हिमाचल में मंडी संसदीय क्षेत्र से सांसद के रूप में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट के लिए उपचुनाव के लिए 23 जून को मतदान व नतीजा 27 जून को मतगणना के पश्चात घोषित करने की चुनाव आयोग द्वारा अधिघोषणा जारी होते ही प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियों में एकाएक तेजी सी आ गई है. मंडी संसदीय क्षेत्र में इस बार लगभग 11 लाख 23 हजार 210 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर मात्र कुछ माह के लिए ही अपने प्रतिनिधि का चुनाव करेंगे.
विगत वर्ष 20 दिसंबर को घोषित हुये हिमाचल विधानसभा के चुनावों के नतीजों में कांग्रेस की विजय और वीरभद्र सिंह की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद ही यह स्पष्ट हो गया था कि हिमाचल के मंडी लोकसभा क्षेत्र जहाँ से वीरभद्र सिंह अभी तक सांसद रहे थे, त्यागपत्र दे देंगे और रिक्त हुये इस संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव होना तय है. 2014 के लोकसभा के आम चुनावों से पूर्व कुछ माह के कार्यकाल के लिए ही सही, इस उपचुनाव में कांग्रेस की ओर से संभावित प्रत्याशी के चयन में जहाँ कुछ उठापटक के कयास लगाये जा रहे थे, वहीँ यह भी लगभग तय ही था अंततः वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह, जो पूर्व में भी इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, को ही कांग्रेस पार्टी अपना प्रत्याशी बनायेगी और हुआ भी यही. दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस उपचुनाव में कौन प्रत्याशी होगा इस पर अंत तक असमंजस की स्थिति ही बनी रही और अंततः पूर्व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष व सिराज से वर्तमान विधायक जयराम ठाकुर को ही प्रत्याशी बना उपचुनाव में उतारा गया.
भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल को बदली हुई वर्तमान परिस्थिति में छह जिलों और 17 विधानसभा क्षेत्रों में फैले इस संसदीय क्षेत्र के लिए ऐसा प्रत्याशी ढूँढना जो सत्ता में बैठी कांग्रेस के उम्मीदवार को टक्कर दे सके बहुत कठिन कार्य था. वह भी ऐसी परिस्थिति में जब मुकाबला प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार कांग्रेस के किसी साधारण नेता से ना होकर मुख्यमंत्री की पत्नी व इसी क्षेत्र की पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह से होना निश्चित हो. छह जिलों और 17 विधानसभाई क्षेत्रों में फैले मंडी लोकसभा चुनाव क्षेत्र के 10 विधानसभा क्षेत्रों पर इस समय कांग्रेस, छह पर भाजपा और एक पर हिलोपा के महेश्वर सिंह का कब्ज़ा है. पूर्व में तो इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भाजपा के पूर्व सांसद और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष कुल्लू के महेश्वरसिंह 3 बार कर चुके हैं. परन्तु प्रो० प्रेमकुमार धूमल के पिछले मुख्यामंत्रित्व काल में सत्ता और संगठन में अनदेखी के चलते उन्होंने भाजपा का त्याग करते हुये हिलोपा का गठन किया और विगत ४ नवंबर को संपन्न हुये विधानसभा के चुनावों में अपने दल के प्रत्याशी उतारकर भाजपा के मिशन रिपीट को डिफीट में बदलने में अहम भूमिका भी निभाई.
नवंबर 2012 में संपन्न हुये हिमाचल विधानसभा के चुनावों में भी यह स्पष्ट हो गया था कि राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों का हिमाचल के चुनावों पर कोई असर नहीं होनेवाला. देवभूमि हिमाचल के अधिकतर मतदाता कांग्रेस और भाजपा में बंटे हुये हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने-अपने दल के पक्ष में ही मतदान करते हैं. शेष रह गए निर्णायक भूमिका निभानेवाले तटस्थ मतदाताओं के विभिन्न कारणों से इधर-उधर जाने से ही सरकार बनती और बदलती हैं. 2014 के आम चुनावों से पूर्व मात्र कुछ माह के लिए ही होनेवाले इस उपचुनाव में सतही तौर पर कांग्रेस के लिए संतोष की बात यह है कि प्रदेश में उसकी सरकार के विरुद्ध कोई भी नकारात्मक फैक्टर काम नहीं कर रहा है. हाँ, अपने बलबूते पर चुनावों से पूर्व प्रदेश के संगठन की कमान और प्रदेश की सत्ता पर छठी बार काबिज होनेवाले वीरभद्र सिंह के लिए व्यक्तिगत रूप से यह उपचुनाव अवश्य ही प्रतिष्ठा और भविष्य की इबारत लिखने वाला साबित होगा. पांच बार इसी मंडी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके वर्तमान मुख्यमंत्री कांग्रेस के वीरभद्र सिंह को सर्वप्रथम 1977 में जनतापार्टी के प्रत्याशी गंगासिंह ने पराजित किया था और अंतिम बार 2009 में प्रदेश में भाजपा की सरकार के दौरान वीरभद्र सिंह मात्र 13997 मतों से ही विजय प्राप्त कर लोकसभा में पहुंचने में सफल हो सके थे.
वीरभद्र सिंह जैसे मॉसलीडर की विजय में 17 विधानसभा क्षेत्रों वाले इस संसदीय क्षेत्र में मतों का यह अंतर शून्य समान था. इतनी लीड तो केवल दो विधानसभा के क्षेत्रों में ही सरलता से बराबर हो जाया करती है. मात्र 13900 मतों का अंतर अवश्य ही वीरभद्र सिंह के लिए खतरे की घंटी था. मतों का इतना सूक्ष्म अंतर वीरभद्रसिंह आज भी भूले नहीं होंगे. परन्तु आज परिस्थिति बदल चुकी है और प्रदेश की सत्ता की कमान उनके हाथ है. पूर्व सांसद कुल्लू के महेश्वर सिंह का विधानसभा के चुनावों से पूर्व ही भाजपा से अलविदा कह हिलोपा का गठन, वरिष्ठ विधायक और मंत्री रहे सुंदरनगर के रूपसिंह का टिकट कटने से नाराजगी के साथ-साथ अनेक पुराने और कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी आदि अनेक कारण हैं, जिसका लाभ कांग्रेस को प्रत्यक्ष रूप से इस उपचुनाव में मिलने की पूरी सम्भावना है. पिछले विधानसभा चुनाव में महेश्वर सिंह और रूपसिंह के स्वयं चुनाव में उतरने के कारण भाजपा को प्रत्यक्ष रूप में तो अवश्य ही हानि हुई थी और कांग्रेस को अप्रत्यक्ष लाभ. लेकिन इस उपचुनाव में कांग्रेस को इस फैक्टर का प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा क्यूंकि महेश्वर सिंह और रूपसिंह (पूर्व भाजपा नेता) के उम्मीदवार ना होने के कारण उनके समर्थकों के वोट अब कांग्रेस के पक्ष में जाने की प्रबल सम्भावना है. और फिर सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार कांग्रेस सत्ता में है और उन सभी दस विधानसभा क्षेत्रों से जहाँ उसके विधायक हैं, विधानसभा चुनावों से भी अधिक मतदान कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में करवाने का प्रयास किया जायेगा.
वहीँ दूसरी ओर सत्ता के संघर्ष में पराजित हुई भाजपा अभी तक सत्ता जाने के दुःख से ही उभर नहीं पाई है. विधानसभा चुनावों तक चलते रहे पार्टी की अंतर्कलह और अंतर्द्वंद्व में उलझी रही प्रदेश भाजपा आज तक उन कारणों को समझ उसके निराकरण के कारगर उपाय करने में अक्षम रही है. ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्त्ता आज भी असमंजस और उहापोह की स्थिति में हैं. सत्ता में रहते हुये भी जो दल इस संसदीय क्षेत्र की छह सीटों पर सिमट कर रह गया हो वह सत्तारूढ़ दल कांग्रेस का इस उपचुनाव में किसके बूते पर मुकाबला करेगा यह समझ से परे है. महेश्वर सिंह जैसे कद्दावर नेता के भाजपा से जाने के बाद इस लोकसभा क्षेत्र में पैदा हुई शून्यता को भरने के लिए भाजपा के पास नेता नहीं है जो कांग्रेस का मुकाबला करने में सक्षम हो. हाँ, यदि विपक्षी दल भाजपा ने जनवरी माह में ही अपना प्रत्याशी तय करके उसे दल-बल के साथ प्रचार में उतारा होता तो आज परिस्थिति कांग्रेस के लिए इतनी सरल ना होती.
एक बात तो हमें समझ लेनी चाहिए कि लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए लड़े जाते हैं ना कि कोई रस्म अदा करने के लिए. वर्तमान दौर में चुनाव लड़ना और विजय प्राप्त करना बहुत ही कठिन कार्य हो गया है. उत्तर प्रदेश का उदाहरण हमारे समक्ष है जहाँ सपा और बसपा ने 2014 को होनेवाले आम चुनावों के लिए के अपने उम्मीदवारों के चयन और नामों की घोषणा करने का कार्य अभी से शुरू कर दिया है. बड़े-बड़े नेताओं को धराशाही करनेवाला यह मंडी संसदीय क्षेत्र लगभग छह जिलों और 17 विधानसभा क्षेत्रों में फैला हुआ हिमाचल का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र है. ऐसे में किसी नए प्रत्याशी के लिए मात्र 21 या 22 दिनों में दूरदराज व दुर्गम क्षेत्रों तक व्यक्तिगत रूप से जाना और प्रचार करना बहुत ही कठिन कार्य है. पूर्व सांसद और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे कुल्लू के महेश्वर सिंह और सुन्दरनगर से भाजपा के पूर्व मंत्री रूपसिंह द्वारा भाजपा से अलग अपनी राह चुनने का खामियाजा भाजपा विगत विधानसभा के चुनावों में भुगत चुकी है, जब उसके मिशन रिपीट को ऐसे ही नेताओं के विद्रोह के कारण डिफीट में बदल दिया गया था.
देश की राजनीतिक परिस्थिति के सर्वे चाहे जो भी हों, हिमाचल की राजनीतिक परिस्थिति की बयार अभी भी कांग्रेस के पक्ष या यूँ कहिये कि वीरभद्रसिंह के पक्ष में ही बहती दिखाई देती है. छह जिलों में बंटी मंडी संसदीय क्षेत्र में मंडी जिला के ९ विधानसभा क्षेत्र, कुल्लू जिले के ४ तथा शिमला, किन्नौर, लाहौल स्पीति और चंबा का एक-एक विधानसभा क्षेत्र आता है. २००९ में इस संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी वीरभद्र सिंह ने जहाँ 340973 मत प्राप्त करते हुये अपने निकटतम उम्मीदवार भाजपा के महेश्वर सिंह से 13997 मतों की बढ़त लेकर विजय प्राप्त की थी, वहीँ नवंबर 2012 को संपन्न हुये विधानसभा के चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा को पराजित करते हुये कांग्रेस ने अपनी विजय पताका फहराते हुये वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्रित्व में सरकार का गठन किया. यदि मंडी संसदीय क्षेत्र में पड़नेवाले 17 विधानसभा क्षेत्रों के नतीजों को देखें तो कांग्रेस के पक्ष में 10, भाजपा को छह और महेश्वर सिंह की हिलोपा को १ सीट मिली थी. चुनावी मैदान में हिलोपा और रूप सिंह के उतरने से भाजपा के तमाम समीकरण बिगड़ गए थे और मतों में हुये बंटवारे से भाजपा को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा था.
महेश्वर सिंह की हिलोपा का लोकसभा के इस उपचुनाव में ना उतरने से हिलोपा फैक्टर का जहाँ भाजपा के प्रति विरोध के चलते चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुँचाने की आशंका के साथ-साथ मतदान में कांग्रेस को लाभ मिलने की सम्भावना को नाकारा नहीं जा सकता. दावों और प्रतिदावों के दौर में कांग्रेस हलकों में तो प्रतिभा सिंह को अभी से एक बड़े अंतर से विजयी बताया जा रहा है. कांग्रेस और भाजपा के नेताओं को इतना तो समझ लेना चाहिए कि नामांकन पत्र दाखिल करते समय या रैली में एकत्रित भीड़ से प्रत्याशियों की हारजीत सुनिश्चित नहीं की सकती. विजय सुनिश्चित होती है कर्मठ कार्यकर्ताओं के अनथक प्रयासों से जिसके चलते मतदान केन्द्रों के बाहर लगी लंबी कतारों को स्वपक्षीय मतों में तब्दील करना संभव होता है. पांच माह पूर्व बनी कांग्रेस की सरकार के कारण जहाँ उसके कार्यकर्ताओं का जोश स्पष्ट दिखाई देता है वहीँ सत्ताच्युक्त भाजपा के कार्यकर्ताओं में अभी भी जोश के बनिस्पत रोष अधिक दिखाई देता है. ऐसे में अनमने ढंग से चुनावी दंगल में उतरी भाजपा के प्रत्याशी की विजय कैसे संभव होगी यह तो वही जाने. वीरभद्रसिंह की प्रतिष्ठा का प्रश्न बने इस उपचुनाव का परिस्थितिजन्य निष्पक्ष आंकलन करते हुये जहाँ कांग्रेस की प्रतिभासिंह की विजय तो लगभग निश्चित ही है वहीँ यदि यह कहा जाए कि 2004 में लगभग 66 हजार मतों से विजयी होनेवाली कांग्रेस की प्रत्याशी प्रतिभासिंह अपने पिछले आंकड़ों को यदि पार कर लें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.
लेखक विनायक शर्मा हिमाचाल में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.





