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सुख-दुख...

पत्रकार भाइयों अपनी सेवा शुल्‍क की दरें तय कर लो, पुलिस चौकी के सौ, थाने के दो सौ…!

भाई लोगों आपका सामना रोजाना ऐसे लोगों से होता है जो किसी न किसी पहचान के जरिये आपके पास अपने काम के लिए आते हैं. ये वो लोग है जिन्हें आपके रोजमर्रा के काम से वास्ता नहीं होता. किसी की सिफारिश पर आते हैं. कोई थाने से बाइक का चलान होने पर आता है तो कोई किसी विभाग से लाइसेंस बनवाने के लिए आपसे पहचान बढ़ाता है, कोई तबादले के लिए आपका सिर खाता है तो कोई थाने में समझौते के लिए आपका साथ चाहता है. ऐसे कई मामले हैं जिनमें लोग आपकी मदद के लिए ताना बाना बुनते हैं. ये वो लोग है जो कि काम होने के बाद ऐसे गायब होते हैं, जैसे गधे के सिर से सींग.

भाई लोगों आपका सामना रोजाना ऐसे लोगों से होता है जो किसी न किसी पहचान के जरिये आपके पास अपने काम के लिए आते हैं. ये वो लोग है जिन्हें आपके रोजमर्रा के काम से वास्ता नहीं होता. किसी की सिफारिश पर आते हैं. कोई थाने से बाइक का चलान होने पर आता है तो कोई किसी विभाग से लाइसेंस बनवाने के लिए आपसे पहचान बढ़ाता है, कोई तबादले के लिए आपका सिर खाता है तो कोई थाने में समझौते के लिए आपका साथ चाहता है. ऐसे कई मामले हैं जिनमें लोग आपकी मदद के लिए ताना बाना बुनते हैं. ये वो लोग है जो कि काम होने के बाद ऐसे गायब होते हैं, जैसे गधे के सिर से सींग.

दोस्तों, हमारी नसीहत ये है कि ऐसी हस्तियों के लिए आप अपनी जन सेवा के लिए अपना सेवा शुल्क निर्धारित करें. विद्युत मीडिया चैनल/अख़बार मालिक इतना पैसा नहीं देते जिससे आप अपने घर का खर्च चला सकें. अनुभव ये भी कहता है कि जिसका काम हो जाता है वो धन्यवाद कहने भी नहीं आता. जब वकील और अन्यजन अपने काम की फीस ले सकते हैं तो आप क्यूँ नहीं सेवा के बदले शुल्क लेते. क्या आपका वक़्त और काम करने में खर्चा नहीं होता? वैसे ही आप क्या कम बदनाम हो, चैनल या डेस्क पर बैठा आपका वरिष्ठ भी आपको अच्छी नजरों से नहीं देखता. ऐसे में क्या करोगे? रोटी भी तो खानी है.

आपके घर कार्यालय में ऐसी सूची जरूर टंगी हो जो कि काम के बदले सेवा शुल्क की दरें दर्शा रही हो. जैसे….

पुलिस चौकी सेवा शुल्क एक सौ रुपए

थाना, कोतवाली सेवा शुल्क दो सौ रुपये

तहसील सेवा शुल्क तीन सौ रुपए

परगना व अन्य प्रशासनिक सेवा शुल्क तीन सौ रुपए

जिलाधिकारी कार्यालय सेवा शुल्क पांच सौ रुपये

बाकी काम के ऊपर भी निर्भर है कि आप कैसे और कितना सेवा शुल्क निर्धारित करेंगे.  जैसे सचिवालय का काम है, कमिश्नरी का काम है. तीन चार चक्कर में होता है. छोटा मोटा काम के बदले अपना फ़ोन रिचार्ज जरूर करवाएं ताकि उसे अहसास हो कि फ्री में काम नहीं होता. मेरा दावा है जिसका आपने सेवा शुल्क लेकर काम किया है वो जिन्दगी  भर नहीं भूलेगा. नहीं तो ऐसे लोगों से जब जब आपका काम पड़ेगा आपको याद करवाना होगा कि हमने तेरा भी तो काम किया था. एहसान फरामोश लोग आपको. तब भी घास नहीं डालेंगे.

इसमें शर्म की कोई बात नहीं. बड़े शहरों में बैठे आपके तमाम वरिष्ठ साथी भी यही कुछ कर रहे हैं. चैनल मालिक, अख़बार मालिक भी यही कर रहे हैं. कोई सरकार से विज्ञापन लेने के लिए सेवा शुल्क तय कर रहा है तो कोई टेंडर लेने के लिए, कोई किसी की छवि बनाने का शुल्क ले  रहा है, तो कोई किसी की छवि गिराने का सौदा कर रहा है. दोस्तों ईमानदारी दिखावे की बातें रह गयी है. लाबिंग की दुनिया है. ईमानदार पत्रकार दुर्लभ प्रजाति के हो गए हैं. और ऐसे दुर्लभ जीव कहीं सेट नहीं हो पाते, जो सेटिंग कर ले राजस्व जुटा लेने का दंभ भर दे वो ही सबसे सफल संपादक या चैनल हेड. आप अपने शहर के शहंशाह हो क्यूंकि आपके पास ब्रांड अख़बार है या दिखने वाला चैनल है तो सबसे पहले जुगाड़ करके प्लाट लीजिये, फिर उसपर मकान लगाने के लिए नेताओं, भू माफियाओं से संपर्क में रहिये, नहीं तो आप ईमानदारी की तनख्वाह पर जिंदगी भर किराये के मकान में सड़ते रहेंगे और आपके बच्चे आपको कोसते रहेंगे. भगवन करें कि चुनाव बार बार आये ताकि आपके लिए कोई जुगाड़ बन सके.

भगवान न करें कि आपके घर कोई बीमार पड़ जाये, लिख लो इलाज में नानी याद आ जायेगी. सरकार से मदद लेने में तेल निकल जायेगा. कड़वा लिख रहा हूँ लेकिन दिल में हाथ रख कर, अपने अनुभव के आधार पर पूरी ईमानदारी से दर्ज कर रहा हूँ. ये भूल में मत रहना कि कोई नेता या अधिकारी आपका दोस्त है वो सिर्फ तब तक आपके साथ है, जब तक आप उसके साथ हैं या आपसे उसका काम चल रहा है. आप लीक से हटे नहीं कि फिर देखो कैसे पीठ फेर लेते हैं. उसकी आपको पिलाई चाय में भी स्वार्थ है. और हाँ यदि आप दमदारी भरी पत्रकारिता कर रहे हैं तो ये काबू में हैं और आजकल बड़े नेता तो सीधे संपादकों से सेटिंग कर लेते हैं और फिर बाद में आपको भी पहाड़े पढ़ाने लगते हैं. हो सकता है आप में से कुछ मेरी बात से सहमत होंगे तो कुछ नहीं भी होंगे. सच लिखने में कोई गुनाह नहीं है. कभी हमारी बात सही लगे तो याद कर लेना.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

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