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उद्भ्रांत में दृष्टि की व्यापकता और दार्शनिक तत्व : प्रो. निर्मला जैन

नई दिल्ली। उद्भ्रांत की दृष्टि-व्यापकता तथा दार्शनिक तत्व को छूने की कोशिश अद्भुत है जो उनकी लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ में स्पष्ट परिलक्षित होती है। यह बात वरिष्ठ आलोचक तथा साहित्यकार प्रो. निर्मला जैन ने साहित्य अकादेमी के संगोष्ठी कक्ष में अमन प्रकाशन, कानपुर के तत्वावधान में, उद्भ्रांत की लम्बी कविताओं के संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, सागर-सी’ तथा उनके साहित्य-कर्म पर अन्य लेखकों, सम्पादकों की पुस्तकों के लोकार्पण समारोह के अवसर पर ‘उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कही।

नई दिल्ली। उद्भ्रांत की दृष्टि-व्यापकता तथा दार्शनिक तत्व को छूने की कोशिश अद्भुत है जो उनकी लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ में स्पष्ट परिलक्षित होती है। यह बात वरिष्ठ आलोचक तथा साहित्यकार प्रो. निर्मला जैन ने साहित्य अकादेमी के संगोष्ठी कक्ष में अमन प्रकाशन, कानपुर के तत्वावधान में, उद्भ्रांत की लम्बी कविताओं के संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, सागर-सी’ तथा उनके साहित्य-कर्म पर अन्य लेखकों, सम्पादकों की पुस्तकों के लोकार्पण समारोह के अवसर पर ‘उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कही।

उन्होंने कहा कि मिथक का मूल अर्थ वहीं से निकलता है जहाँ से उसका जन्म हुआ है और जब भी कोई कृतिकार उसे अपनी वैचारिक दृष्टि के साथ खींचकर नया गढ़ने की कोशिश करता है तब यदि वह मूल अर्थ की व्यंजना से जुड़ा रहता है तभी उसमें मिथकीय संवेदना बनी रहती है। उन्होंने कहा कि यद्यपि आज लम्बी कविताओं का दौर नहीं है, फिर भी ऐसी कविताएं विचारशून्य नहीं होती हैं। उन्होंने ऐसी रचनाओं के लिए ‘लिबर्टी’ और ‘विज़न’ की आवश्यकता पर बल दिया।

पिछले डेढ़ दशक से दिल्ली में स्थाई तौर पर रह रहे उद्भ्रांत की अनेक पुस्तकों के नियतिम अंतराल पर लोकार्पण होते रहे हैं तथा उनको केन्द्र में रखते हुए विचारोत्तेजक गोष्ठियाँ भी आयोजित हुईं, किन्तु उद्भ्रांत से सम्बंधित किसी भी गोष्ठी में पहली बार आयीं प्रो. जैन ने कहा कि निमंत्रण के बावजूद वे ऐसी गोष्ठियों में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं किन्तु यहाँ आकर उद्भ्रांत के रचना-परिमाण से परिचित होने के बाद हतप्रभ लगीं।

इसके पूर्व संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए डॉ. कर्णसिंह चौहान ने कहा कि ‘राधा-कृष्ण’ जैसे मिथकों पर लिखना उद्भ्रांत की प्राथमिकता रही है, किन्तु इसे सम्हालना उतना ही कठिन है क्योंकि विषय की प्रासंगिकता के लिए ‘रिजिडिटी’ अनिवार्य होती है, उसमें लचीलापन नहीं होता है। उन्होंने कहा कि राधाभाव एक अमूर्त विषय है जोकि पूर्ण समर्पण के भाव से संयुत है, जबकि उद्धव का प्रसंग राधाभाव का विखण्डन है। उन्होंने कहा कि चीरहरण का पक्ष लेकर उसे न्यायसंगत ठहराना बहुत ही मुश्किल है। उद्भ्रांत में यह क्षमता है कि वे कठिन से कठिन कार्य को सहजता से कर लेते हैं। वे गोपियों के स्नान प्रसंग के माध्यम से आधुनिक नैतिकता की बात को आगे बढ़कर स्पष्ट करते हैं। उन्होंने कहा कि आज खाप पंचायतों के ‘ड्रेसकोड’ को प्रमाणित करते हुए यह कविता वर्तमान संदर्भों से जुड़ती है। नारी स्वतंत्रता और प्रतिबंध पर कविता के माध्यम से नयी राय रखी गयी है। वस्तुतः उद्भ्रांत ने काव्य के जितने रूपों का प्रयोग किया है, समकालीन कवियों में कम ही लोगों ने किया है।

मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित डॉ. पी.एन. सिंह (गाजीपुर) ने संगोष्ठी में न आ सकने का दुख जताते हुए एक पत्र के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज की। उनके ई-मेल से प्राप्त पत्र को अखिलेश मिश्र ने पढ़ा। पत्र में डॉ. सिंह ने लिखा कि उद्भ्रांत जी ने अपने अन्दर और बाहर दोनों को साधा है, और ठीक से साधा है। इनकी कविताओं में विचार के साथ-साथ सौन्दर्य भी है। इन्हें मिथकों का कवि न मानकर विचारों का कवि मानना उचित होगा। मिथकों को लेते तो हैं, लेकिन उनका अतिक्रमण भी करते रहते हैं, और यह अतिक्रमण ही सामान्य कवियों से उन्हें ऊपर उठाता है। इस तरह उद्भ्रांत एक ऐसे कवि हैं जो स्पष्ट पर भी थोड़ी और अस्पष्टता की चादर ओढ़ा कर अपने कवि-विश्व का निर्माण करते हैं।

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि उद्भ्रांत का व्यक्तित्व आग्रही है, जिस कारण उनका वक्तव्य महत्त्वपूर्ण और मानवीय तत्वों से युक्त हो जाता है। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि भक्तिकाल में जो कुछ कहा गया, विशेषतः स्त्री चरित्रों को लेकर, उसका सेक्सुअलटी से क्या कोई रिश्ता है, इस पर विमर्श होना चाहिए। उद्भ्रांत के मिथकीय प्रसंग यथार्थवादी प्रतीत होते हैं। उनकी लम्बी कविताओं का ज़िक्र करते हुए डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि उनकी रचनाओं में मानवीय पक्ष बहुत ही सक्षम है जिससे वे अपने को इस स्थिति में लाकर खड़ा कर देते हैं, जहाँ से मूक भी व्यक्त होने लगता है।

वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि किसी पुराने आख्यान की सीमा होती है, आप उसे कहीं से कहीं नहीं ले जा सकते, किन्तु उद्भ्रांत जी प्रतीकों के माध्यम से उसे कहीं से कहीं लेकर जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि उद्भ्रांत जी सब कुछ कह लेना चाहते हैं। उनकी लम्बी कविताओं में ही आलोचना के सूत्र हैं। व्यापकता और गहराई भी। हालांकि उनकी लम्बी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविताओं में प्रबोधिनी नहीं है, कविता के ड्रामेटिक फार्म टकरा रहे हैं, विज़नरी और विज़न का महत्त्व नहीं रह गया है। उनकी ज़्यादातर लम्बी कविताओं में ‘फ़ार्म’ की व्याकुलता नहीं दिखती, अन्य कविताओं में मिलती है। उन्होंने कहा कि विस्तार से कविता की क्षति होती है और मार्मिक प्रसंग भी ढक जाते हैं, तथापि उनकी कविताओं में गतिशीलता है।

डॉ. भगवान सिंह ने संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मानक साहित्य में मिथकीय शब्द ‘राधा’ नहीं है, किन्तु बाद के साहित्य में आ जाता है। उन्होंने ‘राधा’ को ‘लक्ष्मी’ के साथ जोडते हुए कहा कि राधा के परिवर्तित स्वरूप में निर्लज्जता, चंचलता में परिवर्तित हो जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रतिध्वनि उत्पन्न करने वाली कविता को तैयार करने में एवं उसकी भाषा गढ़ने में बहुत अधिक श्रम लगता है लेकिन तभी कविता पाठकों तक पहुँचती है। इस दृष्टि से उद्भ्रांत संपूर्णता के कवि हैं।

इसके पूर्व संगोष्ठी में पधारे प्रबुद्धजनों की चर्चा में भागीदारी के लिए उद्भ्रांत ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि राधामाधव के संकेतित प्रसंगों में स्त्री-स्वातंत्र्य को शाश्वत मूल्यों से जोड़कर देखने की कोशिश है। उन्होंने आलोचकों से कवि के सामने उपस्थित चुनौती को समझने का आग्रह करते हुए कहा कि ऐसे कवि को अपना समय देखना होता है, उस समय को भी देखना होता है जिसके माध्यम से वह वर्तमान समय को देख रहा है तथा साथ में अपने आत्म के भीतर चलते द्वंद्व को भी। इन सभी के संयोग से ही ऐसी कृति संभव हो पाती है। प्रारंभ में उन्होंने लम्बी कविताओं के अपने लोकार्पित संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, सागर-सी गहरी’ की प्रारंभिक दो कविताओं ‘तोता’ और ‘कृति मेरी पुत्री है’ का पाठ किया।

संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे दूरदर्शन के महानिदेशक श्री त्रिपुरारि शरण ने चुटकी लेते हुए कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति की कसौटी यही है कि जिस विषय पर ज्ञान न हो, उस पर अधिक नहीं बोलना चाहिए। उन्होंने उद्भ्रांत के कवि-कर्म को रेखांकित करते हुए कहा कि जीवन दर्शन की जो सीमारेखा है, जटिलता के बावजूद वे अपनी बातों को प्रभावी ढंग से रख पाते हैं। यह उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

कार्यक्रम में जिन अन्य पुस्तकों का लोकार्पण हुआ वे इस प्रकार हैं–डॉ. कर्णसिंह चौहान द्वारा सम्पादित ‘राधामाधव’: राधाभाव और कृष्णत्व का नया विमर्श’, डॉ. लक्ष्मीकांत पाण्डेय द्वारा सम्पादित ‘रुद्रावतार और राम की शक्तिपूजा’, श्री अपूर्व जोशी द्वारा सम्पादित ‘अभिनव पाण्डव: महाभारत का युगीन विमर्श’, श्री नंदकिशोर नौटियाल की आलोचना पुस्तक ‘उद्भ्रांत का संस्कृति चिंतन’, श्री अवधबिहारी श्रीवास्तव द्वारा लिखित आलोचना पुस्तक ‘साहित्य संवाद: केन्द्र में उद्भ्रांत’, उड़िया के प्रख्यात विद्वान पदम्श्री डॉ. श्रीनिवास उद्गाता द्वारा ‘राधामाधव’ का उड़िया काव्यान्तरण तथा उद्भ्रांत विरचित ‘रुद्रावतार’ का नया साहित्यिक संस्करण एवं ‘अभिनव पाण्डव’ का तीसरा संस्करण।

संगोष्ठी में कवि की धर्मपत्नी श्रीमती ऊषा उद्भ्रांत, पुत्री तूलिका एवं सर्जना के साथ ही सर्वश्री दिनेश मिश्र, वरिष्ठ कथाकार डॉ. मधुकर गंगाधर, पी-7 चैनल के निदेशक श्री शरददत्त, साहित्य अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, डॉ. वीरेन्द्र सक्सेना, डॉ. बली सिंह, राजकुमार गौतम, सुश्री कमलेश जैन, अमरनाथ ‘अमर’, हीरालाल नागर, ‘कथा’ के सम्पादक अनुज, राकेश त्यागी, प्रशांतमणि तिवारी तथा बी.एम. शर्मा सहित राजधानी के साहित्य, कला और संस्कृतिकर्मियों की उपस्थिति सराहनीय रही। संगोष्ठी का संचालन श्री पुरुषोत्तम एन. सिंह ने किया। संगोष्ठी के आयोजक श्री अरविंद वाजपेयी, प्रबंध निदेशक (अमन प्रकाशन) ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया।

प्रस्तुतकर्ता : अखिलेश मिश्र

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