तमाम मतभेदों के बावजूद भाजपा के चर्चित नेता नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के अंदर जीत के सिकंदर बनते जा रहे हैं। लंबे समय से अंदरूनी कवायद चलती आ रही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय राजनीति में ‘सुपरस्टार’ बनाकर गांधीनगर से दिल्ली ले आया जाए। पिछले वर्ष दिसंबर में गुजरात विधानसभा का चुनाव पार्टी ने मोदी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार जीता है। इस जीत की शानदार ‘हैट्रिक’ बनने के बाद ही मोदी को बड़ी भूमिका में लाने की लामबंदी तेज हो गई। यह मुहिम अब निर्णायक दौर में पहुंच रही है।
हालांकि, पार्टी के अंदर मोदी के लिए पूरी तौर से मैदान साफ नहीं है। भाजपा के बड़े नेताओं की एक टोली अभी भी ‘मोदी रथ’ को थामने की मुहिम में है। लेकिन, भाजपा में मोदी विरोधी खेमा अब काफी कमजोर हो गया है। क्योंकि, हवा का रुख देखकर पार्टी के तमाम दिग्गजों ने समय रहते पाला बदल लेने में अपनी खैरियत समझी है। गुजरात में छह उपचुनावों के परिणाम आए हैं। इनसे भी मोदी का पाला और मजबूत हो गया है। जबकि, इन परिणामों से कांग्रेस के लिए चुनावी अलार्म बज गया है।
लोकसभा के चुनाव में एक साल से भी कम का वक्त बचा है। ऐसे में, छिटपुट उपचुनावों से भी राजनीतिक हवा बनती बिगड़ती है। कल, पांच राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणाम आए हैं। इनमें कांग्रेस के हाथ बड़ी निराशा ही आई है। क्योंकि, कई जगह इनके उम्मीदवारों को अपनी जमानतें भी जब्त करानी पड़ी हैं। इनमें गुजरात के उपचुनाव काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। यहां पर लोकसभा की दो और विधानसभा की चार सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं। ये सभी सीटें पहले कांग्रेस के पास थीं। लेकिन, इस बार सभी सीटों में कांग्रेस का पूरी तौर पर सफाया हो गया है।
हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस बांसकांठा और पोरबंदर की लोकसभा सीटें भी काफी वोटों से हार बैठी है। जबकि, इन दोनों सीटों को कांग्रेस का पुराना गढ़ माना जाता रहा। इसी तरह चारों विधानसभा सीटों में भी मतदाताओं ने कांग्रेस को जबरदस्त राजनीतिक चपत लगा दी है।
इस करारी जीत से उत्साहित मोदी ने कह दिया है कि ये चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए खतरे का अलार्म हैं। इस पार्टी के कर्णधार अच्छी तरह समझ लें कि केंद्र सरकार की कार्यशैली देश के किसी कोने में पसंद नहीं की जा रही है। मोदी के इस कटाक्ष पर कांग्रेस के नेता यह जवाब दे रहे हैं कि महज कुछ उपचुनावों से बड़े राजनीतिक संकेत नहीं समझे जाने चाहिए। क्योंकि, इन चुनावों में राष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा स्थानीय मुद्दों का असर हो जाता है।
ऐसे में, यह कहना ठीक नहीं होगा कि इन चुनावों के जरिए मतदाताओं ने केंद्र के खिलाफ कोई गुस्सा जताया है। यदि यह तर्क कुछ देर के लिए स्वीकार भी कर लिया जाए, तो क्या कांग्रेस के रणनीतिकार यह बताने की स्थिति में हैं कि वे मतदाताओं का मूड किस तरह से आंकेंगे?
कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार पिछले कई सालों से बड़े-बड़े घोटालों के दलदल में फंसी है। एक विवाद ठंडा नहीं पड़ता कि दूसरा खड़ा हो जाता है। यूपीए-2 की इस पारी में सरकार लगातार इन विवादों में ही फंसी रही है। इससे संसद के हर सत्र में सरकार को तरह-तरह की फजीहतों का सामना करना पड़ा है। राजनीतिक गतिरोध के चलते संसद में सरकार ढंग से कामकाज भी कराने में सफल नहीं रही। कांग्रेस के रणनीतिकार लंबे समय से महत्वाकांक्षी खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून बनाने की बात करते रहे हैं। पूरी तैयारी थी कि बजट सत्र में इस विधेयक को पास करा लिया जाए। क्योंकि, इसके प्रावधानों के तहत देश की 67 प्रतिशत आबादी को बेहद सस्ती दरों पर अनाज मिलने लगेगा।
दरअसल, कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने ही इस कानून के लिए पहल की थी। रणनीतिकारों का मंसूबा है कि यह कानून अमल में आ जाने से कांग्रेस के पक्ष में चुनावी लहर बन जाएगी। क्योंकि, इस कानूनी प्रावधान से हमेशा के लिए भुखमरी की समस्या खत्म हो सकती है। कांग्रेसी उस्ताद याद दिलाते हैं कि 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। इस राजनीतिक एजेंडे ने ही चुनाव में विपक्ष को बेदम बना दिया था। जबकि, खाद्यान्न गारंटी का प्रस्तावित एजेंडा तो ‘गरीबी हटाओ’ के नारे से भी ज्यादा जादुई प्रभाव पैदा कर सकता है। शायद, इसीलिए कांग्रेसी इसे ‘गेंम चेंजर’ मान रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि सरकार इस विधेयक को बजट सत्र के दूसरे चरण में पास करा लेना चाहती थी। लेकिन, तत्कालीन रेल मंत्री और कानून मंत्री के खिलाफ मुद्दा एकदम गर्म हुआ था। विपक्ष इन दोनों मंत्रियों के इस्तीफे के लिए अड़ा रहा। इसी चक्कर में संसद का काम पूरी तौर पर बाधित हुआ। ऐसे में, खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी विधेयक लटका रह गया। अब सरकार इसे पास कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का राजनीतिक सुर्रा छोड़ रही है। दबाव बनाने के लिए यह भी कहा जा रहा है कि सरकार अध्यादेश के जरिए भी इसे लागू करा सकती है। मुश्किल यह है कि इस मुद्दे को लेकर यूपीए के घटक एनसीपी की नाराजगी रही है। एनसीपी प्रमुख एवं केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार कह चुके हैं कि इतने महत्वपूर्ण विधेयक पर संसद में खुलकर चर्चा हो। बहस के बाद ही इसे कानूनी चोला पहनाना ठीक रहेगा। पवार के इस ऐतराज के कई अहम राजनीतिक निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं।
सालों बाद पिछले महीने कांग्रेस के लिए एक अच्छी खबर कर्नाटक से आई थी। यहां पर पार्टी ने विधानसभा चुनाव में बहुमत पा लिया। जबकि, पिछली बार यहां पर भाजपा ने बहुमत वाली सरकार बना ली थी। लेकिन, बीएस येदियुरप्पा का भाजपा से विद्रोह कांग्रेस के लिए राजनीतिक वरदान बन गया। इस जीत से कांग्रेस को कुछ राहत जरूर मिली थी। लेकिन, दूसरे सियासी मोर्चाें पर उसे नई रोशनी नहीं दिखाई पड़ रही। उपचुनावों के परिणामों से भी पार्टी को झटका लगा है। इसी साल कुछ महीनों बाद पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। खास तौर पर दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के चुनाव भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए सियासी अग्नि परीक्षा साबित हो सकते हैं।
लंबी जद्दोजहद के बाद भाजपा के अंदर मोदी के लिए ‘सिंहासन’ सजने लगा है। पार्टी के रणनीतिकार अपने सहयोगी दल, जनता दल (यू) के ऐतराज को भी ठेंगा दिखाने का जोखिम लेने को उतावले हो गए हैं। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मोदी को बनाने के सवाल पर लंबे समय से जदयू सख्त तेवर दिखाता आया है। पहले कदम के तौर पर मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए अभियान समिति का प्रमुख बनाया जाना लगभग तय है। इस मुद्दे पर आडवाणी खेमे की तमाम कोशिशें भी दम तोड़ती दिखाई पड़ रही हैं। उपचुनावों के नतीजों ने मोदी को नई ताकत दे दी है। अब कांग्रेस के सामने ‘मोदी चुनौती’ आ रही है। क्या केवल सेक्यूलर-सेक्यूलर के सियासी दांव से मोदी का तूफान कांग्रेस थाम पाएगी? अभी समय है कि कांग्रेस के रणनीतिकार देश के मूड से सबक ले लें।
आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर दिल्ली में मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुधवार को बुलाया गया। इस मौके पर मोदी ने सरकार की आंतरिक सुरक्षा नीतियों की जिस अंदाज में आलोचना की, उससे साफ है कि अब मोदी अपनी पार्टी की तरफ से राष्ट्रीय राजनीति में अहम किरदार निभाने के लिए पूरी तौर से तैयार हैं। ऐसे में, अब भाजपा नेतृत्व के लिए इस ठौर पर प्रधानमंत्री पद की उनकी उम्मीदवारी को और स्थगित कर पाना आसान भी कहां रहा है?
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।






