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छोटे शहरों में पत्रकारिता की हालत बयान करने वाली इस कविता का कोई मुकाबला नहीं

Sanjaya Kumar Singh : देश में पेशों की बात की जाए तो एक पेशा पत्रकारिता यानी जर्नलिज्म भी है। पत्रकार यानी वे लोग जो अखबार में खबरें लिखते, भेजते, शीर्षक लगाते, छापते और आगे बढ़ते हुए संपादक बन जाते हैं। देश में कई जगह जनसंचार के पाठ्यक्रम चलते हैं और कई विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढ़ाई होती है। कुछ मीडिया संस्थान भी पत्रकारिता की पढ़ाई कराते हैं पर डिग्री पाने के बाद कौन कहां जाता है, क्या करता है, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखते हैं।

Sanjaya Kumar Singh : देश में पेशों की बात की जाए तो एक पेशा पत्रकारिता यानी जर्नलिज्म भी है। पत्रकार यानी वे लोग जो अखबार में खबरें लिखते, भेजते, शीर्षक लगाते, छापते और आगे बढ़ते हुए संपादक बन जाते हैं। देश में कई जगह जनसंचार के पाठ्यक्रम चलते हैं और कई विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढ़ाई होती है। कुछ मीडिया संस्थान भी पत्रकारिता की पढ़ाई कराते हैं पर डिग्री पाने के बाद कौन कहां जाता है, क्या करता है, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखते हैं।

अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में भी पत्रकारिता को एक कैरियर बताया जाता है, विज्ञापन निकाल कर, आवेदन मांग कर उम्मीदवार फंसाए जाते हैं। हर कोई समझता है जिस काम के लिए हर शहर, गांव कस्बे में कई-कई रिपोर्टर की जरूरत है वह खराब या कमजोर कैसे हो सकता है। और मेरा तो जीवन मजे में निकल जाएगा। बड़े शहरों में पत्रकार आजकल पत्रकारिता की जगह क्या कर रहे हैं इसका अंदाजा आपको होगा पर छोटे शहरों में क्या हालत है इसका बयान करने वाली इस कविता का कोई मुकाबला नहीं है।

हम तो भैया 'कामकार' हैं।
लोग समझते पत्रकार हैं।।

ग्रामीण पत्रकारों का भोर, अख़बार संग में होता है।
खबर न छूटे कोई धोखे से, भयवश मन से सोता है।।
कोई न जाने क्या मिलता, पैसा मिलता या बेरोजगार हैं।
हम तो भैया 'कामकार' हैं। लोग समझते पत्रकार हैं।।

पास में आईकार्ड नहीं, खर्च नहीं कोई मिलता है।
जब भी इसकी मांग करो, अधिकारी सुन के बिगड़ता है।।
कोई साथ निभाता ना, पत्रकार कुछ चाटुकार हैं।।
हम तो भैया 'कामकार' हैं। लोग समझते पत्रकार हैं।।

दिखना मिलना और लिखना, खबर भेजना काम है।
सारा कुछ मैनेज करने में, लगता अपना दाम है।।
छोटों के लिए पत्थर दिलवाले, सम्पादक बड़कवा पत्रकार हैं।
हम तो भैया 'कामकार' हैं। लोग समझते पत्रकार हैं।।

खबर भेजनी की गारण्टी, छपवाना वश की बात नहीं।
वरिष्ठ लोग करते मनमानी, होते उनमे जज्बात नहीं।।
पत्रकारिता के कार्यक्रम, छपते नहीं कूड़ा कबार हैं।
हम तो भैया 'कामकार' हैं। लोग समझते पत्रकार हैं।।

'परदेशी' पत्रकारिता बिन, मन को आता चैन नहीं।
दिन कट जाये मुंह लटकाकर, रात को आये नींद नहीं।।
ग्रामीण पत्रकारों का शोषण, ना जाने कितने शिकार हैं ।।
हम तो भैया 'कामकार' हैं। लोग समझते पत्रकार हैं।।

सुधीर अवस्थी 'परदेशी'
ग्रामीण पत्रकार 'हिन्दुस्तान'
बघौली (हरदोई) उत्तर प्रदेश

    Shivnath Jha हम तो भैया 'कामकार' हैं। लोग समझते पत्रकार हैं………
 
    Shambhunath Shukla Sanjaya Kumar Singh: हम लोग तो इन्हें समझते रहे हैं। कितनी दफे कितनों की मदद की है। याद है। तब तुम और संजय कहते थे शंभूजी अमुक स्ट्रिंगर किराए का पैसा आपसे लेकर गया है लेकिन आया तो वह कार से था। और आप उधार मंाग-मांग कर उसे उधार बांट रहे हैं जो कभी वापस नहीं आएगा।
 
    Sanjaya Kumar Singh हां, एक भाई साब पैसे ले गए थे, वीसी हो गए पर पैसे नहीं लौटाए। लेकिन ज्यादातर निहायत गरीब और मजबूर होते थे। अपवाद तो हर जगह हैं।
 
    Harpal Singh Thapar ryt sanjay ji apvaad sab jagah hain. main kai aese patrakaaron ko jaanta hun jo gramin kshetron me rahte hain aur patrakarita karte hain. ye kavita sach me unki dasha ko chitrit karti hai. mere khayal se jamshedpur jaise chote shahron me b haalaat aese hi hain.
   
    Mukesh Kumar Jo dusron ke shoshan ko ujagar karta ho, uske swayam ke shoshan ki khabar kaun chhapega?
    
    Sanjaya Kumar Singh मुकेश जी, समस्या यह है कि शोषण वही करता है जो खबरें छापता और खबरें छापने वाले चोर-चोर मौसेरे भाई की तरह एक दूसरे के खिलाफ कुछ नहीं छापते।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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