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यह पत्रकारिता के पतन का लक्षण है या फिर उत्थान का?

आज (6 जून 2013) शाम को मेरे हॉकर के साथ एक निरीह प्राणी जैसे युवा आया। उसने बड़े दया भाव से यह कहा कि आप हमें 50 रुपये का चेक दे दीजिए तो इसके बदले में 5 महीने तक नवभारत टाइम्स अखबार आपके घर पर आएगा। मैं भ्रम में पड़ गया कि आखिर कोई किस तरह से 10 रुपये की कीमत में महीने भर अखबार, आखिर इससे सस्ती चीज और क्या सकती है। लेकिन फिर भी मैंने उससे कुछ पूछना चाहा, लेकिन वह युवा कुछ बताना नहीं चाहता था। शायद उसे मालूम नहीं होगा और झूठ भी बता नहीं पा रहा था।

आज (6 जून 2013) शाम को मेरे हॉकर के साथ एक निरीह प्राणी जैसे युवा आया। उसने बड़े दया भाव से यह कहा कि आप हमें 50 रुपये का चेक दे दीजिए तो इसके बदले में 5 महीने तक नवभारत टाइम्स अखबार आपके घर पर आएगा। मैं भ्रम में पड़ गया कि आखिर कोई किस तरह से 10 रुपये की कीमत में महीने भर अखबार, आखिर इससे सस्ती चीज और क्या सकती है। लेकिन फिर भी मैंने उससे कुछ पूछना चाहा, लेकिन वह युवा कुछ बताना नहीं चाहता था। शायद उसे मालूम नहीं होगा और झूठ भी बता नहीं पा रहा था।

शायद वह अखबार का आदमी नहीं था और बाजार का भी नहीं, बल्कि लग रहा था वह उस ‘निंजा’ वर्ग से सम्बंध रखता है जिसने अमेरिका की मंदी का मार्ग प्रशस्त किया। अब एक सवाल यह उठता है कि आखिर नवभारत टाइम्स जैसे अखबार ने लोगों से 50 रुपये ठगने की बजाय यह क्यों नहीं पूछा कि उन्हें किस तरह का अखबार चाहिए। उन्होंने अपने अखबार में जो कंटेंट रखा है या रखना है, उस पर लोगों की राय क्यों नहीं ली? उन्होंने अपने भावी पाठकों से यह जानना क्यों नहीं चाहा कि वर्तमान समय में लखनऊ में छपने वाले अखबारों से वे किस हद तक संतुष्ट हैं? यदि नहीं हैं तो उन्हें क्या चाहिए? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्यों?

क्या अन्य अखबारों की तरह इसे भी मालूम है कि लोग क्या चाहते हैं, क्या पढ़ते हैं और क्या नहीं पढ़ते या लोगों की पढ़ने में रुचि खत्म हो रही है। वे यह भी जानते हैं कि कुछ भारतीयों को कुछ पैसे का लालच देकर इनसे बहुत कुछ छीना जा सकता है। यही तो हो रहा है? सवाल यह है कि क्या ये प्रतिष्ठान सही अर्थों में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं या आगे निभांएंगे? स्पष्टतः नहीं। जब शुरुआत ही गलत हुयी है तो फिर अच्छे परिणामों की अपेक्षा कहां तक की जा सकती है। क्या कोई ऐसा प्रतिष्ठान सच में आएगा जो नवजागरण बने? क्या पत्रिकारिता के नाम पर जो हो रहा है वही होना चाहिए? यह पत्रकारिता के पतन का लक्षण है या उत्थान का?

वरिष्‍ठ पत्रकार रहीस सिंह के एफबी वॉल से साभार.

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