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भारत में न्यूज चैनलों का डगमगाता बिजनेस

: मुनाफे का स्वाद चखने को संघर्ष करते न्यूज चैनल : आज तक, हेडलाइंस टुडे, तेज और दिल्ली आज तक जैसे न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड को वित्त वर्ष 2010-11 में 2009-10 के मुकाबले ऑपरेटिंग प्रॉफिट के मोर्चे पर 50 फीसदी की चोट पहुंची है : सीएनएन आईबीएन और आईबीएन7 न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली आईबीएन18 ब्रॉडकास्ट लिमिटेड अभी तक मुनाफे का स्वाद चखने को तरस रही है : एनडीटीवी अंग्रेजी और एनडीटीवी हिंदी न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में 6.8 फीसदी था जो कि 2020-11 में -3.8 फीसदी रह गया :

: मुनाफे का स्वाद चखने को संघर्ष करते न्यूज चैनल : आज तक, हेडलाइंस टुडे, तेज और दिल्ली आज तक जैसे न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड को वित्त वर्ष 2010-11 में 2009-10 के मुकाबले ऑपरेटिंग प्रॉफिट के मोर्चे पर 50 फीसदी की चोट पहुंची है : सीएनएन आईबीएन और आईबीएन7 न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली आईबीएन18 ब्रॉडकास्ट लिमिटेड अभी तक मुनाफे का स्वाद चखने को तरस रही है : एनडीटीवी अंग्रेजी और एनडीटीवी हिंदी न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में 6.8 फीसदी था जो कि 2020-11 में -3.8 फीसदी रह गया :

देश में मौजूद तकरीबन 50 न्यूज चैनलों में से अधिकांश चैनल मुनाफे का स्वाद चखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुछ चैनल तो ऐसे भी हैं जो आज तक कभी मुनाफे का स्वाद ही नहीं चख पाए हैं। इसका कारण बिल्कुल साफ है। न्यूज चैनलों का यह बाजार मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से ज्यादा भीड़ वाला हो चुका है। इसके अलावा इस बाजार में राजस्व को लेकर कांटे की जंग है। ऐसी स्थिति में किसी भी न्यूज चैनल के लिए कमाई करना या मुनाफा कमाना बेहद मुश्किल हो गया है। आम तौर पर किसी भी टीवी चैनल की आमदनी दो स्रोतों से होती है। पहला विज्ञापन से और दूसरा सब्सक्रिप्शन से। लेकिन भारत में सब्सक्रिप्शन के जरिए न्यूज देखने का चलन कम है। इसलिए यहां न्यूज चैनलों के लिए आय का सबसे बड़ा स्रोत विज्ञापन ही है।

इसके अलावा न्यूज और मनोरंजन चैनलों को मिलने वाले कुल विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा जनरल एंटरटेनमेंट चैनलों (जीईसी) की झोली में जाता है। ऐसे में न्यूज चैनलों के लिए मुनाफा कमाना बेहद मुश्किल हो चला है। फिक्की केपीएमजी की 2011 की रिपोर्ट पर गौर करें तो अंग्रेजी न्यूज चैनलों की विज्ञापन राजस्व में 3.6 फीसदी हिस्सेदारी है। वहीं, अंग्रेजी बिजनेस चैनलों की हिस्सेदारी 1.5 फीसदी है तो हिंदी न्यूज चैनलों की हिस्सेदारी 8.5 फीसदी है। स्थानीय न्यूज चैनलों की विज्ञापन राजस्व में हिस्सेदारी महज 3.6 फीसदी है। इस तरह से देखें तो कुल न्यूज चैनलों की विज्ञापन की दौड़ में हिस्सेदारी 20 फीसदी का आंकड़ा भी नहीं छू पा रही है। वहीं, दूसरी तरफ न्यूज चैनल अपने खर्चों का मैनेजमेंट करने में कहीं पीछे हैं। यह एक ऐसा कारण है जिस पर सभी न्यूज चैनल ध्यान दे रहे हैं लेकिन कुछ को अगर छोड़ दें तो कोई भी चैनल अपने खर्चों को सीमित करने में कामयाबी नहीं हासिल कर पा रहा है।

देश में मौजूद न्यूज चैनलों का व्यापार वह गति नहीं पकड़ पा रहा है जैसी की उम्मीद थी। आंकड़े इस बात के गवाह हैं। इक्रा की हालिया रिपोर्ट पर गौर करें तो वित्त वर्ष 2010-11 के दौरान पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले कई न्यूज ब्रॉडकास्टिंग कंपनियों को झटका लगा है। आज तक, हेडलाइंस टुडे, तेज और दिल्ली आज तक जैसे न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड को वित्त वर्ष 2010-11 में 2009-10 के मुकाबले ऑपरेटिंग प्रॉफिट के मोर्चे पर 50 फीसदी की चोट पहुंची है। कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में 18.3 फीसदी था जो कि 2010-11 में घटकर 8.8 फीसदी रह गया है। एनडीटीवी अंग्रेजी और एनडीटीवी हिंदी न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में 6.8 फीसदी था जो कि 2020-11 में -3.8 फीसदी रह गया।

सीएनएन आईबीएन और आईबीएन7 न्यूज चैनलों का संचालन करने वाली आईबीएन18 ब्रॉडकास्ट लिमिटेड का ऑपरेटिंग मार्जिन यूं तो कहने को 2010-11 में सुधरा है लेकिन कंपनी अभी तक मुनाफे का स्वाद चखने को तरस रही है। कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में -4.7 फीसदी था जो कि 2010-11 में -2.5 फीसदी रहा। सीएनबीसी टीवी18 और सीएनबीसी आवाज चैनलों का संचालन करने वाली टेलीविजन18 इंडिया लिमिटेड का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में 13.0 फीसदी था जो कि बेहतर होकर 2010-11 में 28.3 फीसदी रहा।

वहीं, जी न्यूज, जी बिजनेस और कई अन्य चैनल चलाने वाली जी न्यूज लिमिटेड का ऑपरेटिंग मार्जिन 2009-10 में 17.5 फीसदी था जो कि 2010-11 में घटकर 15.3 फीसदी रह गया है। यह सभी आंकड़े साफ तौर पर देश में न्यूज चैनलों के डगमगाते व्यापार की तरफ संकेत करते हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि भविष्य में यह सभी चैनल किस तरह से आगे बढ़ते हैं। साभार : बिजनेस भास्कर

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