Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

प्रिंट-टीवी...

यह पत्रकारिता का स्वर्ण युग है : दिलीप मंडल

: मीडिया विमर्श शृंखला में इंडिया टुडे के संपादक ने पत्रकारिता की नई चुनौतियों के प्रति आगाह किया : आज स्त्री खुलकर बोल रही है- पंकज सिंह : अखबार का काम है, लोक भावना जानना और प्रकट करना- अरुण त्रिपाठी : आगरा। ''मैं अपने को एक संवादकर्मी ही मानता हूं। आंदोलनों के संस्कारों से निकला हूं। यह दौर भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम युग है, यह बात लोगों को सुनने में अजीब लग सकती है। पर मुख्य धारा की पत्रकारिता आज अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में है, पचास साल पहले के अखबारों को आप देखेंगे तो आपको इसका बोध होगा। उस समय भी गांधी और अंबेडकर की वैकल्पिक पत्रकारिता की एक दूसरी धारा थी जो ज्यादा समर्थ थी पर वह मुख्यधारा नहीं थी। आज भी उस पत्रकरिता को लघुपत्रिकाएं अपने ढंग से आगे बढा रही हैं।  आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता को बनाए रखने की है।''  ये विचार कल्पतरु एक्सप्रेस द्वारा मीडिया विमर्श शृंखला के तहत शनिवार को आयोजित व्याख्यान में इंडिया टुडे साप्ताहिक पत्रिका के संपादक दिलीप मंडल ने व्यक्त किए।

: मीडिया विमर्श शृंखला में इंडिया टुडे के संपादक ने पत्रकारिता की नई चुनौतियों के प्रति आगाह किया : आज स्त्री खुलकर बोल रही है- पंकज सिंह : अखबार का काम है, लोक भावना जानना और प्रकट करना- अरुण त्रिपाठी : आगरा। ''मैं अपने को एक संवादकर्मी ही मानता हूं। आंदोलनों के संस्कारों से निकला हूं। यह दौर भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम युग है, यह बात लोगों को सुनने में अजीब लग सकती है। पर मुख्य धारा की पत्रकारिता आज अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में है, पचास साल पहले के अखबारों को आप देखेंगे तो आपको इसका बोध होगा। उस समय भी गांधी और अंबेडकर की वैकल्पिक पत्रकारिता की एक दूसरी धारा थी जो ज्यादा समर्थ थी पर वह मुख्यधारा नहीं थी। आज भी उस पत्रकरिता को लघुपत्रिकाएं अपने ढंग से आगे बढा रही हैं।  आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता को बनाए रखने की है।''  ये विचार कल्पतरु एक्सप्रेस द्वारा मीडिया विमर्श शृंखला के तहत शनिवार को आयोजित व्याख्यान में इंडिया टुडे साप्ताहिक पत्रिका के संपादक दिलीप मंडल ने व्यक्त किए।

बदलती तकनीक के साथ मीडिया में आ रहे बदलाव और आने वाली भविष्य की नई चुनौतियों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए श्री मंडल ने कहा कि आज मीडिया इतना बढ़ गया है कि उसे मैनेज करना कठिन है। आने वाले दिनों में बहुलता बढ़ने वाली है। सूचनाओं के अनेक स्रोतों के बीच विश्वसनीय होना बहुत कठिन है। दूसरी चुनौती हमारे आडियंस के बदल जाने से हुई है। आज किसी एक अखबार, चैनल और पत्रिका का आधिपत्य नहीं हो सकता। क्या हम वास्तव में अपने पाठक को समझ पा रहे हंै और नया पाठक कौन है? इसकी पहचान करनी होगी। यह वही समय है जब हिन्दी के अखबार तेजी से बढ़ रहे हैं और अंग्रेजी के अखबारों में ठहराव है।

पाठकों की बढ़ती समझ का जिक्र करते हुए दिलीप मंडल ने कहा कि आज मीडिया स्कू्रटनी के दौर से गुजर रहा है। लोग अब मीडिया कर्म को बारीकी से परखने लगे हैं। हम सारे लोग संदेह के घेरे में हैं। इस तरह की चुनौतियां साठ-सत्तर के दशक की पत्रकारिता के समय नहीं थी। सोशल नेटवर्क ने मीडिया के काम को और आसान किया है। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय मीडिया में अकादमिक अनुशासन नहीं है जो आने वाले समय के साथ यह भी शुरू हो जाएगा। संकटों के दौर में पत्रकारिता है लेकिन अच्छे काम की गुंजाइश आज भी है। प्रतियोगिता बहुत बड़ी है और लोग बहुत सजग हैं, बहुत निर्मम हैं।

इससे पहले दिलीप का परिचय देते हुए कल्पतरु एक्सप्रेस के समूह संपादक पंकज सिंह ने कहा कि आंदोलन से निकले और कॉरपोरेट पत्रकारिता में अपनी ऊंची जगह बनाने वाले श्री मंडल ने अन्याय के विरुद्ध होने वाले संघर्षों और बदलाव की इच्छा से होने वाले आंदोलनों में पिछले तीन दशकों में निरंतर भागीदारी की है। इंडिया टुडे के सेक्स विशेषांक के संदर्भ में दिलीप की प्रतिक्रिया के साथ अपनी टिप्पणी जोड़ते हुए पंकज सिंह ने महिला सशक्तीकरण के फलस्वरूप समाज में आ रहे बदलावों पर कहा कि स्त्री यौनिकता का जो उभार आया है उसे भी सामाजिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। पुरुष और स्त्री के संबंधों में बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और इक्कीसवीं सदी के आरंभ में दुनिया भर के समाजों में स्त्रियों की जो जागृति है उसे हमारे समय की एक बड़ी अभूतपूर्व क्रांति के तौर पर देखा जाना चाहिए।

आज स्त्री खुलकर बोल रही है कि वह अपनी देह की स्वयं मालिक है और उस पर उसका अपना अधिकार है। मातृसत्तात्मक समाज के अवसान के बाद पुरुष प्रभुतावाद के  सदियों लंबे इतिहास में ऐसा होना एकदम नई परिघटना है  और आज ठीक-ठीक कोई नहीं  बता सकता कि आने वाले वर्षों में  इसके  कितने बहुआयामी परिणाम होंगे। कल्पतरु एक्सप्रेस के कार्यकारी संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा हिन्द स्वराज में गांधी जी ने कहा था कि अखबार का पहला काम है, लोक भावना जानना और उसको प्रकट करना। दूसरा काम है अपेक्षित लोक भावना पैदा करना।

तीसरा काम है , बेधड़क लोक- दोष व्यक्त करना, चाहे कितनी ही अड़चनों और मुसीबतों का सामना करना पड़े। उन्होंने कहा कि यह ऐसे शास्वत सिद्धांत हैं जो बीसवीं सदी ही नहीं इक्कीसवीं सदी में भी काम करेंगे। पत्रकारिता के उपकरण जरूर बदल रहे हैं और उसकी तेजी भी बढ़ी है लेकिन अगर वह मानवीय सरोकारों से कटेगी तो उसकी विश्वसनीयता खत्म होगी जो इस दौर की भी जरूरत है और आगे भी रहेगी। उन्होंने पत्रकारिता में बड़े घरानों के टूटते एकाधिकार और आम आदमी के हाथ में  आते औजारों को एक स्वस्थ शुरुआत बताया। इस अवसर पर कल्पतरु एक्सप्रेस मुख्यालय के सभी मीडियाकर्मी, अनेक जनपदों से आए ब्यूरो प्रमुख और अधिकारीगण उपस्थिति थे।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...