पांच साल से चित्रकूट मुख्यालय कर्वी में डटे हिंदुस्तान के पत्रकार ने समाचार पत्र को अपनी जागीर बना लिया। कानपुर और लखनऊ के संपादकों की चाटुकारिता के बूते अपनी दुकान चला रहे इस पत्रकार की खबरे सिर्फ पुलिस अधिकारियों की चमचागिरी से भरी रहती है। समाचार पत्र से ब्राम्हणवाद चला रहा यह पत्रकार पेशे को तो कलंकित कर ही रहा है अखबार की साख पर बट्टा भी लगा रहा है। अखबार में छपने वाली शायद ही कोई ऐसी खबर जिसमें इसकी विक्रत मानसिकता न झलकती हो।
अखबार में सच को झूंठा और झूंठ को सच साबित कर रहा है। इसकी पुष्टि प्रतिद्वंदी अखबारों से की जा सकती है। गृह नगर होने की वजह से गांव गांव में रिश्तेदारी आडे आती है। अखबार में सिर्फ उन्ही खबरों को वरीयता दी जाती है जिनसे कुछ मतलब हल होता है। पिछले दिनों भी इसने अपने पिता के पक्ष में ऐसी खबर प्रकाशित की जिससे समाचार पत्र की हर किसी ने थू-थू की। एक स्कूल के प्रबंधक पिता ने पहले तो विवाह समारोह के लिए एक पार्टी को स्कूल दे दिया और अच्छी रकम ऐंठ ली। बाद में बारात रोकने से मना कर दिया।
इतना ही नही पत्रकार बेटे से शिफारिश कर स्कूल में पुलिस भी तैनात करवा दी। बाद में यह खबर पिता के पक्ष में चार कालम छाप दी। यह तो एक मामला है। अगर अखबार के संपादक ऐसे मामलों की पड़ताल करें तो सारा काला चिट्ठा सामने आ जाएगा। पर उच्चाधिकारी भी इससे लाभान्वित हो रहे है इसलिए सब कुछ गोलमोल चल रहा है। संपादक जी किसी को इतनी भी छूट नही दी जानी चाहिए कि पूरा हिंदुस्तान परिवार ही शर्मशार हो जाए।
कम से कम ऐसे मामलों की जांच करवाना क्या नैतिकता की बात नही। ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों एसबीआई का भी सुर्खियों में आया था जिसमें अखबार में बैंक के खिलाफ फर्जी खबरें प्रकाशित की गईं थी। यहां तक कि बैंक मैनेजर से बात किए बगैर उनका वर्जन कई बार छाप दिया गया। बाद में मैनेजर ने इसकी शिकायत कानपुर संपादक से की थी। उसके बाद बैंक के खिलाफ फर्जी खबरें छपना बंद हो गई। क्यों संपादक जी कुछ याद आया।
एक पत्र पर आधारित.





