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माओवादियों की करतूत ने सिद्धांतों पर उठाए गई सवाल

छत्तीसगढ़ के जिरम घाटी से गुजरते हुए कांग्रेस पार्टी के काफिले पर 25 मई को हुए माओवादी हमले ने माओवादियों के सिद्धांतों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यूं तो माओवादी महिलाओं, बच्चों और आम आदमी पर हमले नहीं करने का दावा करते हैं। लेकिन, इस हमले में 30 लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर बेगुनाह थे। इतना ही नहीं सरेंडर कर अपनी जान की भीख मांग रहे नंदकुमार पटेल उनके बेटे दिनेश पटेल और महेन्द्र कर्मा को माओवादियों ने जिस तरह बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया, वह अपने आप में युद्ध अपराध और मानवाधिकार का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है।

छत्तीसगढ़ के जिरम घाटी से गुजरते हुए कांग्रेस पार्टी के काफिले पर 25 मई को हुए माओवादी हमले ने माओवादियों के सिद्धांतों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यूं तो माओवादी महिलाओं, बच्चों और आम आदमी पर हमले नहीं करने का दावा करते हैं। लेकिन, इस हमले में 30 लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर बेगुनाह थे। इतना ही नहीं सरेंडर कर अपनी जान की भीख मांग रहे नंदकुमार पटेल उनके बेटे दिनेश पटेल और महेन्द्र कर्मा को माओवादियों ने जिस तरह बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया, वह अपने आप में युद्ध अपराध और मानवाधिकार का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है।

यही वजह है कि अब तक सभ्य समाज के जो लोग माओवादी विचारधारा के प्रति थोड़ी बहुत सहानुभुति रखते थे। वह भी इस घटना के बाद माओवदियों की निंदा करते नजर आ रहे हैं। जनसमर्थन घटने के डर से घबराए माओवादियों ने जिरम घाटी हमले में मारे गए बेगुनाह लोगों की मौत पर जगह-जगह बैनर और पोस्टर लगाकर माफी मांग रहे हैं। इसके साथ ही भविष्य में ऐसी दुर्घटना से बचने की कोशिश करने का वादा भी कर रहे हैं। लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि क्या माओवादियों के माफी मात्र से हमले में मारे गए लोगों के शोकसंतप्त परिवार के जख्मों पर मरहम लगाया जा सकता है? अगर माओवादी इस घृणित हमले के लिए दोषी अपने कमांडर को जनअदालत में पेश कर सजा देते तो ये सही मायने में पश्चाताप माना जाता। लेकिन, बर्बर हमले के लिए कुख्यात माओवदियों से ऐसी कोई उम्मीद करना भी बेईमानी ही होगी।

दरअसल माओवादी वर्तमान व्यवस्था को सामंती और शोषणवादी मानते हुए इसे बदलने के लिए युद्ध का ऐलान किए हुए है। माओवादियों का आदर्श चीन के पितामह माओत्सेतुंग का वह कथन है, ‘जब आप सत्ता में आएं तो आपका हाथ सामंतियों के खून से रंगा होना चाहिए।' माओवादी अपने आदर्श माओ के इस कथन को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर लड़ाकों की भर्ती भी कर रखी है। और
आए दिन पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र या आंध्र प्रदेश में हिंसक घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। माओवादियों ने धुरविरोधी नेताओं की हिट लिस्ट भी तैयार कर रखी है। गाहे-बगाहे उन पर हमले भी करते रहते हैं। माओवादियों की इस लड़ाई में हजारों लोग अभी तक अपनी जान गंवा चुके हैं। जब युद्ध जारी हो तो लोगों का मरना तो तय है।

लेकिन, महेन्द्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल को जिस तरह सरेंडर करने के बाद तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतारा गया, वह इनकी मौत को बाकी के मौतों से अलग कर देती है। यह युद्ध अपराध की श्रेणी का कृत है। दुनिया का कोई भी कानून युद्धबंदियों को टॉर्चर करने और फिर मौत के घाट उतारने की इजाजत नहीं देता है। शत्रु देश की सेना भी दूसरे देश की सेना के सरेंडर करने के बाद युद्धबंदियों को गोली नहीं मारती हैं। लेकिन, माओवादियों ने न सिर्फ सरेंडर किए हुए लोगों को मौत के घाट उतार दिया, बल्कि अपने घृणित कृत को जायज ठहराने के लिए छह पन्नों की प्रेस विज्ञप्ति जारी कर एक-एक नेता को मारने की वजहें भी गिनाई। और बताया कि महेन्द्र कर्मा आदिवासियों के शोषक थे। उन्होंने सलवाजुड़ूम की स्थापना की, जिसके चलते हजारों लोगों की मौतें हुई। सैकड़ों महिलाओं और युवतियों के साथ बलात्कार हुआ। वहीं, पटेल की मौत के पीछे का कारण गिनाते हुए माओवादियों ने बताया कि संयुक्त मध्य प्रदेश में पटेल के गृह मंत्री रहते ही सर्वप्रथम अर्द्धसैनिक बलों को जंगल में उतारा गया। इसी लिए नंदकुमार पटेल की हत्या की गई।

लेकिन, ऐसा करते वक्त माओवादी यह भूल गए कि वह सरेंडर कर चुके व्यक्तियों के साथ जो कर रहे हैं, वह मानवाधिकार का खुल्लम-खलुल्ला उल्लंघन है। माना कि माओवादियों की न तो संगठित सरकार है और न ही न्यायालय है, जहां मुकदमा चलाकर इन बंदियों को सजा दी जाती। लेकिन, कम से कम माओवादी अपने तरीके से जनअदालत लगाकर तो सजा सुना ही सकते थे। लेकिन, माओवादियों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और पटेल, उनके पुत्र और महेन्द्र कर्मा को सरेंडर करने के बाद क्रूरता से हत्या कर दी। इससे ऐसा लगता है कि माओवादियों के पास न तो कोई सिद्धांत है और न ही नियम। माना कि माओवादियों की आस्था भारतीय संविधान में नहीं है। लेकिन, कम से कम संयुक्त राष्ट्र के जेनेवा कंवेक्शन का तो पालन करना चाहिए, क्योंकि उनके आका चीन भी उसमें आस्था रखते हैं।

देश और दुनिया के सभी नियमों को ताक पर रखकर जिस तरह सरेंडर किए हुए व्यक्तियों की हत्याएं कि इससे तो यही लगता है कि माओवादी जंगल में रहने वाले डकैत के अलावा कुछ भी नहीं है। जो बस्तर में विद्यमान खनिज की लूट में अपना हिस्साभर चाहते हैं। न तो ये बस्तर के रहने वाले हैं और न ही इन्हें बस्तर के के लोगों के हितों से कोई सरोकार है। अगर ये
माओवादी बस्तर के होते तो भला बस्तर टाइगर के नाम से मशहूर महेन्द्र कर्मा को नहीं पहचानते? जैसा कि कर्मा की मौत के बाद माओवादियों द्वारा लोगों से कर्मा की पहचान कराने की पहल से पता चलता है कि हमलावर माओवादी उन्हें नहीं पहचानते थे। इसके अलावा माओवादी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और बीजापुर के जिला कांग्रेस अध्यक्ष अजय सिंह को भी नहीं पहचानते थे। पटेल आत्मविश्वास में अपना और अपने पुत्र का सही नाम बताकर माओवादियों के जाल में फंस गए।

जबकि, अजय सिंह झूठ बोलकर और अपने आपको ड्राइवर बताकर बचने में सफल रहे। जो दशार्ता है कि ये बस्तर का खजाना लूटने के लिए बाहर से आए हुए गुंडे हैं। जो बंदूक का भय दिखाकर भोले-भाले स्थानीय आदिवासियों को साथ देने के लिए मजबूर करते हैं और साथ नहीं देने पर सलवाजुड़ूम मुहिम बंद होने के बाद भी इस मुहिम से जुड़े होने का आरोप लगाकर मौत के घाट उतार देते हैं। इन सबके बावजूद माओवादी बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और छात्रों से समर्थन की उम्मीद रखते हैं। इस घटना के बाद माओवादियों को समर्थन मांगने से पहले यह भी बताना चाहिए कि आखिर उनका कौन सा सिद्धांत या विचारधारा है, जिसका समर्थन किया जाए? उनकी इस जंगली कानून में क्या खास है, जिसका कोई सभ्य समाज समर्थन करेगा?

लेखक मो. इफ्तेखार अहमद पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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