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आठ सालों में किनारे लगाने की कई कोशिशों के दौरान आडवाणी ने तीन बार इस्तीफे के तीर चले

भाजपा के शीर्ष पुरुष समझे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने भले तमाम मनुहार के बाद इस्तीफा वापस ले लिया हो, लेकिन पार्टी को अभी पूरी तौर पर 'आडवाणी संकट' से मुक्ति मिलने के आसार नहीं हैं। क्योंकि, जिन वजहों से व्यथित होकर उन्होंने पार्टी के सभी प्रमुख पदों से इस्तीफा दिया था, उनका कोई कारगर निराकरण नहीं हो पाया है। फिर भी, 'अपनों' के चौरफा दबाव के चलते, शायद इस्तीफा वापसी के सिवाय उनके पास कोई और विकल्प ही कहां बचा था?

भाजपा के शीर्ष पुरुष समझे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने भले तमाम मनुहार के बाद इस्तीफा वापस ले लिया हो, लेकिन पार्टी को अभी पूरी तौर पर 'आडवाणी संकट' से मुक्ति मिलने के आसार नहीं हैं। क्योंकि, जिन वजहों से व्यथित होकर उन्होंने पार्टी के सभी प्रमुख पदों से इस्तीफा दिया था, उनका कोई कारगर निराकरण नहीं हो पाया है। फिर भी, 'अपनों' के चौरफा दबाव के चलते, शायद इस्तीफा वापसी के सिवाय उनके पास कोई और विकल्प ही कहां बचा था?

85 वर्षीय आडवाणी ने सोमवार को संगठन के सभी अहम पदों से इस्तीफे की चिट्ठी भेज दी थी। इस चिट्ठी से संघ परिवार की राजनीति में तूफान-सा आ गया। नाराज 'पितृ पुरुष' को मनाने के लिए भाजपा नेतृत्व ने तेज गति से कवायद शुरू की। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने संघ प्रमुख मोहन भागवत से गुहार लगाई। निवेदन किया कि वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके किसी तरह 'आडवाणी संकट' से पार्टी को उबारें।

राजनाथ सिंह की इस गुहार पर संघ नेतृत्व ने आडवाणी पर चौतरफा दबाव बढ़वाने की रणनीति फटाफट तैयार कर ली। सूत्रों के अनुसार, एक खास रणनीति के तहत इस काम के लिए सबसे पहले आडवाणी के खास करीबियों का इस्तेमाल किया गया। खासतौर पर अरुण जेटली, वेकैंया नायडु, अनंत कुमार व सुषमा स्वराज को 'मनुहार' के मोर्चे पर लगाया गया। लेकिन, जब आडवाणी ने 'हठयोग' के तेवर दिखाए, तो राजनाथ सिंह ने संसदीय बोर्ड की बैठक बुला ली। देर रात हुई बैठक में संसदीय बोर्ड ने आडवाणी का इस्तीफा नामंजूर कर दिया। इसके बाद सुषमा स्वराज के साथ कई नेता आडवाणी को मनाने पहुंचे थे।

दरअसल, 7 जून से गोवा में भाजपा की तीन दिवसीय कार्यकारिणी की बैठक शुरू हुई थी। इस बैठक का खास एजेंडा, विवादित नेता नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने का ही था। जबकि, आडवाणी किसी न किसी तरीके से मोदी की 'ताजपोशी' में रुकावटें पैदा करना चाहते थे। इसी के चलते, उन्होंने एक की जगह चुनाव की दो अभियान समितियां बनाने का सुझाव दे डाला था। उन्होंने गोवा बैठक के महज पांच दिन पहले राजनाथ सिंह से कहा था कि राज्यों के चुनाव के लिए अलग अभियान समिति बनाई जाए। क्योंकि, पांच राज्यों में इसी वर्ष चुनाव होने हैं।  लोकसभा के चुनाव अगले साल होने हैं, इसके लिए अलग समिति बने।

लेकिन, राजनाथ सिंह ने इस सुझाव पर आडवाणी को कोई आश्वासन नहीं दिया था। बाद में, यही तय किया गया कि दो समितियां बनने से कई मायनों में राजनीतिक जटिलताएं पैदा होने का जोखिम रहेगा। इससे अच्छा है कि राज्यों के चुनावों के लिए केंद्रीय स्तर पर कोई समिति न बने। लोकसभा चुनाव के लिए अभियान समिति की कमान मोदी को सौंप दी जाए। ताकि, पार्टी कैडर और आम जनता के बीच यही संदेश जाए कि पार्टी हिंदुत्व के अपने मौलिक राजनीतिक एजेंडे से दूर नहीं हुई है।

यूं तो, संघ परिवार का एक प्रभावशाली धड़ा पिछले कई महीनों से दबाव बनाए है कि मोदी को पार्टी का 'पीएम इन वेटिंग' घोषित कर दिया जाए। ताकि, एक बार फिर हिंदुत्ववादी रुझान का राजनीतिक फायदा पार्टी उठा ले। उल्लेखनीय है कि गुजरात की राजनीति में मोदी की छवि एक धुर हिंदुत्ववादी नेता की रही है। पूरे गुजरात में 2002 के दौरान बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इनमें करीब 1000 लोग मारे गए थे। अरबों रुपए की संपत्ति जलाकर स्वाहा कर दी गई थीं। इन दंगों में संघ परिवार के घटकों ने अपना रौद्र रूप दिखाया था।

आरोप है कि भगवाधारी 'दरिंदों' को मोदी सरकार का संरक्षण प्राप्त था। इन दंगों में खासतौर पर मुस्लिम परिवारों की बर्बादी हुई थी। गुजरात की इस शर्मनाक हिंसा के चलते, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जमकर बदनामी भी हुई थी।

गुजरात के इन दंगों से भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी काफी आहत थे। वाजपेयी की छवि एक उदारवादी नेता की रही है। लेकिन, गुजरात के दंगों ने उन्हें भी शर्मसार कर दिया था। क्योंकि, वे आडवाणी और संघ नेतृत्व के दबाव में मोदी को सत्ता से नहीं हटा पाए थे। उन्होंने मोदी को यही सलाह दी थी कि वे राजधर्म निभाना सीख लें। यह राजनीतिक विडंबना ही है कि जिस मोदी के आडवाणी 'कवच' बने थे, अब वही मोदी 11 साल बाद उनके लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।

यह अलग बात है कि 1990 के दौर में आडवाणी के छवि राजनीतिक हल्कों में एक कट्टवादी नेता की बनी थी। उन्होंने चर्चित राम-मंदिर आंदोलन की राजनीतिक अगुवाई की थी। 1990 में आडवाणी ने 'सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा' का अभियान शुरू किया था। यही रथयात्रा आडवाणी के राजनीतिक जीवन के लिए 'टर्निंग प्वाइंट' बनी थी। इस दौर में संघ परिवार के अंदर उनकी लोकप्रियता शिखर तक पहुंची थी। 1992 में अयोध्या का विवादित ढांचा संघ परिवारियों ने गिरा दिया था। इसका आडवाणी ने खुलकर नैतिक समर्थन किया था।

आडवाणी की 'राम-मुहिम' के चलते भाजपा का जबरदस्त विस्तार हुआ था। लोकसभा में दो सीटों वाली पार्टी 182 सांसदों वाली हो गई थी। धुर हिंदुत्ववादी छवि से आडवाणी ने भाजपा में ऊंचाइयां जरूर छूईं, लेकिन 1995 तक यह साफ हो गया था कि यही कट्टर छवि उनकी 'राह का रोड़ा' भी है। ऐसे में, आडवाणी ने लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी के तरफ से प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चेहरा उदारवादी छवि वाले   अटल बिहारी वाजपेयी को बनाया था। 1996 में वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार जरूर बनी थी, लेकिन, महज 13 दिन ही चल पाई थी। बाद में, गठबंधन राजनीति की बैसाखी के सहारे वाजपेयी की सरकार 1998 से 2004 तक रही थी।

वाजपेयी सरकार में आडवाणी गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री की भूमिका में रहे। गृहमंत्री के रूप में उन्होंने 'सरदार पटेल' की तरह अपनी छवि 'लौह पुरुष' के रूप में गढ़ने की कोशिश की। संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने उन्हें 'लौह पुरुष' कहना भी शुरू किया था। लेकिन, इस अभियान के बावजूद आडवाणी अपनी छवि लौह पुरुष वाली नहीं बना पाए। वाजपेयी के व्यक्तित्व के सामने आडवाणी का राजनीतिक कद बौना ही बना रहा। शायद, इसकी उन्हें लंबे समय तक कसक रही।

2002 में आडवाणी लॉबी ने कोशिश की थी कि वाजपेयी को राष्ट्रपति भवन पहुंचा दिया जाए। ताकि, प्रधानमंत्री की कुर्सी आडवाणी के लिए खाली हो जाए। लेकिन, गठबंधन राजनीति में यह प्रयोग संभव नहीं हुआ। 2004 का चुनाव एनडीए ने वाजपेयी के नेतृत्व में ही लड़ा। 'इंडिया शाइनिंग' के बड़बोले जुमले के साथ प्रचार में अरबों रुपए उड़ा दिए गए। लेकिन, बाजी कांग्रेस के हाथ लगी थी। बाद में, वाजपेयी इतना बीमार पड़े कि अब तक वे बेसुध ही हैं। वाजपेयी की बीमारी के चलते 2007 में ही आडवाणी को एनडीए का 'पीएम इन वेटिंग' घोषित कर दिया गया। यानी, पिछले चुनाव में दो साल पहले ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित हो गया था।

लेकिन, इस बार इसी मुद्दे पर भाजपा के अंदर रार बढ़ गई है। दरअसल, पिछले वर्ष दिसंबर में मोदी ने लगातार गुजरात का चुनाव तीसरी बार जीता था। जबकि, कांग्रेस ने सत्ता छीनने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी। जीत की इस 'हैट्रिक' के बाद ही भाजपा के अंदर इस मांग ने जोर पकड़ा  कि अब मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में आजमाया जाए। उन्हें अभी से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए।

यूं तो मोदी के लिए यह मुहिम अंदर ही अंदर सालों से चल रही थी। लेकिन, गुजरात विधानसभा के चुनावी परिणामों से मोदी का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा। यह अलग बात है कि मोदी की विवादित छवि के चलते एनडीए के अंदर मतभेद रहे हैं। मोदी का नाम उभरा, तो भाजपा के पुराने सहयोगी दल जदयू ने नाराजगी के तेवर दिखा दिए। बिहार में कई सालों से भाजपा और जदयू की मिलीजुली सरकार है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। जदयू अपनी सेक्यूलर छवि के चक्कर में मोदी से दूरी बनाए रखना चाहता है। ऐसे में, नीतीश ने अल्टीमेटम देना शुरू कर दिया था कि यदि मोदी को चुनावी चेहरा बनाया गया, तो उनकी पार्टी एनडीए से अलग हो जाएगी।

मोदी के मुद्दे पर एनडीए में दरार पड़ने का जोखिम सामने है। फिर भी, संघ के दबाव में मोदी के पक्ष में लॉबिंग तेज हुई। पिछले दो महीने से जद्दोजहद चलती रही है कि मोदी को पीएम का चेहरा बनाया जाए या नहीं? अंतत: पहले कदम के रूप में एक बीच का रास्ता निकाला गया। यही कि लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान समिति का प्रमुख मोदी को बना दिया जाए। ताकि, यही संदेश जाए कि हिंदुत्ववादी मोदी के नेतृत्व में ही एनडीए लोकसभा का चुनाव लड़ेगा। इस बीच मोदी ने अपनी छवि बदलने के लिए गुजरात के 'विकास मॉडल' के एजेंडे को जमकर प्रचारित किया। यह दावा किया कि पिछले 10 सालों में उनकी सरकार के बदौलत गुजरात ने विकास के नए मापदंड बनाए हैं। मौका मिला, तो वे अब पूरे देश का 'कर्ज' उतार देंगे। 

भाजपा के अंदर जब मोदी बयार तेज होने लगी, तो अंदर ही अंदर 'मोदी रथ' को थामने की कोशिशें भी शुरू हुईं। मोदी का रुतबा कई महीनों से बढ़ने लगा था। शायद यह बात आडवाणी और उनकी कोटरी को पसंद नहीं आ रही थी। ऐसे में, आडवाणी और मोदी के रिश्तों में खिंचाव के संकेत कई महीनों से मिलने लगे थे। पिछले साल आडवाणी की 'यात्राओं' के दौर में मोदी ने दूरी बनाई थी। दरअसल, 2009 में करारी चुनावी हार के बाद, संघ नेतृत्व ने आडवाणी को हाशिए पर धकेलने की रणनीति बना ली थी। इसी के तहत उनसे नेता विपक्ष का पद भी छिनवा लिया गया। लेकिन, संघ की तमाम कोशिशों के बाद भी आडवाणी एक दम हाशिए पर नहीं लगे। 

पिछले आठ सालों में आडवाणी को किनारे लगाने की कोशिशें कई बार हुई हैं। ऐसे में, तीन बार आडवाणी इस्तीफे का 'तीर' चला चुके हैं। 2005 में वे छह दिन की पाकिस्तान यात्रा पर गए थे। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मो. जिन्ना को सेक्यूलर नेता बता दिया था। इससे संघ का नेतृत्व भड़क गया था। लिहाजा, दुखी होकर आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। किसी तरह से वे बाद में मान गए। लेकिन, दिसंबर आते-आते उन्होंने कुर्सी छोड़ दी थी। 10 जून को इस बार आडवाणी ने फिर इस्तीफे का 'तीर' चलाया। इससे पूरी पार्टी 'लहूलुहान' हो गई है। तमाम मनुहार के बाद इस्तीफा वापस हो गया है। लेकिन, कोई यह गारंटी से नहीं कह सकता कि आडवाणी का दिल-ए-दर्द वाकई में दूर ही हो गया है!

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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