Vipin Kumar Bahuguna : क्या अजय भाई। आप भी नौकरी बचाने की खातिर किस दर्जे तक जा रहे हैं। बाबूराव पराड़कर के बहाने किसकी तस्वीर लगा रहे है। एक राजा ने अपनी जान बचाने के लिए गुहार लगाई थी – बाज पराए पानि परे, तू पच्छिन न मार- क्या लाभ हुआ था। मेरी सलाह मानें, निर्भय बने। कभी ऐसा लगता है कि दुनियां यहीं तक सीमित है, पर ऐसा है नहीं।
मैं भी 36 साल तक उस संस्थान में रहकर यही सोचता रहा। निजाम बदले और मैंने भी मन मार कर एक आध बार ठकुरसुहाती कह कर नौकरी बचाने का प्रयास किया। पर जब बाहर निकला तो देखा कि आसमान असीमित है और जाने कितने आसमान और भी हैं। मैंने हिंदुस्तान में गोपाल प्रसाद व्यास का सानिध्य लाभ हासिल किया है। जो सुनाते थे- हम अंग्रेजों के राज में रात को अखबार में जो लिखकर जाते थे, उसके लिए हमें मालूम होता था कि दूसरे दिन जब ड्यूटी पर पहुंचेंगे तो पुलिस का सिपाही थाने ले जाने के लिए बैठा मिलेगा।

और दूसरे दिन हम बाकायदा आते और थाने जाकर कुछ दिन जेल की रोटी तोड़ते थे। आप उसी अखबार में हैं और नौकरी बचाने की जुगत में लगे हैं। मानता हूं कि अब ये अखबार वो नहीं रहा पर प्रतिष्ठा तो कहीं समय के पर्वतसंधि के गह्वरों से आवाज देती नजर आती है। फिर आप पराड़कर पढ़ा रहे हो, क्या सापेक्षता रह गई है पराड़कर की आज। आज मीडिया का हाल जानने के बाद भी आप जाने किसको क्या पढ़ाना चाह रहे हैं। आज अखबार को ही लें। जो सम्मान किसी जमाने में था आज का, आज है क्या। और ईमानदारी से बताएं आज कौन पत्रकारिता का स्तंभ नजर आ रहा है। गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता है- जरा गौर फरमाएं…
हमारी भूल गलती
आज बैठी है
जिरहबख्तर पहनकर
तख्त पर दिल के
चमकते हैं खड़े हथियार उसके
दूर तक
आंखे चिलकती हैं
नुकीले तेज पत्थर सी
खड़ी हैं सब कतारें
दरबारे आम में
बेबस सलाम में।
विपिन कुमार बहुगुणा ने ये प्रतिक्रिया अजय विद्युत के फेसबुक स्टेटस पर दी है. अजय विद्युत ने ऐसा क्या लिखा कि विपिन कुमार बहुगुणा को ये प्रतिक्रिया देनी पड़ी, जानने के लिए यहां क्लिक करें–
शशि शेखर और रणविजय को पराड़कर के समक्ष बिठा दिया अजय विद्युत ने!






