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निर्णायक मंडल ने उस बेचारी पत्रकार को पुरस्कार दे दिया

Ghanshyam Srivastava : पत्रकारिता के लिए पुरस्कारों की घोषणा के पूर्व निर्णायक मंडल की बैठक में एक महिला पत्रकार पर चर्चा हो रही थी। आप भी जानिए निर्णायक मंडल के सदस्यों ने चयन का आधार कैसे तय किया?

Ghanshyam Srivastava : पत्रकारिता के लिए पुरस्कारों की घोषणा के पूर्व निर्णायक मंडल की बैठक में एक महिला पत्रकार पर चर्चा हो रही थी। आप भी जानिए निर्णायक मंडल के सदस्यों ने चयन का आधार कैसे तय किया?

इसका रिकॉमेंडेशन…जी ने किया है।

…लेकिन डॉक्यूमेंन्ट देख कर कॉन्ट्रीब्यूशन कुछ खास नहीं दिख रहा है।

…..अरे तय कर दीजिए, एससी है बेचारी।

पिछले तीन महीनों में चार बार आकर रिरिया चुकी है।

पिछली बार तो पैर पकड़ लिया, कहने लगी, सर, मेरे नाम पर जरूर विचार कीजिएगा, मेरे कैरियर के लिए बहुत जरूरी है।

जब भी आती है, मिठाइयां, फल, ड्राइ फ्रूट्स वगैरह घर के लिए ले आती है।

उसे नहीं दिया, तो बेचारी बहुत निराश होगी।

लेकिन….दूसरे कैंडिडेट की प्रोफाइल बहुत पावरफुल है।

इस लड़की ने तो पत्रकारिता में कुछ खास किया भी नहीं है।

कुल मिला कर चार-पांच साल का कैरियर और दो-तीन इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स, बाकी सब रूटीन ही है।

… यह क्यों नहीं देखते कि अपने विचारधारा की है।

पुरस्कृत किया, तो उसका हौसला और बढ़ेगा।

ठीक है सर, कन्सीडर कर लेते हैं।

और निर्णायक मंडल ने उस बेचारी को पुरस्कार दे दिया। अखबारों में नाम छपा, फोटो छपा। पुरस्कार मिलने के एक साल बाद तक उस बेचारी की एक भी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स अभी तक नहीं देखी गयी है। पत्रकारिता के लिए दिये गये पुरस्कारों पर इस आधार पर विचार किये जाते रहेंगे, तो क्या इससे पत्रकारिता का भला होगा? भाई साहब, साहित्य जगत में तो इससे भी ज्यादा अंधेरगर्दी है। कभी दिल्ली के गलियारों में आकर देखिए।

घनश्याम श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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