देहरादून। सत्तारूढ़ कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच चल रहा शीतयुद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रकारान्तर में यह नेता अलामान को भी चुनौती देते नजर आ रहे हैं। उत्तराखंड बनने के बाद ही कांग्रेस में यह सिलसिला प्रारंभ हुआ था जो बदस्तूर जारी है। मूलत: यह शीतयुद्ध सत्ता बनाग संगठन का है। जिन दिनों पहली चुनी गयी सरकार का मुखिया पं. नारायण दत्त तिवारी को बनाया गया था, तभी से ही यह सिलसिला चल रहा है।
उस समय संगठन के शीर्ष पर वर्तमान केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत बैठे हुए थे। पूरे पांच साल हरीश रावत बनाम नारायण दत्त तिवारी का युद्ध जारी रहा। इसी युद्ध का परिणाम रहा कि विकास का काम करने बाद भी कांग्रेस सत्ता में वापस नहीं हुई। हलांकि भाजपा में भी यही रहा और खण्डूरी को हटाकर निशंक को फिर निशंक को हटाकर मुख्यमंत्री बनाया गया।
राजनीति के जानकार मनाते है यदि डां. रमेश पोखरियाल निशंक ही मुख्यमंत्री रहते तो भाजपा 35 से अधिक सीटें पाती। आपसी फूट का परिणाम यह रहा कांग्रेस पार्टी विधायक ज्यादा लाई यानि कांग्रेस 31 और भाजपा 30। अब कांग्रेस सत्ता में है फिर भी उसके अंदर सत्ता बनाम संगठन का युद्ध जारी है। ताजातरीन मामला यशपाल आर्य के रूठने और विजय बहुगुणा के मनाने का है। यशपाल आर्य भले ही विजय बहुगुणा के अधीन कैबनेट मंत्री हों पर वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। उनका मानना है कि पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है। दोनों के बीच चले इस शीत युद्ध का अभास पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को इस बात का एहसास होने लगा है। हरीश रावत और नारायण दत्त तिवारी के तर्ज पर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने कैबिनेट मंत्री को मनाने उनके घर गये। शनिवार को विजय बहुगुणा यशपाल आर्य को यमुना कालोनी आवास पर पहुंचे और उनसे विभिन्न विषयों पर चर्चा की।
जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री और कैबिनैट मंत्री के बीच लालबत्तियों, बोर्ड, निगमों के मामले पर भी दायित्व के संबंध में चर्चा हुयी है। यशपाल आर्य कैबिनेट मंत्री होने के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। दूसरी ओर ईमनदार नेता प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए अपनी ताकत दिखाने के चक्कर में बड़े नेता कांग्रेस की चौखट पर डेरा डाल रहे हैं। इनमें डा. हरक सिंह रावत सतपाल महाराज तथा प्रदीप टमटा जैसे नाम भी शामिल हैं, जहां हरक सिंह रावत कैबिनेट मंत्री हैं। वहीं सतपाल महाराज और प्रदीप टमटा दोनों सांसद हैं। सतपाल महाराज सांसद होने के साथ-साथ पूरे देश में प्रवचन करने जाते हैं। ऐसे में उन में पास निश्चित रूप से समय की कमी होगी।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता शूरवीर सिंह सजवाण भी मनाते हैं कि पूर्णालिक अध्यक्ष चाहिए। महाराज क पास ज्ञान है। वे सांसद हैं। देश-विदेश में उनका प्रवचन होता है। ये कांग्रेस के लिए गर्व का विषय है यदि व पार्टी के लिए समय निकाल सके तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। पार्टी को पूर्णकालिक अध्यक्ष की जरूरत है। अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी में तलवारें निकल पड़ी हैं। सभी दवेदार अपनी कमीज सबसे उजली बता रहे हैं पर एक दूसरे को प्रत्यक्ष या परोक्ष कमतर बताने का कार्य भी जारी है। ऐसे में सत्ता बनाम संगठन की लड़ाई और रूठने मनाने का दौर पार्टी के ढांचे को कमजोर करने का भरपूर प्रयास कर रहा है। यह जनता है सब जानती है। रही सही कमी मीडिया पूरी कर दे रहा है।
इस शीतयुद्ध असर आगामी लोकसभा चुनाव पर पडऩे की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। पिछले दिनों हरीश रावत गुट ने सरकार पर हमला बोला। केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री हरीश रावत ने उनके ही गुट के विधान सभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने और सांसद प्रदीप टमटा ने बहुगुणा सरकार पर जोरदार टिप्पणियां की जिसे दोनों गुट असहज महसूस कर रहे हैं। आलम यह है कि सत्ता बनाम संगठन का यह शीतयुद्ध कहीं न कहीं पार्टी और सरकार दोनों को प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि दावेदारों की बहुलता के कारण कांग्रेस हाईकमान चाहकर भी प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष तय नहीं कर पा रहा है।
सूत्रों की माने तो प्रदेश प्रभारी सहप्रभारी के जारिये कांग्रेस आलाकमान प्रदेश कांग्रेस की हर गतिविधियों पर पैनी निगाह रखे हुए है। यह निगाह कितनी प्रभावी होगी यह तो समय बतायेगा पर प्रदेश कांग्रेस में बढ़ती गुटबाजी फिलहाल सत्ता और संगठन दोनों के लिए भारी पड़ती दिख रही है। पिछले दिनों अनुशासन समिति पर बोलने के कारण तीन नेताओं को बेदखल कर दिया गया। जिनमें पूर्व प्रवक्ता सुरेन्द्र आर्य राजेन्द्र शाह तथा एसएस नेगी के नाम शामिल है। हालांकि इन नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, पर लगता नहीं कि पार्टी के भीतर पनप रही गुटबाजी सुधरेगी।
एक वरिष्ठ नेता ने पूछताछ के दौरान बताया कि कांग्रेस हाईकमान शीघ्र ही अपने तरीके से यहां की गुटबाजी खत्म करना चाह रहा है। यदि ऐसा न हुआ तो आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लत और खराब हो जायेगी। मात्र 30 सीटो पर रहने वाली भाजपा को इसका लाभ मिल जाए और पांचों सीटें उसी झोली में आ जाये तो राजनीतिक जानकारों कोई अजूबा नहीं दिखेगा।
लेखक राम प्रताप मिश्र उत्तराखंड के पत्रकार हैं.






