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अब अभिव्यक्ति की आजादी भी सत्ता को मंजूर नहीं!

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने देश के प्रमुख स्वैच्छिक संगठन इंडियन सोशल ऐक्शन फोरम (इंसाफ) को भेजे एक पत्र में इंसाफ का विदेशी अनुदान पंजीकरण (एफसीआरए) अगले 180 दिनों के लिए रद्द किए जाने और बैंक खाता सील किए जाने का कारण यह बताया है कि सरकार के पास उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर उसे लगता है कि संस्था को मिलने वाला विदेशी अनुदान ‘‘दुराग्रहपूर्ण तरीके से जन हित को प्रभावित कर सकता है।‘‘

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने देश के प्रमुख स्वैच्छिक संगठन इंडियन सोशल ऐक्शन फोरम (इंसाफ) को भेजे एक पत्र में इंसाफ का विदेशी अनुदान पंजीकरण (एफसीआरए) अगले 180 दिनों के लिए रद्द किए जाने और बैंक खाता सील किए जाने का कारण यह बताया है कि सरकार के पास उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर उसे लगता है कि संस्था को मिलने वाला विदेशी अनुदान ‘‘दुराग्रहपूर्ण तरीके से जन हित को प्रभावित कर सकता है।‘‘

सरकार द्वारा उठाए गए ऐसे कदम की आशंका तो इंसाफ सरीखे स्वैच्छिक संगठनों को पहले से थी, अलबत्ता यह इतनी जल्दी हो जाएगा इसकी उम्मीद नहीं थी। इसे समझने के लिए हमें एफसीआरए कानून, 1976 में 2010 में किए गए संशोधन और तदुपरांत 2011 से लागू नए कानून के नियमों पर एक नजर डाल लेने की आवश्यकता है, जिससे सरकार की असली मंशा और विदेशी अनुदान रोकने की आड़ में सरकार की दमनकारी राजनीति की पर्दाफाश किया जा सके।

भारत सरकार ने 2010 में जो नया एफसीआरए कानून बनाया उसका नियम-3 सबसे विवादित पक्ष है, जो मौजूदा फैसले के संदर्भ में प्रासंगिक है। यह कहता है कि ऐसा कोई भी संगठन जो ‘‘आदतन जनता के हित में बंद, हड़ताल, रास्ता रोको, रेल रोको या जेल भरो जैसी राजनीतिक कार्रवाईयों को अंजाम देता हो’’ वह एफसीआरए का पात्र नहीं हो सकता। ऐसी किसी भी इकाई को सरकार ‘‘राजनीति प्रकृति’’ वाला संगठन कहती है, हालांकि यह श्रेणी तय करने का सर्वाधिकार उसने अपने पास सुरक्षित रखा हुआ है।

इंसाफ ने 5 अगस्त 2011 को कानून में इस नियम के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिसे 16 सितंबर 2011 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद 2 जनवरी 2012 को इंसाफ ने यही याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लगाई जिसे स्वीकार कर लिया गया और सरकार से इस पर जवाब मांगा गया, जो उसने आज तक नहीं दिया है। इस मामले में दिलचस्प बात यह है कि इंसाफ को किसी ऐसे संगठन की नजीर पेश करना है जिसका एफसीआरए इन नियमों के तहत प्रतिबंधित किया गया हो और संयोगवश खुद इंसाफ ही ऐसा इकलौता और पहला उदाहरण बन गया है जिसका खाता राजनीतिक गतिविधियों के नाम पर इस माह सरकार ने सील कर दिया।

इंसाफ कोई जन संगठन नहीं है। यह देश भर में जमीनी आंदोलनों और संघर्षो से जुड़े 700 से ज्यादा संगठनों का सिर्फ एक नेटवर्क है और इसकी कुल भूमिका इन राजनीतिक व सामाजिक आंदोलनों के संदर्भ में एक सहजकर्ता की है। बाबरी विध्वंस के बाद इंसाफ को इसलिए खड़ा किया गया था ताकि देश में भूमंडलीकरण और साम्प्रदायिकता की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ तथा लोकतंत्र के पक्ष में अवाम के भीतर जागरूकता पैदा की जा सके। मौजूदा प्रतिबंध का सर्वाधिक अहम पहलू यही है कि कुडनकुलम से लेकर कश्मीर तक देश भर में चल रहे जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और अधिकारों के संघर्षो पर एक साथ लगाम कसी जा सके और उन्हें चलाने वाले संगठनों व व्यक्तियों को उन बुनियादी सुविधाओं से महरूम किया जा सके जिसमें इंसाफ की लगातार एक भूमिका रही है।

इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि जो सरकार नव-उदारवादी आर्थिकी के दानव को प्रत्यक्ष विदेशी निवेशों के माध्यम से इस देश की निरीह जनता पर खुल्लमखुल्ला हमला करने का न्योता दे रही है और लोगों के जीवन व आजीविका को तबाह करने का सुनियोजित वैचारिक नुस्खा विश्व बैंक जैसी अंतराष्ट्रीय एजेंसियों के इशारे पर लागू कर रही है, वही दूसरी तरफ विदेशी आर्थिक अनुदानों की मदद से इस देश की जनता के पक्ष में काम करने वाले संगठनों को निशाना भी बना रही है। यहां सवाल यह है कि आखिर विदेशी अनुदान का इस्तेमाल कहां हो रहा है। इसमें फर्क किया जाना जरूरी है। सरकार एफडीआई के नाम पर विदेशी धन का इस्तेमाल करोड़ों लोगों को विस्थापित करने में कर रही है जबकि मुट्ठी भर जुझारू संगठन इंसाफ के माध्यम से विदेशी पैसे का इस्तेमाल जनता के असली सवालों पर संघर्ष करने के लिए कर रहे हैं। सरकार को यही बात नागवार गुजरी है। लिहाजा उसने इंसाफ के काम को ‘‘जनहित को प्रभावित करने वाला’’ करार देकर वास्तविकता को सिर के बल खड़ा कर दिया है।

अगर बैनर-पोस्टर छापने में मदद देना, किताबें छपवाना, संघर्ष सामग्री का वितरण, प्रदर्शन स्थल का खर्चा उठाना और लोकतंत्र के हक में बात करना भी ऐसी ‘‘राजनीतिक कार्रवाई’’ है जिसके चलते आपकी रोजी-रोटी छीनी जा सकती हो, तो वास्तव में यहां सवाल गंभीर खड़ा हो जाता है कि इस देश में लोकतंत्र है भी या नहीं! संविधान के अनुच्छेद 19 (अ) में वर्णित जिस अभिव्यक्ति की आजादी के मूलभूत अधिकार का संदर्भ हम लोग बार-बार देते हैं, क्या उसका अब कोई मायने नहीं रह गया हैं?

इंसाफ द्वारा उच्च न्यायालय और बाद में खारिज किए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं में साफ कहा गया है कि 2010 के एफसीआरए कानून और 2011 में एफसीआरए नियमों के उक्त प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(अ), 19(1) (स) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हैं। सरकार जब एफसीआरए कानून को बना रही थी तो उसने रायशुमारी के लिए सभी हितधारकों से पेशकश की थी। देश के छह प्रमुख राजनीतिक दलों ने उस वक्त अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि ‘‘भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, लिहाजा हर किसी को राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अधिकार है।

‘‘राजनीतिक प्रकृति’’ वाले संगठनों को विदेशी अनुदान से वर्जित किए जाने संबधी प्रावधानों को इन दलों ने भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों से बेमेल करार देते हुए सिफारिश की थी कि एफसीआरए विधेयक के मसविदे से उपबंध 3(1)(एफ), 5(1) और 54(2)(बी) को हटा दिया जाए। राज्यसभा में जब एफसीआरए विधेयक 2010 को पारित कराने के लिए सदन पटल पर लाया गया, तो बहस के दौरान कर्नाटक से सांसद एम. रमा जॉयस ने एक अहम टिप्पणी की थी,‘‘ मेरी आपत्ति है कि ‘राजनीतिक प्रकृति’ एक बेहद खतरनाक, व्यापक और उलझा हुआ शब्द है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी प्रावधान का उपयोग और दुरूपयोग दोनों ही समान रूप से किया जाना संभव है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। ’’जानना दिलचस्प है कि उक्त सांसद की लिखी पुस्तक ‘‘भारत का विधिक और संवैधानिक इतिहास’’ कानून की डिग्री के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा पाठ्यक्रम में लगाई हुई है।

इंसाफ के खिलाफ की गई कार्रवाई ने दो बातें बिल्कुल साफ कर दी हैं। पहली यह कि नव-उदारवादी सिचारधारा के नाम पर जनता को लूटने-खसोटने के इरादे से पूरी तरह लैस भारतीय सत्ताधारी वर्ग जनता के हितैशियों के खिलाफ किसी भी हद तक जा सकता है। दूसरे, लोकतंत्र और संविधान की बुनियादी भावनाओं के प्रति सत्ताधारी तबके में कोई आस्था या शर्म नहीं बची है। दमन और विडंबनाओं के ऐसे दौर में हमारे पास एक ही रास्ता बचता है कि हम बिना कुछ भी दुराए-छुपाए बिल्कुल पारदर्शी तरीके से अपने विरोध को दर्ज कराएं। यहां इंसाफ का खाता दोबारा चालू होना और उसके एफसीआरए पर लगी बंदिश का हटाया जाना उतना प्राथमिक नहीं है, बल्कि यह तो सिर्फ एक प्रस्थान बिंदु है। असल सवाल यह है कि अगर अब भी समाज ने पूंजीवादी व जनविरोधी सत्ता तंत्र की साजिशों को खोल कर हर्फ-हर्फ नहीं समझा और समूचे विवेक व साहस के साथ एक रणनीति बनाते हुए सामूहिक प्रतिरोध दर्ज नहीं करवाया, तो कल को वास्तव में बहुत देर हो जाएगी।

लेखक उत्कर्ष सिन्‍हा हिन्दी दैनिक अवधनामा के सम्पादक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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