: दिल की सूखी दरिया में बगावत के कमल : अदम गोंडवी एक दृष्टिसंपन्न, विचारशील कवि हैं। वे जीवन को, समाज को, साहित्य को, राजनीति को, धर्म को जिस तरह देखते है, वे गरीबी और अमीरी के फर्क को, गाँव और शहर के फासले को जिस तरह रेखाकित करते हैं, उससे लगता है कि वे एक धैर्यवान सधे हुए साधक की तरह अहसास की धीमी आँच पर विचार का परिपाक करते हैं। यह बहुत आश्चर्यजनक और क्षोभकारी तथ्य है कि अदम की रचनाओं पर, उनकी रचना प्रक्रिया पर अभी तक गंभीरता से बात नहीं हुई है।
वे न केवल दुष्यंत के तेवर, रचना दृष्टि और पक्षधरता को अगले पायदान पर ले जकर खड़ा करने वाले समर्थ रचनाकार हैं बल्कि गजल और कविता का नया व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र रचने वाले अपने समय के गिने-चुने शीर्ष कवियों में शुमार किये जा सकने वाले हस्ताक्षर हैं। उनकी जनपक्षधरता न केवल राजनीतिक छल से आक्रांत आमजन के नये अनगढ़ समाजशास्त्र की रचना करती है बल्कि उसे वैकल्पिक रास्ता भी देती है।
वे सामाजिक बदलाव में कविता की बड़ी भूमिका देखते हैं और लोकचेतना को तेज धार देने के लिए रचना का इस्तेमाल करते हैं। अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले जाने और भूख एवं रोटी को शेरो-शायरी के केंद्र में ले आने का श्रेय अगर उन्हें दिया जाय तो कोई गलती नहीं होगी। उन्हें पेट के भूगोल में उलझे हुए आदमी की पीड़ा साफ नजर आती है, भूख की धूप उन्हें बेचैन करती है,
वह सलोनी और विंदास लगती है, गर्म रोटी की महंक उन्हें पागल बना देती है, वे साहित्य के मरकज में रोटी को रखना चाहते हैं, उनके यहां घीसू के पसीने से तमद्दुन में निखार आता है।
वे गजल को गाँव के दिलकश नजारे तक ले जाते हैं। इस तरह वे शायरी को जुल्फ, अंगड़ाई, तबस्सुम, मुहब्बत, चाँद, आईना, गुलमुहर, गुलाब और शबनमी होठों की गर्मी से निकाल कर भूख, पीड़ा, रोटी और गांव का नया मुहावरा देते हैं। वे सवाल करते हैं कि जब तक भूख है, दिल की किताब पढ़ने की फुरसत कोई कैसे निकालेगा, फुटपाथ पर खड़े होकर आँखों के समंदर में डुबकी कैसे लगायेगा।
वे खुद जिस खुरदरी और ठोस जमीन पर खड़े हैं, वहां से वे आम आदमी के साथ निरंतर होते छल-प्रपंच को आसानी से देख सकते हैं। राजनीति, मजहब, पूंजीवाद, गाँधीवाद जनता की प्रवंचना के सबसे बड़े कारण की तरह दिखते हैं और अदम इन्हें किसी कीमत पर बख्शने को तैयार नहीं। अमीर और गरीब के बीच बढ़ते फासले के पीछे वे गाँधीवादी नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं। गाँधी के नाम की आड़ में उनके चेले जनता को तबाह करके अपनी थैली भरने में जुटे हैं, उन्हें गरीबों का कहाँ खयाल।
अदम सवाल करते हैं, जिस युवा पीढ़ी से देश ने उम्मीदें लगा रखीं हैं, उन्हें इस पूँजीवादी व्यवस्था ने क्या दिया, और जवाब भी देते हैं, सिर्फ सेक्स की रंगीनियाँ और सल्फास की गोलियाँ। धर्म और मजहब ने जिस तरह हिंदुस्तान के भीतर दीवारें खड़ी की हैं, वह अदम को रास नहीं आता। बाबर ने कोई गलती की थी तो जुम्मन का घर क्यों जलना चाहिए। वे पूछते हैं कि क्या रसखान ने जो श्याम की मनोहारी तस्वीर रची, उसे बदल सकते हो, खारिज कर सकते हो, जायसी ने हिंदी की जो धार बहायी, उसे किसी और दिशा में मोड़ सकते हो, उसके प्रति कृतज्ञता से रिक्त हो सकते हो। वे उन लोगों की खबर लेने में तनिक संकोच नहीं करते, जो दंगे-फसाद करते कराते रहते हैं। यह मजहबी नग्मात छेड़ने का वक्त नहीं है, सबको मिलकर गरीबी से जूझना चाहिए।
उनकी कविता में पीड़ित, वंचित मनुष्य का दग्ध उच्छ्वास धरती के खंडकाव्य की तरह उतरता है और वे चाहते हैं कि रचनाकार इसी ठोस जमीन पर लौट आयें। वे आस्थावादियों के षड्यंत्र को भी पहचानते हैं, परमात्मा से पारलौकिक प्यार की खिल्ली उड़ाते हैं और ऐसे खयाल रखने वालों से पूछते हैं कि वेद में जो हाशिये से भी बाहर कर दिये गये, वे आस्था-विश्वास लेकर क्या करेंगे। वे कदम दर कदम गंदी, ओछी और षड्यंत्रकारी राजनीति से मुठभेड़ करते दिखायी पड़ते हैं। वहाँ सबने देखना बंद कर दिया है, सोचना बंद कर दिया है। आँख पर पट्टी है और अक्ल पर ताला। काजू भुने प्लेट में, ह्विस्की गिलास में, उतरा है रामराज विधायक निवास में। आज के दौर में जब धनबल के सहारे सरकारें बनायी, गिरायी जा सकती हैं, विधानसभाओं और संसद पर भरोसा करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
अदम के लिए संसद का नखास से ज्यादा मतलब नहीं दिखता है। जिस मुल्क में भूख शांत करने के लिए जिस्म बेचने की मजबूरी हो, वह मुल्क बुधुआ की लुगाई के अलावा क्या है। अदम अपने सारे औजार, हथियार इस्तेमाल करते हुए भी कई बार हताशा और निरुपायता की उस ढलान पर जा खड़े होते हैं, जहां से न्याय और हक की संभावना का समतल ओझल हो जाता है। और तब वे भी उसी तरह लाचार होते हैं, जैसे आम जनता अक्सर रहती है।
पर जब उनके सामने कोई भी चारा नहीं होता, तब वे लाचार होकर भी लाचार नहीं होते, बेहोशी में नहीं जाते। दिल की सूखी दरिया में उन्हें बगावत के कमल खिलते नजर आते हैं। उन्हें उम्मीद है कि अगर भुखमरी की धूप इसी तरह तीखी होती गयी तो एक दिन भूखे लोगों की भीड़ महलों की रंगीनी को मजारों में बदल देगी। ऐसी विकट परिस्थिति में रास्ता क्या है, चारा क्या है। वे पूरे होशो-हवास में ऐलान करते हैं, जनता के पास एक ही चारा है बगावत।

डा. सुभाष राय
संपादक
हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स
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