जनसंदेश न्यूज, जिसका बाद में नाम बदल कर न्यूज टाइम कर दिया गया, उसकी हालत खराब हो चुकी है. फील्ड में काम करने वाले ज्यादातर स्ट्रिंगरों को कई महीने का पैसा नहीं मिला है. चमक-धमक दिखाने वाले स्ट्रिंगरों को आधा-अधूरा देकर कागज पर लिखवा लिया गया है कि अब कोई बकाया नहीं है. इस चैनल का शटर भी लगभग गिर चुका है. चैनल में बस इसके हेड सैयदेन जैदी और दो-चार अन्य मीडियाकर्मी बचे हैं, और ये भी नौकरी ढूंढने में लगे हुए हैं.
बाहर खबर फैलाई जा रही है कि चैनल को फिर धूम धड़ाके से लांच किया जाएगा, लेकिन यह सब बस बाजार बनाने के सिवा कुछ भी नहीं है. चैनल दूसरे के लाइसेंस पर चल रहा था. बताया जा रहा है कि इस चैनल का लाइसेंस भी खतम हो चुका है. जनसंदेश के समय से जुड़े उत्तर प्रदेश के कई दर्जन स्ट्रिंगरों को प्रबंधन ने बकाया पेमेंट नहीं किया है. अब तक उन्हें आश्वासन ही दिया जा रहा है. बताया जा रहा है कि कुछ दबंग टाइप के स्ट्रिंगरों ने धमकाया-चमकाया तो उनके कुल बकाया का बीस से तीस प्रतिशत तक पैसे देकर लिखवा लिया गया कि अब बकाया नहीं है. स्ट्रिंगर भी कुछ मिल जाने के चलते ऐसा लिखकर दे चुके हैं.
पर खबर है कि ज्यादातर स्ट्रिंगरों का कर्ज कंपनी के ऊपर है. चैनल वैसे भी कहीं दिख नहीं रहा है. स्ट्रिंगर अपने बकाया रकम को लेकर परेशान हैं. चैनल के बंद होने के पीछे कारण माना जा रहा है कि इसमें पत्रकारिता कम, ओबलाइज करने का धंधा ज्यादा किया जाता रहा. इस कारण न तो यह चैनल कंटेंट के कारण चर्चा में आ सका और न ही भरपूर धंधा पा सका. इसी तरह वाराणसी के लिए काम करने वाले रोहित गुप्ता का पैसा भी कंपनी ने डकार लिया है.
रोहित का कहना है कि उन्होंने वाराणसी में तक़रीबन आठ महीने काम किया लेकिन उनको केवल तीन से चार हज़ार रुपये ही मिला. उसके बाद उन्होंने जब वापस जनसन्देश ऑफिस में फोन किया तो उन्हें तक़रीबन आठ हज़ार रुपये का एक्सपायर्ड चेक भेज दिए गए. रोहित ने जब इसकी शिकायत सैयदेन जैदी और अकाउंट में रोहित से बात की तो इन लोगों ने उनसे चेक वापस लेकर कहा कि आपको दूसरा चेक भेज दिया जायेगा, लेकिन आज कई साल हो गये इन लोगों ने रोहित के मेहतन की कमाई का एक पैसा नहीं दिया है. ऐसा ही हाल कई जिलों के स्ट्रिंगरों का है.






