भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया की फैलती चादर में राजनीतिक दलों ने भी पाँव डालने शुरु कर दिए हैं. हो भी क्यों न, इसका इस्तेमाल करने वालों में अधिकतर युवा लोग हैं और ज़ाहिर है युवाओं तक पहुंचने के लिए हर संगठन और संस्थान इंटरनेट-सोशल मीडिया का सहारा ले रहा है. अगर आँकड़ों की बात करें तो इस समय भारत में 13 करोड़ से अधिक इंटरनेट कनेक्शन हैं जिनमें से साढ़े छह करोड़ से अधिक लोग फेसबुक पर हैं.
यह संख्या लगातार बढ़ ही रही है जिसका अंदाज़ा इस बात से लग सकता है कि फ़ेसबुक के इस्तेमाल में भारत, अमरीका के बाद दूसरे नंबर पर है. स्कूल, कॉलेज हों या विज्ञापन देने वाली बड़ी-छोटी कंपनियां- हर कोई सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहा है युवा लोगों तक पहुंचने के लिए. हर राजनीतिक दल सोशल मीडिया के लिए अपनी अपनी रणनीति तय कर रहा है.
ताक़त का अंदाज़ा
राजनीति और सोशल मीडिया का रिश्ता थोड़ा नया सा है. अगर याद हो तो इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने फेसबुक के ज़रिए एक बड़ी आबादी को भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे से जोड़ा था और फिर बात बढ़ती ही चली गई. इस आंदोलन के बाद एक तरह से सोशल मीडिया की ताकत का अंदाज़ा लगा नेताओं को. जिसके बाद नरेंद्र मोदी का गूगल हैंग आउट हो या फिर ट्विटर पर बड़े नेताओं की उपस्थिति. फेसबुक पर राजनीतिक दलों के पन्ने हों या फिर यू-ट्यूब पर तृणमूल का अपना चैनल. लोगों को राजनीतिक दलों से जोड़ने की कोशिश जमकर हो रही है.
चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या फिर सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी पैठ बनाने वाली आम आदमी पार्टी हो, सबने रणनीति बनाई है. छोटे दलों ने भी धीरे-धीरे अपने पैर पसारे हैं सोशल मीडिया पर. पिछले दिनों आईआरआईएस नॉलेज फाउंडेशन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कम से कम 160 लोकसभा क्षेत्रों में सोशल मीडिया उम्मीदवारों की जीत या हार तय करेगा. हालांकि इसके बारे में कोई पूरे भरोसे के साथ कुछ नहीं कह सकता लेकिन कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि सोशल मीडिया की कोई न कोई भूमिका ज़रुर होगी अगले चुनाव में.
वोट में होंगे तब्दील?
सोशल मीडिया पर कई मुद्दों को लेकर लोग राय बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसका फ़ायदा उठाने की कोशिश राजनीतिक दल भी कर रहे हैं. लाइक, रीट्वीट, कमेंट, शेयर और टैगिंग के दौर में असल क्या बचेगा. क्या ये बातें वोट में बदलेंगी या नहीं ये कहना तो मुश्किल है. बदलती विचारधाराओं के अंतर्जाल में राय और मुद्दे बदलते जा रहे हैं और इसका फायदा राजनीतिक दलों को कैसे हो पाएगा ये जानना भी रुचिकर होगा.
वैसे फेसबुक या ट्विटर पर मौजूद लोग मुद्दों के बारे में किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं? क्या मुद्दों से सहमति वोट में बदलती है? सहमति और प्रतिबद्धता में क्या कोई समानता है? इन्हीं के मद्देनज़र हम अगले चार दिनों में आपके लिए लेकर आएंगे जानकारी विभिन्न दलों की सोशल मीडिया उपस्थिति और उनकी रणनीति के बारे में. चाहे कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे बड़े दल हों या फिर आम आदमी जैसी छोटी पार्टी हो, वो एक रणनीति के तहत काम कर रहे हैं. (बीबीसी)





