इलाहाबाद। पूर्वांचल के बुनकरों की समस्या को केंद्र में रखकर 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' सरीखा उपन्यास लिखकर चर्चा में आने वाले कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह बुनकरों की मौजूदा दुर्दशा को लेकर दुखी हैं। वे मानते हैं कि हथकरघा जैसे पेशेगत धंधे के जरिए गुजर बसर करने वाले हजारों बुनकर परिवार तंगी और बदहाली के शिकार हैं। मुफलिसी का आलम यह कि कई घरों में दो जून का चूल्हा तक नहीं जल पा रहा है। लंबी सांस लेते हुए अब्दुल बिस्मिल्लाह कहते हैं- अब तो भाई, बुनकरों की बदतर होती हालत को ध्यान में रखकर एक और 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' सरीखा उपन्यास लिखा जाना चाहिए। इसे वक्ती जरूरत भी माना जा सकता है।
जामिया मिलिया दिल्ली में छात्र-छात्राओं को हिंदी साहित्य पढ़ाने वाले वरिष्ठ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह नौ जून को इलाहाबाद में आयोजित एक संगोष्ठी में शिरकत करने आए तो 'भड़ास4मीडिया' से उन्होंने मुलाकात की। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो उनके चर्चित उपन्यास 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' से होते हुए बात बुनकरों के मसले तक आ पहुंची। अब्दुल भाई की बेबाक बातचीत और अंदाजे बयां दोनों ही गौरतलब रहे। वे बताते हैं कि – 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' उपन्यासद्ध लिखने के लिए लंबी तैयारी करनी पड़ी। पूर्वांचल के कई बुनकर बस्तियों से लेकर उनके टोले-मोहल्ले तक की खाक छाननी पड़ी। बुनकरों की दिनचर्या, उनके रहन-सहन, बोली, हंसी-मजाक करने का अंदाज से लेकर उनकी समस्याओं का न सिर्फ गहराई से अध्ययन करना पड़ा बल्कि उसे महसूस भी किया… तब कहीं जाकर झीनी झीनी बीनी चदरिया सरीखी सशक्त रचना उपन्यास के रूप में सामने आ सकी। इस उपन्यास को पाठकों ने जमकर सराहा।
कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। बाद में इस हिंदी उपन्यास के उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में भी कई संस्करण छपे। पठनीयता के संकट को चोचलेबाजी बताने वाले अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि यह सब कुछ लोगों का दिमागी फितूर हो सकता है बाकी सच यह है कि पठनीयता का कोई संकट जैसा कोई मसला नहीं है। उल्टे सवाल दागा-आपकी रचना को पाठक अगर नोटिस न लेकर उसे खरिज कर रहा है तो इसे पठनीयता का संकट नहीं माना जा सकता। पाठकों की बदलती अभिरूचि का भी ख्याल लेखकों को रखना होगा। इस पर भी सोचना होगा कि आखिर क्या वजह है पाठक किसी रचना को कायदे से नोटिस नहीं ले रहा है।
घूम फिर कर बात फिर से बुनकरों की दुर्दशा पर आकर टिक गई। वे बोले-बुनकर समुदाय दो वर्गों में बंटा नजर आ रहा है। एक वो जो वक्त के साथ खुद को बदलते गए वे तरक्की के रास्ते पर हैं। एक वो जो परंपराओं से आगे नहीं बढ़ सके। वे परेशान हैं। समस्याओं से कुछ ज्यादा ही जूझ रहे हैं। उनकी संख्या भी ज्यादा है। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि इधर, बुनकर समुदाय जागरूक हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में खासकर लड़कियों की पढ़ाई लिखाई पर वालदेन ध्यान देने लगे हैं। गार्जियंस लड़कियों को स्कूल-कॉलेज भेजकर ऊंची तालिम दिला रहे हैं। नतीजतन, इस वर्ग से भी लड़कियां डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर आदि बनकर नेम, फेम दोनों ही कमा रही हैं। वजह क्या है कि झीनी झीनी बीनी चदरिया सरीखे मजबूत भाषा शिल्प वाली सशक्त रचना आप दुबारा नहीं दे सके, जबकि ढाई दशक बीत चुके हैं और आप लेखन में सक्रिय भी हैं?
सवाल सुनते ही एकाएक गुस्साए भाई अब्दुल ने डपटा- पूरी तैयारी करके क्यों नहीं आते। पढ़कर आया करिए। अभी थोड़ी देर पहले एक पत्रकार को गलत सवाल पूछने पर कमरे के बाहर का रास्ता दिखा चुका हूं। उनके इस गुस्से के बाद माहौल जो एक बार बिगड़ा तो दुबारा बातचीत को आगे बढ़ाने लायक नहीं बन सका। ऐसे में बातचीत बीच में ही रोकनी पड़ी। चलते-चलते नमस्कार के आदान प्रदान के बीच एक वादा भी हुआ- चलते हैं, जुबान से एक धीमी आवाज निकली। अच्छा, फिर मिलेंगे सर!
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र की बिल्डिंग में सेकंड फ्लोर से नीचे साढ़ियों से उतरते समय मन में टीस और खुशी दोनों ही है। टीस इस बात की कि अब्दुल भाई को आखिर गुस्सा काहे को आया? खुशी इस बात की रही कि जो भी हो, बंदा है पूरा बिंदास। … जो मन में वो मुंह में। कोई दिखावा नहीं, कोई औपचारिकता नहीं। शायद यही है झीनी झीनी बीनी चदरिया के रचनाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह की सफेद झक्कास वाली पतली महीन चादरनुमा लेखकीय जीवन की खांटी पहचान।
इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय.





