Ila Joshi : हाल फिलहाल में दफ़्तर में हुई औपचारिक पोशाक की सख्ताई की घोषणा के मद्देनज़र आज मैं भी वैसे ही एक परिधान में ऑफिस पहंची, कमीज़-स्कर्ट-जूते…ये पोशाक मैं अपने पिछले कार्यस्थलों में भी पहन चुकी हूँ इसलिए ये सोच बैठी कि ये दफ़्तर के माहौल के अनुकूल है…मगर शाम को चाय पीने के लिए दफ़्तर के गेट से बाहर निकलते निकलते महिला गार्ड ने टोका और कहा कि "मैडम कल से आपको ये कपड़े न पहनने का ऑर्डर मिला है"..
मैं जानती हूँ कि ये उन्हें किसी ने कहने के लिए कहा था, गुस्सा तो मुझे बहुत आया और उन व्यक्ति से मिल दो बात करना चाहूंगी जिन्होंने खुद हिम्मत न कर गार्ड से कहलवाया…अब ये बताइए कि उसी नियमावली में साड़ी एक औपचारिक परिधान है, वही साड़ी जिसमे एक औरत का पेट, कमर और अक्सर क्लीवेज भी दिखाई देती है, क्या मेरी स्कर्ट उस साड़ी से ज़्यादा उत्तेजित कर रही थी…आज आपको मेरे स्कर्ट पहनने से दिक्कत है कि वो दफ़्तर के माहौल के हिसाब से अनुकूल नहीं है, कल सब औरतों को बुर्का पहनकर आने का नियम बना देना लेकिन क्या उससे दूषित मानसिकता को साफ़ कर पाओगे…
एक कहावत है कि इलाज से परहेज़ बेहतर लेकिन वो हर जगह लागू नहीं होता…बालात्कारी और व्याभाचारी मानसिकता कपड़ों के अन्दर मौजूद जिस्म को भी क्षत-विक्षत कर देती है तब आपके ये सारे नियम रूपी परहेज़ धरे के धरे रह जायेंगे और आप बस औरतों के शरीर ढकते रहना…मेरी मित्रसूची में मेरे कुछ सहयोगी और वरिष्ठ पद के लोग भी हैं जो मेरी उपयुक्त पोस्ट और इस विचार से कतई असहमत नहीं होंगे कि विचारों और नीयत के साफ़ होने का आपके कपड़ों से कोई लेना देना नहीं है…आप जितने नियम थोपेंगे उसके चौगुने विद्रोह के लिए तैयार रहिये!!
इला जोशी के फेसबुक वॉल से.





