बी.पी. गौतम : ब्रांडिंग के दौर में कर्म का कोई महत्व नहीं रहता। धर्मेन्द्र बड़े अभिनेता थे और उनकी वजह से अमिताभ को शोले में सहायक भूमिका मिली, लेकिन धर्मेन्द्र ने कभी खुद की ब्रांडिंग नहीं की, इसलिए उन्हें वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हकदार हैं, पर ब्रांडिंग करने वाले अमिताभ शताब्दी के महानायक हैं। अभिनेत्रियों के पास चरित्र के नाम पर च भी नहीं होता, लेकिन ब्रांडिंग के चलते इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता और सब सती की तरह पूजते दिखते हैं।
पत्रकारिता में भी ऐसा ही हाल है। खबर की तो बात ही छोड़िए हिन्दी तक न लिख पाने वाला एक चापलूस पत्नी को अफसरों और नेताओं के आगे परोस कर खुद की ब्रांडिंग इस तरह करा रहा है कि लोग उसे वरिष्ठ पत्रकार कहने लगे हैं। पूरे दिन आईएएस और आईपीएस की दलाली कर के सरकारी धन को विभिन्न माध्यमों से डकार रहा है, लेकिन कोई उस पर अंगुली नहीं उठा सकता, क्योंकि सब से पहले वह सामने वाले को अपने जैसा बना लेता है। हकीकत सब जानते हैं, पर चाह कर भी कुछ कह नहीं सकते।
मन में आता है कि उसका चालीसा लिख दूँ, लेकिन उसका तो कुछ नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर सब जानते ही हैं, पर कई और चेहरा दिखाने लायक नहीं बचेंगे। … वैसे जिस समाज में खुद की समझ ही न बची हो, जो औरों के दिखाये को ही देखता हो, उस समाज से कुछ कहना और न्याय की आशा करना सही नहीं हो सकता। … निम्नता के अंतिम पायदान पर पहुँच चुकी सामाजिक सोच के दौर में आत्म हत्या करने वाले को मैं साहसी मानता हूँ, बेशर्म कभी नहीं मर सकते, चोर तो खुद की ब्रांडिंग कर शाह से ऊंची पदवी पा ले रहे हैं आज कल।
पत्रकार बीपी गौतम के एफबी वॉल से साभार.






