Shambhu Dayal Vajpayee : पार्टी में जबरन राजनीतिक वनवास की ओर ठेले जाने की लगातार कोशिशों से आहत शीर्षस्थ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के इस्तीफे ने भाजपा और नरेन्द्र मोदी के केन्द्र में सरकार बनाने की संभावनाओं के गुब्बारे को पंक्चर कर दिया है। अब अगर आडवाणी जी को किसी तरह मना भी लिया जाता है, हालांकि इसकी संभावनायें बहुत कम हैं, तो भी पार्टी की छवि को हो चुके नुकसान की भरपाई कठिन होगी। स्थापना के बाद से भाजपा में यह सब से बडा संकट का दौर है।
इसके और पार्टी को टूटने की स्थिति तक पहुंचाने के जिम्मेदार भी संघ, राज नाथ सिंह और मोदी ही हैं। अटल – आडवाणी की पार्टी सत्ता के लिए कुछ भी करने के लिए कम और अपने विचारों -सिद्धांतों के लिए सत्ता का रास्ता तय करने के लिए ज्यादा जानी जाती रही है। इसके विपरीत राजनाथ सिेह और मोदी समर्थकों ने आगामी आम चुनावों को लेकर ऐसी लोलुप आतुरता दिखाई है जो आडवाणी जैसे बडे नेता को अपमानित करने की रेखा तक ले जाती है। इससे भाजपा को खडा करने और जनाधार वाले पार्टी नेताओं का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है।
ध्यान देने वाली बात है कि राष्टी्य स्तर मोदी की स्वीकार्यता सिद्ध होनी अभी बाकी है। उनकी तमाम राजनीतिक चमक दमक और बहुत कुछ कुछ प्रायोजित सी लगने वाली कथित करिश्माई छवि के बावजूद बडे पैमाने पर लोग अभी उनको एक क्षेत्रीय नेता ही मानते हैं। उनका झंडा उठाये घूमने वाले अधिकाशं नेता भी इस हैसियत के नहीं हैं जो अपने दम पर लोक सभा की कुछ सीटें निकलवा सकें। इनमें खुद राजनाथ सिंह भी जो अभी कुल जमा एक या दो विधान सभा और इतने ही लोकसभा चुनाव जीते है।
राजनाथ सिंह का मोदी प्रेम भी यूं ही नहीं जागा है। इसके बहाने वह अपने लिए रास्ता बनाने की चालाक चालें चल रहे हैं। खबर है कि आडवाणी जी को इस बार चुनाव न लड़ाने का भी गुपचुप फैसला कर लिया गया है। यानी सरकार बनाने के हालात बनने पर मोदी का ही नाम रहे और और घटक दलों में उनके नाम पर सहमति न बनने पर राजनाथ सिंह स्वाभाविक विकल्प बन सकें।
वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल बाजपेयी के फेसबुक वॉल से.





