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जब संपादक गण अपने स्ट्रिंगरों से पैसा लेकर डकार जाएं तो क्या ईमानदार पत्रकार चुप रहे?

Shambhunath Shukla : फेसबुक पर लिखते रहने के कारण अपने मित्रों, रिश्तेदारों और परिवार के लोगों ने कुछ पोस्ट पर आपत्ति जताई है। मैं इसे इसलिए शेयर कर रहा हूं कि लोग बताएं कि मैं गलत हूं या वे कुछ मुगालते में हैं।

Shambhunath Shukla : फेसबुक पर लिखते रहने के कारण अपने मित्रों, रिश्तेदारों और परिवार के लोगों ने कुछ पोस्ट पर आपत्ति जताई है। मैं इसे इसलिए शेयर कर रहा हूं कि लोग बताएं कि मैं गलत हूं या वे कुछ मुगालते में हैं।

1. मैं नरेंद्र मोदी का विरोधी क्यों हूं? मैं हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद का विरोधी क्यों हूं? जबकि मैं संस्कृत, पाली, बृज, अवधी व हिंदी का जानकार हूं।

– अब इसका जवाब क्या यह दूं कि संस्कृत अथवा अन्य प्राच्य भारतीय भाषाएं क्या ढक्कन और डब्बा लोगों की ही भाषाएं हैं कि मैं अपनी द्वंदात्मकता के उछाह पर ढक्कन बंद कर दूं।

2. मैं हिंदी पत्रकारों की निंदा क्यों करता हूं? और जब मैं स्वयं अखबारों का संपादक रहा हूं तब क्यों नहीं बोला।

– जिस क्षेत्र में मैने काम किया है उसी के बारे में अच्छी ंतरह जानता समझता हूं इसलिए सब पता है। और जब भी अवसर मिले अन्याय व गलत बात का विरोध करना चाहिए।

3. मैं यह क्यों लिखता हूं कि हिंदी पत्रकारिता में पैसा नहीं है। मसलन मुझे चार महीनों में मात्र ३ हजार रुपये की आमदनी हुई है?

– तो भैया मैं क्या यह लिख दूं कि हिंदी में पैसा बहुत है बशर्ते आप बीट के सिपाही या अधिक से अधिक किसी थानेदार की तरह व्यवहार करोऔर जो भी फंस जाए उसे लूट लो।

4. मैने फेसबुक के माध्यम से कुछ संपादकों के खिलाफ क्यों लिखा?

– जब संपादक गण अपने स्ट्रिंगरों से पैसा लेकर डकार जाएं और मांगने पर पुलिस की धमकी दें तो क्या एक ईमानदार पत्रकार को चुप रहना चाहिए।

5. फेसबुक से मेरा कैरियर नष्ट हो रहा है?

– लेकिन मुझे आज जो कुछ भी पहचान मिली है वह फेसबुक के कारण ही। वर्ना अखबारों में तो मुंह सिए हुए रखना पड़ता था। और मेरा जो कैरियर बनना था मैने बना लिया। अब क्या जीवन भर कैरियर ही बनाता रहूं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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