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राजनीति या बंदूक: किसके हाथ में है कमान?

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) अगर देश और समाज में रैडिकल बदलाव लाने के उद्देश्य से बनी एक राजनीतिक पार्टी है तो उसे इस सवाल का जवाब देना होगा कि छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमले और २७ कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों की हत्या से उसे राजनीतिक रूप से क्या हासिल हुआ है?

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) अगर देश और समाज में रैडिकल बदलाव लाने के उद्देश्य से बनी एक राजनीतिक पार्टी है तो उसे इस सवाल का जवाब देना होगा कि छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमले और २७ कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों की हत्या से उसे राजनीतिक रूप से क्या हासिल हुआ है?

खुद पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए दावा है कि उसने बस्तर के ‘हजारों निर्दोष आदिवासियों पर सलवा जुडूम के जरिये जुल्म ढानेवाले कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और राज्य में जनविरोधी नीतियों को लागू करनेवाले कांग्रेस नेताओं का सफाया करके बदला लिया है.’ सवाल यह है कि क्या यह ‘बदला लेनेवाली’ भाषा एक रैडिकल बदलाव के लिए आम जनता को गोलबंद करके राजनीतिक-वैचारिक लड़ाई लड़नेवाली कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा है या किसी अराजक-कठमुल्ला आतंकवादी संगठन की भाषा?

उससे ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि व्यापक जनतांत्रिक आन्दोलनों और राजनीतिक पहलकदमियों से अलग-थलग इस तरह की सैन्य कार्रवाइयों की ‘राजनीति’ क्या है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसी कोई भी सैन्य कार्रवाई चाहे जितनी धमाकेदार हो और उसका तात्कालिक प्रभाव चाहे जितना नाटकीय हो लेकिन अगर उसके पीछे की राजनीति सिर्फ ‘वर्ग-शत्रुओं से बदला लेने’ यानी ‘सफाया लाइन’ तक सीमित है तो उसकी परिणति एक तरह के अराजक राबिनहुडवाद में ही होनी तय है.

मुश्किल यह है कि बहुतेरे मध्यवर्गीय क्रांतिकारियों के लिए ‘रोमांटिक’ लेकिन अपने मूल चरित्र में अराजक राबिनहुडवाद से सबसे ज्यादा नुकसान रैडिकल बदलाव की राजनीति को ही होता है. इसकी वजह यह है कि यह सैन्यवादी राबिनहुडवाद गरीब जनता को लोकतांत्रिक जनसंघर्षों में उतरने और कारपोरेट लूट और सरकारों की जनविरोधी नीतियों और कार्यक्रमों के खिलाफ जन प्रतिरोध खड़ा करने से रोकता है. वे न सिर्फ बंदूक और सैन्य दलम पर निर्भर होते चले जाते हैं बल्कि अन्याय और जुल्म के खिलाफ लड़ाई में मूकदर्शक बनकर रह जाते हैं. यही नहीं, ‘बदला लेने और सफाया’ करने की राजनीति से हिंसा-प्रतिहिंसा का जो दौर शुरू होता है, उसमें आम गरीबों के जनसंघर्षों और लोकतांत्रिक पहलकदमियों के लिए भी जगह और सम्भावना और भी खत्म होती चली जाती है.

छत्तीसगढ़ से लेकर झारखण्ड और पश्चिम बंगाल तक माओवादी राजनीति की समस्या यह है कि वह आम गरीब जनता खासकर आदिवासियों को प्रतिरोध आंदोलन में उतारने और बड़े जनसंघर्ष खड़ा करने में नाकाम रही है. वह ऐसा करने में इसलिए नाकाम रही है क्योंकि उसकी वैचारिकी में बंदूक उसकी राजनीति पर हावी हो गई है. इसके कारण जहाँ भी गरीब लोगों ने जल-जंगल-जमीन और खनिजों की कारपोरेट लूट और अन्याय के खिलाफ लड़ने की पहल की और जनसंघर्षों में उतरे, वहां भी माओवादी पार्टी की सैन्य कार्रवाइयों ने उन जनतांत्रिक आन्दोलनों को बहुत नुकसान पहुँचाया है. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में लालगढ़ और जंगलमहल के आंदोलन को लीजिए, जहाँ भाकपा (माओवादी) की सैन्य कार्रवाइयों ने एक बड़े जन-उभार की संभावनाओं को खत्म कर दिया.
यह सच है कि रैडिकल बदलाव की नक्सल राजनीति खासकर माओवादी पार्टियों में ‘वर्ग-शत्रुओं के सफाए’ की यह लाइन नई नहीं है लेकिन नक्सलबाड़ी उभार के बाद पिछले पैंतालीस वर्षों में गंगा से गोदावरी तक में बहुत पानी बह चुका है.

इस बीच, वैश्विक स्तर पर भी और देश में भी वाम-क्रांतिकारी राजनीति में बहुत कुछ बदल गया है. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों में बहुत बदलाव आया है. इस बीच, दुनिया भर में खासकर लातिन अमेरिका और दक्षिण पूर्वी एशिया में शासक वर्गों के तीखे हमलों के कारण माओवादी पार्टियों और आन्दोलनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और वे ढलान पर हैं. दूसरी ओर, नेपाल में नेकपा (माओवादी) ने न सिर्फ हथियार डालकर खुली लोकतांत्रिक राजनीति में दखल देने का ऐतिहासिक फैसला किया बल्कि चुनाव लड़कर सत्ता में भागीदारी भी की है. लेकिन भारत में लगता है कि भाकपा (माओवादी) ने दुनिया भर और खुद देश के अनुभवों से कोई खास सबक नहीं सीखा है.

उसकी सशस्त्र क्रान्ति की लाइन पर अत्यधिक जोर और उसके कारण बंदूक पर अति निर्भरता ने उसकी राजनीति को न सिर्फ पीछे ढकेल दिया है बल्कि राजनीतिक रूप से भी वह अलग-थलग पड़ गई है. यही नहीं, इसके कारण वह पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के साथ एक ऐसे घिसाव-थकाव की लड़ाई में फंस गई है जहाँ उसे रणनीतिक और सैन्य रूप से भी ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है.
क्या यह सच नहीं है कि भाकपा (माओवादी) की केन्द्रीय समिति के आधे से अधिक सदस्य या तो गिरफ्तार कर लिए गए हैं या मारे गए हैं? यही नहीं, भारतीय राज्य ने माओवाद के खिलाफ जिस तरह से युद्ध छेड दिया है, उसका मुकाबला सिर्फ सैन्य प्रतिकार या गुरिल्ला युद्ध से नहीं किया जा सकता है. ऐसा कोई भी मुकाबला आत्मघाती होगा.

इस युद्ध का जवाब सिर्फ आम जनता की एकजुटता और जन-प्रतिरोध से ही दिया जा सकता है. लेकिन छत्तीसगढ़ के ताजा सैन्य हमले को देखकर लगता है कि भाकपा (माओवादी) अपनी सैन्य ताकत को लेकर अति-आत्मविश्वास का शिकार हो गई है. ऐसे ही, अति-आत्मविश्वास के कारण श्रीलंका में एल.टी.टी.ई (लिट्टे) का सफाया हो गया जबकि लिट्टे की सैन्य ताकत और लड़ने की तैयारी भाकपा (माओवादी) से कई गुना ज्यादा थी.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. इसी सैन्य दुस्साहसवाद के कारण खुद भाकपा (माओवादी) को जिस तरह से आंध्र प्रदेश में बड़े धक्के लगे और वहां से पीछे हटना पड़ा, वह किसी से छुपा नहीं है. यही नहीं, पश्चिम बंगाल में लालगढ़ में कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी के अर्द्धसैनिक बलों के हाथों मारे जाने और पूरे आंदोलन को धक्के की घटना भी बहुत पुरानी नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय राज्य न तो सैन्य रूप से और न ही राजनीतिक रूप से इतना कमजोर हैं कि उसे देश के एक छोटे से इलाके में गुरिल्ला टुकडियों और ‘मुक्त क्षेत्र’ की ताकत के बल पर परास्त किया जा सके.

सच पूछिए तो कांग्रेस नेताओं पर इस तरह से हमला और उनकी हत्या करके भाकपा (माओवादी) खुद ही शासक वर्गों के ट्रैप में फंस गई है जो माओवादी आंदोलन को कुचलने के लिए और अधिक सैन्य ताकत के इस्तेमाल का बहाना तलाश रहा था. इस तरह उसने खुद ही सैन्य दमन को आमंत्रित किया है और शासक वर्ग की पार्टियों को एकजुट कर दिया है. यह अराजक सैन्य दुस्साहसवाद उसे बहुत भारी पड़ सकता है. साफ़ है कि माओवादी राजनीति हिंसा-प्रतिहिंसा की एक अंधी गली में फंस गई है. उसकी राजनीति पर बंदूक के हावी होने और राजनीति के पीछे चले जाने के कारण पार्टी कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर पा रही है.

यहाँ तक कि कई क्षेत्रों और इलाकों में भाकपा (माओवादी) के राजनीतिक नेतृत्व का अपनी सशस्त्र गुरिल्ला टुकडियों पर नियंत्रण नहीं रह गया है. इस तरह के कई हथियारबंद दस्ते न सिर्फ वसूली दस्ते में पतित हो गए हैं बल्कि कुछ एक-दूसरे का ही खून बहाने पर उतर आए हैं. झारखण्ड में कुछ दस्ते तो पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के एजेंट बन गए हैं. लेकिन इसमें हैरानी की बात नहीं है. बंदूक पर अति निर्भरता के कारण ऐसा कई और आन्दोलनों के साथ पहले भी हो चुका है.

पिछले कुछ महीनों में खुद भाकपा (माओवादी) के अंदर से जिस तरह की बहसें (जैसे उडीसा में राज्य सचिव सब्यसाची पांडा के विद्रोह) सामने आईं हैं, उससे साफ़ है कि माओवादी राजनीति के अंतर्विरोध बढ़ते जा रहे हैं. अफसोस यह है कि इसपर पुनर्विचार करने के बजाय इसे सुकमा हमले जैसी धमाकेदार सैन्य कार्रवाइयों से ढंकने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इससे अंतत: रैडिकल बदलाव की राजनीति का ही नुकसान हो रहा है.

लेखक आनंद प्रधान आईआईएमसी में प्रोफेसर हैं. उनका यह लेख 'राष्ट्रीय सहारा' में प्रकाशित हो चुका है.

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