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वाह! कसम खाकर भी शशि शेखर ही छाप सकते हैं पेड न्‍यूज, प्रमाण देखें

अखबारों के पन्‍नों पर सुचिता, ईमानदारी, निर्भीक पत्रकारिता को लेकर बातें बहुत लंबी लंबी करते हैं बड़े-बड़े संपादक तथा मालिक. ऐसा लगता है कि इनके अलावा अब कोई पत्रकार ईमानदार बचा ही नहीं है. ये ईमादारी की अंतिम पायदान हैं, इसके बाद तो बस बेईमान ही बेईमान भरे पड़े हैं. ऐसे मीडिया घराने और उनके संपादक अपने काले चेहरे पर सफेदी लगाकर बैठते हैं और कंबल ओढ़कर घी पीते हैं.

अखबारों के पन्‍नों पर सुचिता, ईमानदारी, निर्भीक पत्रकारिता को लेकर बातें बहुत लंबी लंबी करते हैं बड़े-बड़े संपादक तथा मालिक. ऐसा लगता है कि इनके अलावा अब कोई पत्रकार ईमानदार बचा ही नहीं है. ये ईमादारी की अंतिम पायदान हैं, इसके बाद तो बस बेईमान ही बेईमान भरे पड़े हैं. ऐसे मीडिया घराने और उनके संपादक अपने काले चेहरे पर सफेदी लगाकर बैठते हैं और कंबल ओढ़कर घी पीते हैं.

मामला हिंदुस्‍तान से जुड़ा हुआ है. चुनावों के दौरान कॉलम लिखकर पत्रकारिता की सुचिता की बड़ी बड़ी कसमें खाने वाले तथा पेड न्‍यूज ना छापने का घंटा बजाने वाले शशि शेखर के अखबार ने रुड़की में खुद को गिरवी रख दिया. जब विरोध के स्‍वर फूटने लगे तो अखबार को स्‍पष्‍टीकरण भी छाप कर खुद के थूके को चाटना भी पड़ा. रुड़की में हिंदुस्‍तान अखबार ने 27 अप्रैल को कांग्रेस की एक रैली को लेकर खबर छापी, जिसका शीर्षक दिया 'कांग्रेस की रैली में उमड़ा जनसैलाब'. इस खबर में कहीं इस बात का जिक्र नहीं किया गया कि यह खबर नहीं विज्ञापन है.

जब अखबार में टॉप पर प्रकाशित कॉलम में खबर देखने के बाद भाजपाई विरोध करने लगे और इसकी शिकायत करनी शुरू कर दी. खबर देखने से ही लग रहा था कि यह पेड न्‍यूज है. पत्रकारिता को शर्मसार करते हुए खबर की बजाय पेड न्‍यूज छापा गया. और यह काम किया लंबी लंबी फेंकने वाले शशि शेखर के अखबार हिंदुस्‍तान ने. हालांकि पता नहीं इसके अलावा भी हिंदुस्‍तान में कितनी खबरें कितने एडिशनों में पेड न्‍यूज के रूप में छापी जा रही हैं. इसका भी कोई हिसाब किताब करने वाला नहीं है. दैनिक जागरण तो पेड न्‍यूज छापने के लिए बदनाम ही है लेकिन हिंदुस्‍तान भी कंबल ओढ़कर घी पी रहा है.

खैर, जब इस खबर को लेकर विरोध के स्‍वर उठने लगे तो हिंदुस्‍तान अखबार को अगले दिन स्‍पष्‍टीकरण प्रकाशित करनी पड़ी. अपने स्‍पष्‍टीकरण में अखबार ने लिखा कि कांग्रेस की प्रकाशित खबर मीडिया इनेसिएटिव था, यानी पैसे लेकर यह खबर प्रकाशित की गई थी यानी पेड न्‍यूज थी. इसके बाद से तो इस अखबार के नाम पर जमकर थू थू हुआ. साथ ही आसानी से समझा जा सकता है कि जब चुनाव नजदीक में नहीं हैं और पेड न्‍यूज प्रकाशित हो रहे हैं तो चुनाव के दौरान ये कथित अखबार और मीडिया संस्‍थान किस तरीके से आम पाठकों को धोखा देते होंगे.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन पर कार्रवाई कौन करेगा. पेड न्‍यूज छपवाने वाले की विधायकी जा सकती है लेकिन पेड न्‍यूज छापने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है. अपने काटजू साहब संजय दत्‍त को छुड़वाने में परेशान हैं, छुड़वाने के बाद वहां से समय बच गया तो निचले स्‍तर के पत्रकारों को पढ़ाई करवाएंगे. इससे भी समय बच गया तो इनके उनके फटे में टांग अड़ाते फिरेंगे. कभी जेटली से भिड़ेंगे कभी मोदी से भिड़ेंगे, पर हां जिस काम के लिए पीसीआई में लाए गए हैं वो नहीं करेंगे. और किसी की औकात भी नहीं है कि इनसे वो काम कोई करा ले. तो भाई अब पत्रकारिता के तो भगवान ही मालिक हैं.. या फिर बड़े मीडिया घराने. आप भी देखिए हिंदुस्‍तान की कारामात..

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