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बनारस

मेरे शहर के एक कोने में भी बसता है यूथोपिया और कालाहांडी!

यूथोपिया के अकाल के बारे में बचपन में बहुत सुना था। आकाल पीड़ित एक बच्चें की तस्वीर देखी तो, स्कूल में बाइलोजी का सबक पढ़ाने वाले मास्टर साहब की बाते शत-प्रतिशत सही लगी कि इंसान के शरीर में 206 हड्डियां होती हैं। कालाहांडी के भुखमरी के बारे में पढ़ा, सुना वहां गरीबी, भुखमरी के चलते लोग अपने बच्चे बेच देते हैं।

यूथोपिया के अकाल के बारे में बचपन में बहुत सुना था। आकाल पीड़ित एक बच्चें की तस्वीर देखी तो, स्कूल में बाइलोजी का सबक पढ़ाने वाले मास्टर साहब की बाते शत-प्रतिशत सही लगी कि इंसान के शरीर में 206 हड्डियां होती हैं। कालाहांडी के भुखमरी के बारे में पढ़ा, सुना वहां गरीबी, भुखमरी के चलते लोग अपने बच्चे बेच देते हैं।

जानकर हैरत हुई थी कि क्या हम वाकई सभ्य समाज के दायरे में आते हैं? साथ ही ये लगता था मानव सभ्यता कि किस मंजिल पर आकर खड़े हुए हैं हम। झूठ, छल, प्रवंचनाओं के दायरे में आकंठ डूबी हुई सत्ताएं मानव संवेदनाओं को कभी नहीं समझ पाएंगी। लेकिन बजरडीहा और लोहता को तो अपने आंख से देख रहा हूं महसूस कर रहा हूं। हम ही अपरचित रह जाते हैं लेकिन हर शहर का एक कोना जरूर यूथोपिया और कालाहांडी होता होगा।

बजरडीहा, लोहता शहर बनारस का एक हिस्सा है। यूथोपिया या कालाहांडी की कतार में बजरडीहा और लोहता भी मुझे कहीं खड़ा नजर आता है। यहां आकर आप भुखमरी, गरीबी को चलते-फिरते देख सकते हैं। बजरडीहा में एक मां मौत की छुअन से बच निकली अपनी दो बेटियों के साथ पिछले दस दिनों तक धरना दिया था। वो बताना चाह रही थी कि देखिए तो सही मैं जीती-जागती तस्वीर हूं भुखमरी और बदहाली की। घर में कुछ नहीं था सो मेरे बच्चे मर गए। कई दिनों तक लगातार भूखे रहकर इस मां के दोनों बच्चे मौत का निवाला बन गए फिलहाल क्रबिस्तान इनका ठिकाना है। आप इनसे मिलना चाह ते है तो बजरडीहा के क्रबिस्तान में चले जाईए सिर्फ ये दोनों ही नहीं इन जैसे ब हुतेरे आपको यहां सोते मिलेंगे।

पिछले कई सालों से भूख, बीमारी और उसके बाद मौत ने कइयों को यहां पहुंचा दिया है। यहां के हालात नहीं बदले तो आगे भी ये क्रबिस्तान और भी लोगों के लिए आरमगाह साबित होगा। वैसे यहां किसी को किसी भी तरह की जरूरत नहीं है। यहां सिर्फ सोए रहना है जैसे हमारे दौर की ये सत्ताए सोयी पड़ी हैं।…. नाजिरा बेवा है पति अब्दुल खालिक भी गरिबी, बेकारी और भुखमरी से लड़ते मौत का निवाला बन चुके हैं। अपने दोनों बेटियों को जिन्दा रखने के लिए नाजिरा काम करना चाहती है? … काम एक यही तो नहीं मिलता है आजकल जिन्दा रहने के लिए जरूरत भर।

यही कई हफ्तों से रखी सूखी रोटी के टुकड़ों को पानी में भिगोकर अपने हलख से उतारने वाले हुस्न ए नूरजहां के बच्चे भी है। नूरजहां की झोली में कड़वी यादों के सिवाए कुछ और नहीं है। उसके आंसू कमबख्त बेवजह आंखों से छलक आते है। उसके बच्चों का भविष्‍य कहां खड़ा है? उसकी छोटी बेटी आठ साल की है। नाम नहीं लूंगा उसका शायद आप में किसी की बेटी के नाम से मिल जाए तो बुरा लगेगा आपको। आज वो जिस हाल में हैं कल उसका क्या होगा पता नहीं? मौत से बच गई तो जरूरतों की मण्डी में जवानी की दहलीज पर क्या होगा उसका? संभव है कल किसी चकलाघर में उसके हुस्न की बोली लगे… आते-जाते किसी महानगर के देह मण्डी के नुक्कड़ पर हमे वो दिख जाए तो आप-हम जैसे न जाने कितने मुहं फेर कर कह उठेंगे हूं… न जाने क्यों शराफत की जिदंगी से एलर्जी है इन जैसों को! क्या करें सूखी रोटी चबाती ये बच्ची और रोती इसकी मां?

और अब्दुल चाचा 75 की उम्र उसपर बेबा लड़की और उसके बच्चों का बोझ। … कभी बनारसी साड़ी बुनते थे। खुबसूरत साड़ियां लेकिन खुद उनकी आज की जिदंगी उतनी ही बदसूरत है आज… और ये जो लड़का आप देख रहे हैं काम पर जा रहा है। शब्बीर नाम है उम्र है 8 साल इसका स्कूल जाना छोड़ कर काम पर जाना इसलिए जरूरी है कि इसके अब्बा का इतंकाल हो गया है। मां, भाई-बहन घर पर है लेकिन नहीं है तो खाना  खाने की जुगाड़ में शब्बीर काम पर जाता है। …. एक शब्बीर क्या यहां आपको और भी शब्बीर मिलेंगे … देखना है तो चले आईए। … और ये है लोहता और ये है नरगिस। धरने पर बैठी है आजकल, इसका बच्चा कुपोषण से चल बसा है… यहा घर-घर कुपोषण है… घर-घर अभाव है….. शब्बीर, नूरजहां, नरगिस, अब्दुल चाचा इन सबके बीच आकर न जाने क्यों मुझे इसी शहर के कवि धूमिल की पंक्तिया थोड़ा सा संशोधन के साथ कहने का मन कर रहा है।  

ये लोकतंत्र का कौन सा नुस्खा है
कि जिस उम्र में यहां रह रही औरतों का चेहरा
झुरिर्यों का झोला बन गया है
उसी उम्र में मेरी पड़ोस में रहने वाली महिला के चेहरे पर
मेरी प्रेमिका के चेहरे सा लोच है।

पत्रकार भास्‍कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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