूरा उत्साह है.  हम लोग मिलकर अब दक्षिण एशिया के इतिहास का नया अध्याय क्यों नहीं लिखें?

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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