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शशि शेखर और रणविजय को पराड़कर के समक्ष बिठा दिया अजय विद्युत ने!

: हिंदी पत्तरकारिता के चंद्रवरदाई, चंद्रगुप्त, चाणक्य और पराड़कर : अजय विद्युत जी पत्रकार हैं। इन दिनों 'हिंदुस्तान' में हैं। उन्होंने फेसबुक पर मस्केबाज़ी के सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। तो भी कहीं रास्ता मिल नहीं रहा। उत्तराखंड के मूल निवासी हैं। जवानी लखनऊ में गुज़ारी। अधेड़ उम्र में दिल्ली की तरफ कूच कर गए। राष्ट्रीय सहारा में उन्हें जगह मिल गई। समूह संपादक रणविजय सिंह के खासमखास बन गए। रणविजय सिंह की तंत्र-मंत्र में बड़ी घनघोर आस्था है। नोएडा, लखनऊ, विंध्याचल और बनारस में उन की तांत्रिक पूजा निर्बाध चलती रहती है। जो भी बनारस का व्यूरोचीफ़ रहा या स्थानीय संपादक खुद भले आता जाता रहा हो लेकिन रणविजय की तांत्रिक साधना करवा कर ही टिक पाया है।

: हिंदी पत्तरकारिता के चंद्रवरदाई, चंद्रगुप्त, चाणक्य और पराड़कर : अजय विद्युत जी पत्रकार हैं। इन दिनों 'हिंदुस्तान' में हैं। उन्होंने फेसबुक पर मस्केबाज़ी के सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। तो भी कहीं रास्ता मिल नहीं रहा। उत्तराखंड के मूल निवासी हैं। जवानी लखनऊ में गुज़ारी। अधेड़ उम्र में दिल्ली की तरफ कूच कर गए। राष्ट्रीय सहारा में उन्हें जगह मिल गई। समूह संपादक रणविजय सिंह के खासमखास बन गए। रणविजय सिंह की तंत्र-मंत्र में बड़ी घनघोर आस्था है। नोएडा, लखनऊ, विंध्याचल और बनारस में उन की तांत्रिक पूजा निर्बाध चलती रहती है। जो भी बनारस का व्यूरोचीफ़ रहा या स्थानीय संपादक खुद भले आता जाता रहा हो लेकिन रणविजय की तांत्रिक साधना करवा कर ही टिक पाया है।

रणविजय के जोड़ीदार रहे स्वतंत्र मिश्रा भी तांत्रिक पूजा-पाठ में घनघोर आस्थावान हैं। एक समय था कि दोनों ही उल्लू का खून लड्डू में मिला कर खिलाने में मशहूर थे। कहा जाता था कि जिस ने भी इन का वह लड्डू खाया इन के वश में हो गया। सहारा में इन दोनों की बैटिंग के लंबे रिकार्ड का एक राज़ यह उल्लू के खून सना लड्डू ही कहा जाता रहा है। लेकिन स्वतंत्र मिश्रा ने लड्डू कुछ ज़्यादा खिला दिया कि उल्लू का खून कुछ कम या ज़्यादा करवा दिया, यह पता नहीं। पर इस बीच उन के दुर्दिन चल रहे हैं। अब वह लोगों को  जब-तब श्राप और दांव देते-देते सहारा से बाहर हो चुके हैं। क्रेडिट कार्ड चुरा कर  बेआबरू हो चुके हैं। नकल करने में पकड़े जाने पर छत से कूदने का ड्रामा कर वीरु बन चुके हैं। यह और ऐसी अनगिनत कहानियों का खजाना है उनके पीछे-पीछे। लेकिन अब वह सब मान-अपमान भूल कर सहारा में वापसी की जुगत में ज़ोर-शोर से लगे हुए  हैं।

खैर रणविजय सिंह डटे हुए हैं बदस्तूर सहारा में। एक समय हिंदी पत्रकारिता में अक्षय कुमार जैन और धर्मवीर भारती अपने संपादक का लंबा दौर गुज़ारने के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन रणविजय ने उन का भी रिकार्ड तोड़ दिया है। तो इस लिए भी कि वह अपने जोड़ीदार स्वतंत्र मिश्र  की तरह सिर्फ़ तंत्र मंत्र ही नहीं और भी तमाम टोटकेबाज़ी में सिद्धहस्त रहे हैं। इसी टोटकेबाज़ी के चलते एक समय वह नोएडा में कौव्वा खोजते थे, खीर खिलाने के लिए। तब यही अजय विद्युत राष्ट्रीय सहारा में थे। और रणविजय के कौव्वा खोज अभियान में सहायक हुए थे। रणविजय को ऐसी छत मुहैय्या करवाते थे जहां कौव्वे उन की खीर खा सकें। उन दिनों रणविजय एक जांच में फंसे थे। उन पर आरोप था कि तमाम विधायकों और सांसदों के विधायक और सांसद निधि से उन्हों ने करोड़ो रुपए बटोरे हैं, अपना महाविद्यालय चलाने के लिए।

आरोप तो जांच में साबित हो गए पर रणविजय का कौव्वे को खीर खिलाने का टोटका काम कर गया और वह बच गए। अजय विद्युत के वह शुक्रगुज़ार हो गए। हालां कि रणविजय और स्वतंत्र मिश्रा के लिए एक कहावत खूब कही जाती रही है कि ऐसा कोई सगा नहीं, जिस को हमने ठगा नहीं। तो शायद इसी कहावत के शिकार अजय विद्युत भी हुए। और सहारा उन्हें छोड़ना पड़ गया। उन दिनों मृणाल पांडेय हिंदुस्तान में संपादक थीं। पर्वत राज की दुंदुभी बजी हुई थी। अजय विद्युत पर्वत समाज के थे ही,  प्रमोद जोशी को पकड़ा और मृणाल पांडेय से मिल कर हिंदुस्तानी बन गए। दिक्कत बस यही हुई कि अनुबंध पर रखे गए। अब मृणाल पांडेय को गए ज़माना हो गया, शशि शेखर का राज आ गया, सो पर्वत राज का नाश कब का हो चुका है। और अजय विद्युत का अनुबंध भी समाप्त होने को है। अब वह क्या करें?

तो फेसबुक पर एक पोस्ट लगाई है जिसमें एक साथ शशि शेखर और रणविजय का गुणगान करते हुए दोनों ही को पराड़कर के समक्ष बैठा दिया है। क्या तो यह तीनों आज में थे। मस्केबाज़ी के सारे रिकार्ड टूट गए हैं। ज़रा पढ़िए आप भी अजय विद्युत का लिखा कसीदा :


You Hindiwala…

क्या बताऊँ, आप सोच सकते हैं कि cricket में जो नया बच्चा डिस्ट्रिक्ट लेवल पर भी खेलता है उसे डॉन ब्रेडमैन के बारे में मालूम नहीं होगा? पर हिंदी पत्तरकारिता में आपको नेशनल लेवल पर ऐसे तमाम बच्चे मिल जायेंगे जो पराड़कर जी के बारे में नहीं जानते। वे सब मास कम्युनिकेशन से डिग्री लेकर आए हैं और इनमें से कई ने पराड़कर जी का नाम भी नहीं सुना है। चलिए वो तो बच्चे हैं पर इन बड़ों को क्या कहें। 50+ वालों में से 98% पत्रकार पराड़कर जी का पूरा नाम नहीं जानते हैं। और इस कलंक का एक एक टीका उन सभी के माथे पर है जो अगली कुछ पंक्तियाँ पढ़कर शायद मुझे 'अतिरिक्त सम्मान' प्रदान कर सकते हैं। कुछ पहले भी दे चुके हैं। हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर जिस आज अखबार से जुड़े थे उसका नाम भी पत्रकारिता के नौनिहालों को नहीं मालूम है। वक़्त बदला… अब न वो सोज, न वो साज, न वो दीवाने रहे। हर दौर अपनी ज़रुरत के मुताबिक अपने नायक चुन लेता है। आज भले आज अखबार को लोग न जानते हों, पर उस अखबार से निकली दो प्रतिभाएं शीर्ष आसन पर हैं। श्री शशि शेखर हिंदुस्तान के editor in chief और श्री रणविजय सिंह राष्ट्रीय सहारा के group editor हैं। संयोग से दोनों ही यूपी से हैं। यहाँ तीन चित्र दे रहा हूँ। शशि जी, रणविजय जी और श्रद्धेय पराड़कर जी।


अजय के फेसबुक स्टेटस का स्क्रीनशाट यूं है


नोट कीजिए यह भी कि अजय विद्युत मारे जोश के हिंदी पत्रकारिता नहीं हिंदी पत्तरकारिता की बात कर रहे हैं यहां। हिंदी पत्तरकारिता के शशि शेखर तो आज में मस्केबाज़ी के लिए विख्यात थे। पर हिंदी पत्तरकारिता के रणविजय सिंह? आज में संवाद सूत्र थे और राजनाथ सिंह सूर्य के विकट चंपू। बाद में राजनाथ सिंह आज से दैनिक जागरण, स्वतंत्र भारत हुए। पर रणविजय आज में ही रह गए। आज में एक मैनेजर थे दिनेश श्रीवास्तव। गोरखपुर के थे सो गोरखपुर के लोगों का खास ख्याल रखते थे। तो लखनऊ में भी संपादक बनाया गोरखपुर के तड़ित कुमार को। समाचार संपादक बनाया गोरखपुर के ही उपेंद्र मिश्र को। दोनों ही लोग पढ़े लिखे लोग थे। वाम विचारधारा से लैस। लेकिन रणविजय सिंह की कोई विचारधारा नहीं थी। लेकिन समय को तड़ लेना और मस्केबाज़ी में प्रवीणता भरपूर थी शुरू से। अब भी है। तो आज में उपेंद्र मिश्र को उन्हों ने साध लिया। उनके बच्चों को स्कूल ले जाना, सब्ज़ी-दूध लाना तक के काम बाखुशी करते रहे। संवाद सूत्र से रिपोर्टर बन गए। नवंबर, १९८९ में अयोध्या गए  रिपोर्टिंग के लिए। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तब। एक बयान दिया कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता और अयोध्या की चौतरफ़ा नाकाबंदी करवा दी। लेकिन विश्व हिंदू परिषद वालों ने मुलायम के बयान पर न सिर्फ़ पानी फेर दिया बल्कि विवादित ढांचे के गुंबद पर चढ़ कर भगवा झंडा भी फहरा दिया। सभी पत्रकार और फ़ोटोग्राफ़र मौके पर थे। फ़ोटो भी खिंच गई। पर रणविजय सिंह और उनका फ़ोटोग्राफ़र उस वक्त सो रहे थे। रणविजय और उनके फ़ोटोग्राफ़र ने कई फ़ोटोग्राफ़रों से नौकरी का वास्ता देकर फ़ोटो मांगी। सबने इंकार कर दिया। देते भी तो कैसे लोग भला? क्योंकि पुलिस ने सबके कैमरे से रील निकाल ली थी। कैमरा तोड़ दिया था।

खैर रणविजय सिंह ने किया यह कि विवादित ढांचे की एक पुरानी फ़ोटो तलाशी और उस पर खुद ही पेन से झंडा फहरा दिया। और मज़ा देखिए कि वाम रुझान वाले संपादक और समाचार संपादक ने वह फ़र्ज़ी फ़ोटो आज अखबार में छाप दी। दूसरे दिन लखनऊ से छपने वाले तमाम अखबारों में विवादित ढांचे पर झंडा फहराने की खबर तो छपी लीड बन कर पर फ़ोटो जो कि निश्चित ही एक्स्क्लूसिव थी, वह सिर्फ़ आज अखबार में ही छपी। हाथ से बनाए गए झंडा फहराने की फ़ोटो। अब तमाम लोगों ने तो इस फ़ोटो का मज़ा लिया लेकिन मुलायम सिंह यादव आग बबूला हो गए। सीधे आज के मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त को तलब कर लिया।

शार्दूल तब रियल स्टेट में हाथ पांव खोल रहे थे। सो मुलायम के आगे बिलकुल घुटनों के बल लेट गए। मुलायम के पास से ही फ़ोन कर के संपादक, समाचार संपादक और रिपोर्टर रणविजय सिंह को तुरंत बर्खास्त करने का ऐलान कर दिया। करे कोई, भरे कोई वाली बात हो गई।

रणविजय सिंह का किया धरा तड़ित कुमार और उपेंद्र मिश्र को भी भुगतना पड़ा, बेरोजगार हो कर। बाद में यही दिनेश श्रीवास्तव मैनेजर हो कर सहारा में आ गए तो उपेंद्र मिश्र को भी सहारा में ले आए। और उपेंद्र मिश्र रणविजय सिंह को ले आए सहारा में। उपेंद्र मिश्र अपने समय के जीनियस हैं। उनकी शार्पनेस का कोई जवाब नहीं है आज भी। तब के दिनों सहारा में उपेंद्र मिश्र की तूती बोलती थी। लखनऊ यूनिट खुली तो वह लखनऊ आ गए। समय इधर-उधर हुआ। कई संपादक आए-गए। एक बार उपेंद्र मिश्र का भी नंबर आ गया संपादक बनने का। लेकिन उन्होंने धीरे से अपना कदम वापस ले लिया। और अपने चम्मच रणविजय सिंह को संपादक बनवा दिया। उनसे उनके एक मित्र ने पूछा भी तब कि यह क्या किया आप ने? तो वह बोले सब कुछ मैं ही देखता हूं, देखूंगा भी। इसको तो बस पांव छूने, यहां वहां दौड़ने आदि के लिए संपादक की कुर्सी दिलवा दी है क्योंकि यह सारे काम मेरे वश के नहीं। तबके दिनों उपेंद्र मिश्र और रणविजय सिंह की जोड़ी चाणक्य और चंद्रगुप्त  नाम से सहारा में जानी जाती थी। लेकिन चंद्रगुप्त  ने जल्दी ही औरंगज़ेब बन कर चाणक्य को 'शिफ़्ट' कर दिया। सहारा से अचानक बाहर हो कर चाणक्य हतप्रभ रह गए। तबसे अब तक हतप्रभ हैं। १७ कि १८ साल से बिना नौकरी के हैं यह चाणक्य। छोटे-मोटे काम करते रहते हैं, अपनी खुद्दारी बटोरे रहते हैं। लोग उन्हें सुनाते रहते हैं, गुरु गुरुवै रहि गइलैं, चेला चीनी हो गइलैं। सुन कर वह पान चबाते हुए मंद-मंद मुस्कुराते रहते हैं।

और चंद्रगुप्त? हिंदी के संपादकों का सारा रिकार्ड ध्वस्त किए चक्रवर्ती बने बैठे हैं। लिखने दो लाइन नहीं आता पर हर हफ़्ते फ़ोटो सहित लेख छपता है। जाने कितने लोग उनके लेख लिखते रहते हैं। भीतर से भी, बाहर से भी। एक बार तो कंवल भारती की किताब कांशीराम के दो चेहरे से एक लेख उड़ा कर छाप लिया अपने नाम से। मुलायम को खुश करने के लिए।  कंवल भारती ने बड़ा बवाल किया। पर अपना चंद्रगुप्त पैर छूने, माफ़ी मांगने पलटी मारने आदि में उस्ताद है। कंवल भारती ने भी माफ़ कर दिया। बस हुआ यह भी कि तब हर हफ़्ते कंवल भारती के लेख भी सहारा में छपने लगे। अधिकतम पारिश्रमिक पर। तब जब लोगों को सौ या दो सौ रुपए मिलते थे एक लेख के, कंवल भारती को तब एक हज़ार रुपए मिलने लगे।

लोग बताते हैं कि चंद्रगुप्त  यानी रणाविजय सिंह के लिए अब कई बड़े नाम भी लेख लिख देते हैं। बाकी उनके लिखने का अगर जायजा लेना ही हो तो अजय विद्युत ने फ़ेसबुक पर उनकी चारणगाथा में जो कुछ भी लिखा है, दिलचस्प यह कि उस पर पहला ही कमेंट रणविजय सिंह का है। पराड़कर के बराबर बैठा दिए जाने से वह गदगद भी बहुत हैं। तभी तो आकुल भाव में टिप्पणी कर गए। अब यहां चूंकि खुद ही लिख गए सो अपने ज्ञान का भी परिचय अनायास ही दे गए हैं। आप भी चाहें तो इस का ज़ायका ले सकते हैं।


Ranvijay Singh itni bedna kyu ? aisi hi padayi hai

Wednesday at 7:34pm · Like


सोचिए कि जनाब समूह संपादक हैं बरसों से। जाने कितनों के भाग्य-विधाता हैं पर 'वेदना' और 'बेदना' का फ़र्क नहीं जानते। 'पढ़ाई' शब्द भी ठीक से रोमन में नहीं लिख सकते। उनको फ़ेसबुक आपरेट करने के लिए भी किसी को रख लेना चाहिए। नहीं ऐसे ही भद पिटती रहेगी। अजय विद्युत जैसे चंपू भी यशगाथा लिख कर कुछ भला नहीं कर पाएंगे। जोड़-तोड़ कर के नौकरी करना, दलाली करना, चरण चूमना, स्कूल चला लेना, विधायक और सांसद निधि से पैसा बटोर लेना  और बात है, लिखना- पढ़ना और बात है।

अजय विद्युत जैसे चंपुओं के लिख देने से वह सचमुच पराड़कर क्या पराड़कर के नाखून भी नहीं हो पाएंगे। हां लाख टके का वह सवाल तो रह ही गया है कि क्या अजय विद्युत को शशि शेखर या रणविजय सिंह ही सही नौकरी दे कर उपकृत कब करेंगे? आखिर इन दोनों लोगों को पराड़कर बता कर खुद भी तो बिचारे अजय विद्युत चंदरवरदाई  बन ही गए हैं। अब अलग बात है कि अजय विद्युत की इस मस्काबाज़ी पर बहुत लोगों ने प्रत्यक्ष रुप से नोटिस नहीं ली है लेकिन विद्युत ने बताया है अपने कमेंट में कि कई लोगों ने उन से मेसेज़ बाक्स में कहा है। अब क्या कहा है इस का खुलासा उन्हों ने नहीं किया है।

उनके एक पर्वतीय भाई हैं विपिन कुमार बहुगुणा । इन बहुगुणा ने विद्युत की लंबी क्लास ली है और उन्हें दौड़ा लिया है। लेकिन विद्युत चिकने घड़े बने हुए हैं अपने जवाब में और पूरी बेशर्मी से कह रहे हैं कि आप ने इतना ध्यान दिया इस के लिए शुक्रिया। जो भी हो चंदरवरदाई के इस उपक्रम से उन का भला कब होता यह देखना बाकी है पर पराड़कर की आत्मा कितना रो रही होगी इस सब से, यह तो वही जनती होगी। फ़िदा तो और लोग भी होंगे पर  शीर्ष पर बैठी दो कुर्सियों से कौन पंगा ले यह भी एक बड़ा प्रश्न है।

आखिर विद्युत को अगर नौकरी चाहिए तो और लोगों को भी तो नौकरी करनी है या पानी है। नौकरी का पानी बहुतों को मारे हुए है और नपुंसक बनाए हुए है। इस पर एक गाना भी है कि ज़माने ने मारे हैं जवां कैसे-कैसे… तो यहां तो नौकरी ने क्या बूढ़े, क्या जवान, सबकी मार रखी है। जियो, पराड़कर के समकक्षों जियो। पराड़कर जी पुक्का फाड़ कर भी रोएं इस सब पर तो रोएं आप सबकी बला से। आप तो बस जियो…. हिंदी पत्तरकारिता करो और धूमधाम से…..


अजय विद्युत के स्टेटस पर विपिन कुमार बहुगुणा की टिप्पणी पढ़िए–

'क्या अजय भाई, आप भी नौकरी बचाने की खातिर किस दर्जे तक जा रहे हैं'

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