Yashwant Singh : कमजोर चेतना वाली बेचारी जनता मजबूत दिखने वाले चतुर-सुजान को हीरो मान लेती है. माफियाओं, बाहुबलियों, दबंगों, धनपशुओं आदि का उनके इलाके में खूब जलवा देखने को मिलता है. जनता इनमें अपनी समस्याओं का हल देखने लगती है, मस्तक झुकाने लगती है, हाथ जोड़ रिरियाने लगती है. रामायण-महाभारत से ओतप्रोत-लोटपोट जनता खुद के अंदर भगवान नहीं बल्कि किसी भरे-पूरे भगवान के अवतार के इंतजार में मरी जाती है, दुखों के खात्मे के लिए अवतारियों के प्रकटने का आह्वान करती रहती है…
पर जरूरी नहीं जो मजबूत हो, हीरोइक हो वह भगवान ही हो. राक्षसों में भी ठीक यही गुण पाए जाते हैं.. बस, राक्षस रात में चुपके से जनता के बीच से एक सुंदर नर और एक सुंदर नारी को उठा ले जाता है.. फिर उनका चुपके से भक्षण-शोषण करता है. ज्यादातर जनता इसलिए चुप रहती है कि क्योंकि हर दफे उनका घर सुरक्षित रह जाता है, इसलिए उनके लिए जो हुआ सो हुआ, उनका घर तो बचा.. और, राक्षसजी के पक्ष में यह तर्क भी गढ़कर मन को मनाती है कि राक्षसजी इतना हम सबके लिए करते हैं तो उनका भी तो कुछ हक बनता है हमसे लेने का, तो यही सही…
गुलाम प्रथा से लेकर राजा-प्रजा प्रथा के दौर से बौद्धिक रूप से अब भी बंधे-फंसे हुए हम लोग फिर फिर किसी में नायक देख कर उसके लिए तालियां पीटने में लगे हैं.. जय जय वाह वाह बाकियों की हाय हाय… करने में लगे हैं…
नर, नारी, नारे, हारे, बेचारे… सब कुछ सेम है, पहले जैसा है.. बस चेहरा और समय बदला है…
चोरों और शोषकों से उबे हम लोग नए किस्म के रंगे सियारों, ज्यादा धूर्त शोषकों को अपना सिरमौर बनाने को आतुर हैं और उनके संभावित आगमन को लेकर मंगलगान गाए जा रहे हैं…
अपन चुप हैं. तब भी, अब भी, कल भी… इसलिए नहीं कि मुझे नहीं पता कि समय कहेगा उनका भी अपराध जो तटस्थ है… इसलिए कि समय काल में चल रहे नाटकों नारेबाजियों की लघुता, ओछेपन व उसके ओरछोर की महत्वहीनता समझने के बाद इन नाटकों में किसी भी रूप में शामिल रहना ज्यादा बड़ा अपराध है, और इनसे तटस्थ होने के लिए तैयार हो जाना ज्यादा बड़ी मुक्ति…
पर, कमजोर चेतना वालों को मुक्ति कहां.. वे श्रापित हैं, अपने शोषकों का अपने हाथों राजतिलक कराने के लिए.. यही शायद इस युग का श्राप है और इसीलिए यह कलियुग है… पर जैसा कि प्रकृति का नियम है, हर बुरे में कुछ अच्छा छिपा होता है, हर ध्वंस में कुछ नया निर्माण का बीज होता है, सो, संभव है, कुछ नया होने वाला है…
उस दूर खड़े नए के स्वागत के लिए तैयार हूं मैं.. उस दूर खड़े तक पहुंचने के लिए किन किन रक्तरंजित नदियों-समुद्रों-तालाबों को पार करना होगा, किन-किन गैस चेंबरों, जेलों, आहों-कराहों को झेलना-सुनना होगा… किस किस तरह की दुर्गंध-बदबुओं का सामना करना होगा… यह सब काल के गाल में है… शायद उनको पता हो जो अवतारों के हकीकत में बदलने का आह्वान कर रहे हैं, मंगल गान गा रहे हैं, तालियां बजा रहे हैं, नारे लगा रहे हैं, हर्षित-पुलकित हो नए रोमांच का अनुभव कर रहे हैं… शायद वो मजबूत चेतना वाले हों, और अपन कमजोर … शायद वो देव मंडली के सेनानी हों, अपन राक्षस. शायद वो सही रास्ते पर चल रहे हों, अपन गलत… शायद, हर कुछ इसका ठीक उलटा भी हो…
या ये भी हो कि कोई ओर छोर न हो, सब एक राह एक नाव पर चल रहे हों, अपने अपने हिसाब से हिचकोले खाते हिलते-डुलते हुए पर उसी नाव में बैठे जिसकी गति सटीक राह पर खूब तेज बिलकुल सही हो…
बुतों में फंसे हुए लोग, शब्दों को गांठ बांध कर उसी के इर्द-गिर्द पगलाए लोगों को क्या पता कि वो है बदलते हुए रुतों में, वो है दिल से निकले सच्चे लफ्जों में… वो है जो दिखता नहीं, उन कणों में… वो है चुप खड़े पहाड़ वृक्षों में… वो है सन्नाटे के अंदर बह रहे मंत्रों-गीतों में..
पर पागल उत्तेजित सनकी हुई पड़ी जानवरों में से एक मनुष्य नामक प्रजाति को क्या समझाए कौन समझाए कि इस धरती की धरा के कण-कण पर कब्जा जमाए तुम मनुष्यों और बाकी जानवरों को विस्थापित मृत करने पर आमादा तुम मनुष्यों का नाश या निर्माण कोई दूसरा नहीं, खुद तुम ही लोग करोगे… अभी जहां हो, जिसे अपनी उपलब्धि बता रहे, वह ठीक से देखो तो विनाश का सूत्र भी समेटे है… और, इस सूत्र फार्मूले को आगे तुम लोग ही बढ़ाओगे…
इसलिए, मंगलगान गाओ.. मैं सोच रहा हूं कि यह मंगल के लिए है या अमंगल के लिए… फिर सोचते सोचते सोचूंगा कि जो अंततः घटित होगा वह न मंगल होगा न अमंगल, वह कायनात, ब्रह्मांड, यूनीवर्स, संसार, अंतरिक्ष, पाताल, चांद, तारे, सूरज के आपसी सुर-लय-ताल का मद्धम या उच्च संगीत होगा जिसे हम नादान हाहाकार या मंगलगान मान लेते हैं…
चलते रहो बालकों, बढ़ते रहे लाडलों.. बिना जाने कि जाना कहां है, चलना क्यों है… अपन तो न जाएंगे, न चलेंगे, बैठे रहेंगे.. बैठे ठाले… बेकार, ठलुआ, आलसी, निष्क्रिय, निस्पृह, निर्जीव सा होकर तेरी दुनिया में होते हुए भी ना हुए सा जिएंगे…
मुझे अब किसी हीरो की तलाश नहीं… मुझे अब अपने जैसे काहिलों का आस है..
जय हो…

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