Utkarsh Sinha : राजनाथ सिंह एक चतुर खिलाडी साबित हुए। राजनाथ को पता है की जब तक अडवानी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह सरीखे बुजुर्ग नेता सक्रिय रहेंगे तब तक उन्हें पार्टी की दूसरी पीढ़ी का नेता ही कहा जायेगा। साथ ही साथ राजनाथ सिंह का अपना खुद का कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में मोदी को आगे करके उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे। पहला निशाना पार्टी के पहली पीढ़ी के नेताओं पर था जिन्हें अलग थलग करके हाशिये पर डालने में वे कामयाब हो गए हैं।
अब दूसरा निशाना मोदी के लोकप्रियता की लहरों पर सवार हो कर आने वाले चुनावों में पार्टी की सीटें बढ़ाना है। वे ये बात अच्छी तरह जानते हैं की पूर्ण बहुमत न होने की दशा में उनके सहयोगी दल मोदी को प्रधान मंत्री बनाने पर राजी नहीं होंगे। ऐसे में उनके नाम की लाटरी खुल सकती है। और ताज़ा हालत तो यही बता रहे हैं की मोदी के बाद भी भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने वाला। अब राजनाथ की दूसरी कोशिस मोदी को उत्तर प्रदेश की किसी सीट से चुनाव लड़वाने की होगी। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। मोदी के करीबी अमित शाह को उन्होंने महासचिव बना कर उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया है।
ये वही अमित शाह हैं जिन पर गुजरात में सोहराबुद्दीन के फर्जी इन काउंटर का केस चला था और गोधरा के दंगों में भी इनका नाम आया था। आडवाणी के सक्रिय रहते राजनाथ की स्वीकार्यता नहीं बन सकती थी और इसीलिए गोवा अधिवेशन को उन्होंने पार्टी में मोदी बनाम अडवाणी की लड़ाई बना दिया। अब जब की मोदी की ताजपोशी हो गयी है आडवाणी के फिर से सक्रिय भूमिका में लौटने की संभावनाएं कम हो गयी है और इसके साथ ही पार्टी में अडवाणी युग की समाप्ति का संकेत मिलना शुरू हो गया है।
वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट उत्कर्ष सिन्हा के फेसबुक वॉल से.





